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जनसंगठन का कफ़न-दफ़न

राजेश जोशीराजेश जोशी|गुरुवार, 25 अगस्त 2011, 18:58 IST


पिता के कंधों पर बैठा वो बच्चा अपने हाथों में छोटा सा तिरंगा उठाए था. उसके दोनों गालों पर कूची से तीन रंगों के निशान बनाए गए थे.

ये बच्चा अन्ना हज़ारे के आंदोलन में शरीक था.

लेकिन 'न्यू इंडिया' में इस बच्चे को आप कहीं भी देख सकते हैं: बंबई के वानखेड़े स्टेडियम में आइपीएल मैच की चकाचौंध देखने आई भीड़ में. विश्वकप क्रिकेट का सिरमौर बने इंडिया की जीत का जश्न मनाने सड़कों पर उतरे किसी क्रिकेट प्रेमी पिता के कंधों पर. मदर्स डे या फ़ादर्स डे या फिर जन्माष्टमी के जुलूस में.

अन्ना हज़ारे के आंदोलन ने कुछ और बदलाव किया हो या नहीं, उत्सव और आंदोलन के बीच के अंतर को मिटा दिया है. उनके अभियान में शरीक लोगों के हाथ में तिरंगा, होठों पर वंदेमातरम् और विचारों में राजनीति के प्रति एक अगंभीर क़िस्म की वितृष्णा महसूस की जा सकती है.

सभी नहीं तो इनमें से बहुत सारे वो लोग भी हैं जो आम तौर पर राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों पर नाक भौं सिकोड़ते हैं और कहते हैं कि हड़तालों और प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी जानी चाहिए क्योंकि इससे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है.

इस आंदोलन के समर्थकों में कॉरपोरेट कंपनियों में काम करने वाले लोग भी शामिल हैं जो सामाजिक मुद्दों पर सड़कों पर उतरना आम तौर पर अपनी तौहीन मानते हैं.

एक बड़ी कॉरपोरेट कंपनी के एक एक्ज़ीक्यूटिव ने मुझे बहुत उत्साहित होकर बताया कि बंगलौर के उनके दफ़्तर में काम करने वाले सभी लोग रोज़ाना शाम को अपने दफ़्तर के बाहर मोमबत्ती जलाकर विरोध प्रदर्शन करते हैं.

मेट्रो ट्रेन में मेरे साथ सफ़र कर रहे एक नौजवान का कहना था कि उसके पिताजी प्रॉपर्टी का धंधा करते हैं और कल ही उन्होंने गैस के दस सिलेंडर रामलीला मैदान पहुँचवाए ताकि 'अन्ना की रसोई' में खाना पकता रहे. यानी प्रॉपर्टी डीलर से लेकर कॉरपोरेट तक सभी अन्नामय हैं.

अन्ना का आंदोलन भारतीय समाज में पिछले बीस वर्षों में आए बदलावों को प्रतिबिंबित करता है. अब जनांदोलनों को जन संगठन नहीं चलाते, 'सिविल सोसाइटी' चलाती है. अब आंदोलन के लिए कंधे पर थैला टाँगे, चना-लाही खाकर दिन-रात लोगों को गोलबंद करने वाले कार्यकर्ता की शायद ज़रूरत नहीं रहेगी. ये काम इंटरनेट, ट्विटर और फ़ेसबुक की मदद से एनजीओ कर रहे हैं. पर्यावरण से लेकर समलैंगिकों के अधिकारों तक और दलित जागरण से लेकर कलाओं के संरक्षण तक - हर सामाजिक गोलबंदी के पीछे एनजीओ होते हैं.

न्यू इंडिया में जनसंगठन या तो ग़ायब हो गए हैं या फिर उनमें से बहुतों ने अपना चेहरा मोहरा और यहाँ तक कि नाम बदल कर एनजीओ का आसान रास्ता अपना लिया है. अब ये संगठन संघर्ष नहीं बल्कि सहकार की वकालत करते नज़र आते हैं. यहाँ तक कि कई संगठनों ने अपने नाम से संघर्ष शब्द ही हटा दिया है. उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी उत्तराखंड लोक वाहिनी बन गई और दिल्ली का झुग्गी झोपड़ी संघर्ष मोर्चा झुग्गी झोपड़ी विकास मोर्चा !

'सिविल सोसाइटी' और जनसंगठन के द्वंद्व में फ़िलहाल जनसंगठन लहूलुहान चित्त पड़ा हुआ है और रामलीला मैदान में उसको गहरा दफ़्न किए जाने का जश्न मनाया जा रहा है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 20:57 IST, 25 अगस्त 2011 suwa lal jangu:

    अब जनसंगठनों का दायरा धार्मिक व सामाजिक और कहीं कहीं पर्यावरण तक ही सीमित रह गया. अगर हम आर्थिक और राजनीतिक संगठनों की बात करें तो ये सब राजनीति और अर्थनीति के मोहरे बनकर रह जाते हैं. आपका विश्लेषण समय के साथ सार्थक है.

  • 2. 21:57 IST, 25 अगस्त 2011 Satya:

    ये इसलिए संभव हो रहा है क्योंकि आज हमारे पास आधुनिक तकनॉलॉजी है. पर भारत के ज़्यादातर हिस्सों में रहने वाले लोगों को अब भी ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो उन्हें प्रेरणा दे सकें. अन्ना हज़ारे को धन्यवाद है कि इतने समय बाद लोगों को उत्सव मनाने का कारण मिला है.

  • 3. 22:07 IST, 25 अगस्त 2011 Rabindra chauhan, Barlongfer, Karbi Anglong,, assam:

    क्योंकि अन्ना का आंदोलन अहिंसक है और किसी को गिरफ़्तार होने का डर नहीं. दूसरे, सभी भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं और वो कथनी और करनी में फ़र्क़ देखना चाहते हैं.

  • 4. 22:10 IST, 25 अगस्त 2011 naval joshi:

    यह टिप्पणीकार की त्रासदी होती है कि उसका बयान घटना के बाद ही आता है ऐसा ही कुछ राजेश जोशी की टिप्पणी में भी दिखाई देता है. जो हो रहा है वह हमारे चाहने या अनुमान लगाने से बदल नहीं सकता है और सामाजिक राजनीतिक घटनाओं का इतना सरल गणित हो भी नहीं सकता है कि उसका बहुत ही सटीक अनुमान लगाया जा सके. मार्क्स जैसे अद्वितीय महापुरूष का अनुमान था कि सर्वहारा क्रांति उन देशों में होगी जहं औधौगिक क्रांति हो चुकी होगी. लेकिन ऐसी हो नहीं पाया. आशय यह है कि सामाजिक परिवर्तनों की अपनी गति होती है. जब मार्क्स जैसे महापुरूषों का अनुमान गलत हो जाता है तो हमें ऐसा करने की क्या जरूरत है?

  • 5. 23:04 IST, 25 अगस्त 2011 ashutosh:

    आप तरीक़ा न देखकर नीयत देखते तो बेहतर होता.

  • 6. 23:20 IST, 25 अगस्त 2011 Bhanu pratap:

    आपने बीबीसी मल्टीमिडिया में उन किसानों, महिलाओं की तसवीरें तो देखी होगीं जो अन्ना के आंदोलन में भाग ले रहे हैं.

  • 7. 23:36 IST, 25 अगस्त 2011 KailashGAIRI:

    राजेश जी अन्ना आंदोलन के सिर्फ़ एक पक्ष को उबारा है.

  • 8. 23:45 IST, 25 अगस्त 2011 D.N.Kumar:

    जन्माष्ठमी और अन्ना के अनशन में अंतर है तिरंगा. जोशी जी जनता के जोश को समझ पाने में विफल हुए हैं. आपके विचारों से सहमत नहीं हुआ जा सकता. दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि आप लोगों का हाथ देश की नब्ज़ से हटता जा रहा है.

  • 9. 00:11 IST, 26 अगस्त 2011 Kunal,Madhepura:

    बहुत सही कहा आपने राजेश जी.

  • 10. 01:24 IST, 26 अगस्त 2011 गौतम वर्मा :

    बड़ी विचित्र प्रतिक्रिया है. एक ही विषय पर कभी सकारात्मक. कभी नकारात्मक!

  • 11. 01:50 IST, 26 अगस्त 2011 nepathya nishant:

    माफ़ कीजिएगा राजेश जी ऐसा लगता लगता है कि बी बी सी हिंदी कोई नकारात्मक फोबिया का शिकार हो गयी है. जरा यही विचार कीजिए, क्या अन्ना के आंदोलन की उपलब्धि यही थोड़ी कम है कि लोग आपके शब्दों में ही सही क्रिकेट के अलावा भी कहीं उत्सव मनाने गए. एक ऐसा युवा वर्ग जो सिर्फ करियर, क्रिकेट और सेक्स में रूचि रखता हो इन सबके अलावा किसी विधयेक या क़ानून के बारे में भी अगम्भीर और अधूरी ही सही लेकिन दिलचस्पी तो दिखलाई.

  • 12. 02:01 IST, 26 अगस्त 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    इस आंदोलन को देख कर फिल्म 'पीपली लाइव' याद आ रही है. बिलकुल वैसा ही प्रदर्शन है. अन्ना के बड़े बड़े समर्थक बिलकुल फिल्म 'पेज 3' की तरह हैं जो दिन में शाकाहार पर भाषण देते हैं और रात को चिकन बिरयानी खाते हैं. हद तो तब हो गई जब वकील और पुलिस वालों की पत्नियाँ भ्रष्टाचार का विरोध करने लगी. भ्रष्टाचार के इस हमाम में कौन नंगा नहीं है? पैसे लेकर खबरें दिखाने वाले चैनल भी भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे हैं. छात्र संघ में भ्रष्टाचार करने वाले भी भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे हैं. कुछ पार्टियां और नेता भी इस काम में लग गए है. जब सब लोग भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे हैं तो भ्रष्ट कौन है?

  • 13. 02:07 IST, 26 अगस्त 2011 Arvind Yadav:

    मैं समझ नहीं पाया कि आप कहना क्या चाहते हैं... ख़ास तौर पर अंतिम पैराग्राफ़ में. अगर आप समय में हुए बदलाव की बात कर रहे हैं तो अगले ब्लॉग में आपको लिखना चाहिए कि अब युद्ध तलवार और डंडे लेकर घोड़ों पर सवार होकर क्यों नहीं लड़े जाते. या फिर राजाओं की जगह जनतांत्रिक व्यवस्था क्यों आ गई. या फिर अब चिट्ठियाँ भिजवाने के लिए कबूतरों का इस्तेमाल क्यों नहीं होता. या फिर हम पदयात्रा करने की बजाए रेल, सड़क और हवाई जहाज़ का इस्तेमाल क्यों करते हैं. क्या आप कहना चाह रहे हैं कि बदलाव को नज़रअंदाज़ कर दिया जाना चाहिए या उनका विरोध होना चाहिए? क्या आप कह रहे हैं कि ये आंदोलन सरकार और सिविल सोसाइटी के बीच की बात है? क्या अब बीबीसी का यही स्तर रह गया है? मुझे पूरा यक़ीन है कि आप इस टिप्पणी को प्रकाशित नहीं करेंगे क्योंकि मैंने कई बार देखा है कि बीबीसी में उन टिप्पणियों को प्रकाशित नहीं किया जाता जो लेखक या बीबीसी की तारीफ़ नहीं करतीं.

  • 14. 08:21 IST, 26 अगस्त 2011 Amit Bhatt:

    राजेश जी को चूहों के मारने के लिए काली बिल्ली ही चाहिए यदि बिल्ली का रंग सफेद हुआ तो आप नाराज हो जाऐगें. ट्यूटर और फेसबुक आज चलन में हैं तो फिर प्रचार के लिए पैदल दौड़ने की क्या जरूरत है? सामाजिक या राजनीतिक आंदोलनों को क्या पूर्व में हुए परिवर्तनों की अनुकृति होना चाहिए? हमारे देश में तथाकथित क्रान्तिकारियों ने सोवियत संघ और चीन में हुई क्रान्तियों नकल करने की कोशिश की. उसी तरह के संगठन, वैसी ही भाषा और रंग-रूप और यहां तक की चाल ढाल तक की नकल करने की कोशिश की गई. इस जद्दोजहद में संगठन बन गए. पार्टिंयां भी बन गई. बिना कुछ किए लोगों ने खुद को क्रान्तिकारी भी धोषित कर दिया. लेकिन लोग साथ न आए. लोगों को धर्म जाति के नाम पर राजनीति करने वालों के साथ जाना मंजूर था लेकिन तथाकथित क्रान्तिकारियों जिनके पास थैला, टूटी चप्पल, रंग रूप क्रान्तिकारियों जैसा होने के बावजूद इन्हें लोगों ने 85 वर्षों से आज तक स्वीकार नहीं किया. जैसा हम सोचते हैं समाज में वैसा ही होना चाहिए यह जि़द खतरनाक है. जो कुछ भी घट रहा है पहले उसे स्वीकार करने की विनम्रता हम में होनी चाहिए.

  • 15. 08:32 IST, 26 अगस्त 2011 Rajiv Lochan Sah:

    शाबाश राजेश!

  • 16. 08:41 IST, 26 अगस्त 2011 PREM BALANI:

    मुझे नहीं पता फर्क जन संघटन या जन आंदोन में. फर्क पता है तो सिर्फ राजनीतिक आंदोलन या समाजिक आंदोलन में. अन्ना का आंदोलन समाज का आंदोलन है जहां किसी को लाने की जरूरत नहीं है. मैं कभी भी आंदोलन में रूचि नहीं लेता था पर अन्ना के आंदोलन में ज़रूरत परी तो वापिस इंडिया भी जा सकता हूँ.

  • 17. 11:46 IST, 26 अगस्त 2011 Ajeet:

    सभी राजनीतिक दलों का कोई न कोई जनसंगठन है. उसमें होता तो ख़ैर कुछ नहीं है लेकिन जब भीड़ जुटानी होती है तो उन्हें काम दे दिया जाता है.

  • 18. 12:27 IST, 26 अगस्त 2011 G M Khan:

    सचमुच सिविल सोसाइटी और जनसंगठन का द्वंद देखने लायक़ है.

  • 19. 12:36 IST, 26 अगस्त 2011 BHEEMAL Dildar nagar:

    मान्यवर मुख्य मुद्दे से निगाह फेरने का एक नाज़ूक सा प्रयास भर किया है आपने.

  • 20. 13:14 IST, 26 अगस्त 2011 sudhir saini:

    कृप्या लिखने के बाद एक बार ख़ुद भी पढ़ लेते कि क्या लिखा है और क्यों लिखा है.

  • 21. 13:19 IST, 26 अगस्त 2011 raza husain:

    मेरा मानना है कि अन्ना के आंदोलन से जुड़ रहे 90 प्रतिशत लोगों को मालूम ही नहीं कि जन लोकपाल बिल क्या है. उनकी वजह से मीडिया की भी दूकान चल रही है. धोनी सेना इंग्लैंड में बुरी तरह से हार गई लेकिन अन्ना के कारण जनता के ग़ुस्से से बच गई.

  • 22. 13:20 IST, 26 अगस्त 2011 Dr Kundan Prasad:

    मुख्यमंत्री के निर्देश में उत्तराखंड में भ्रष्टाचार चरम सीमा है.

  • 23. 14:22 IST, 26 अगस्त 2011 Rahul Shah:

    ये एक संतोष की बात है कि निरीह जनता ने अंगड़ाई ली और सरकार के कान पर जूं रेंगी.

  • 24. 15:49 IST, 26 अगस्त 2011 Pramod Shukla:

    पत्रकारों का काम होता है जनता को सच बताना. पर आज कल पत्रकारिता बहुत कॉमर्शियल हो गई है. तभी पिछले तीन लेख नकारात्मक विचार लिए हुए थे. मैं मानता हूँ कि अन्ना के आंदोलन में भ्रष्टाचारी भी आ रहे हैं. पर आंदोलन की नीयत क्या है.. ये देखिए. लोकपाल विधेयक पहले भी संसद में आया है. इस बार कम से कम लोगों को पता तो चला कि ये है क्या. और इस आंदोलन के कारण कितने ही पत्रकारों को काम भी तो मिला है.

  • 25. 16:03 IST, 26 अगस्त 2011 karan Singh:

    भ्रष्टाचार का घाव शरीर को कचोटने लगा है. बिना छटपटाहट और इलाज के इससे मुक्त नहीं हुआ जा सकता.

  • 26. 16:07 IST, 26 अगस्त 2011 firoz:

    किसी ने एक बार गाँधी जी से कहा कि आंदोलन करके आप भारतीय जनता को भीड़तंत्र की शिक्षा दे रहे हैं. आज अन्ना और उनका मक़सद ऊँचा है लेकिन कल कोई भी आबादी के एक छोटे से हिस्से को अपने साथ किसी मैदान में ले जाकर अपने मक़सद को मनवाने के लिए मजबूर कर सकता है. और कोई ज़रूरी नहीं कि वो मक़सद ऊँचा ही हो.

  • 27. 16:39 IST, 26 अगस्त 2011 munna:

    आज़ादी के मतवालों के लिए देश पर क़ुरबान हो जाने का हर अवसर उत्सव जैसा ही है.

  • 28. 16:47 IST, 26 अगस्त 2011 Sandeep Mahato:

    राजेश जी आपने सिर्फ़ नकारात्मक पहलू को ही देखा. पूरे आन्दोलन का ये स्वरुप मैंने भी देखा. लोग यहाँ ज्यादातर फोटो खिंचवाने आये थे जो अपने फेसबुक पर अपलोड करके दोस्तों की वाहवाही लूटना चाहते थे. जिधर मीडिया वालों का कैमरा दिखता था लोग उधर उमड़ पड़ते. यहाँ आके नारेबाजी करना और अन्ना टोपी पहनना, जनलोकपाल के टी शर्ट पहनना तो जैसे फैशन हो गया. मैं भी पहली बार किसी आन्दोलन में शरीक़ हुआ शायद लगा की ये अराजनीतिक है और किसी व्यक्ति विशेष का विरोध भी नहीं है. दूसरा कारण था जब सब लोग जा रहे थे तो मैं भी किसी से पीछे नहीं छूटना चाहता था. परन्तु कुछ भी हो इस आन्दोलन के कुछ सकारात्मक पहलुओं से इंकार नहीं किया जा सकता. सरकार को उसकी औकात बता दी. और ये भी बता दिया की वो इस भुलावे में न रहे की वो जो चाहे कर सकती है. और युवा पीढ़ी जिसे हम भारत का भविष्य मानते हैं जिसे मौज मस्ती से फुर्सत नहीं थी कुछ देर रूककर सोचने को विवश कर दिया.

  • 29. 17:52 IST, 26 अगस्त 2011 Sabnam Qureshi:

    राजेश जी आपने लिखा है कि अब संगठन संघंर्ष नहीं सहकार कर वकालत करते नजर बाते हैं. यदि यह बात सच होती तो अन्ना भी सरकार से सहकार करते नजर आते लेकिन आपको अन्ना के संघर्ष में सहकार कैसे दिखाई दे रहा है यह समझ में नहीं आता है. एनजीओ हो या संगठन उसमें इंसान ही काम करते हैं हमें उन पर विश्वास होना चाहिए. और फिर हम होते कौन हैं जो दूसरों को सर्टिफिकेट देते घूमें कि यह पापी है और वह पुण्यात्मा. यह हमारा आकलन भर हो सकता है. हमें आकलन करने की तो आजादी है लेकिन फ़तवा देने की नहीं और न ही किसी को केवल एनजीओ में काम करने के आधार पर हम पापी घोषित कर सकते हैं. लगता है कि जिस तरह इस्लामपंथी, कबीरपंथी, नानकपंथी होते हैं उसी तरह वामपंथ भी लोगों पर थोपने की आप कोशिश कर रहे हैं. वामपंथियों ने यदि वास्तव में मार्क्स के दर्शन को पकड़ा होता तो मानवता की इतनी दुर्गति न होती. पंथियों की पकड़ में आत्मा नहीं आ पाती इसीलिए वे स्वरूप की बहुत चिंता करते हैं.

  • 30. 21:57 IST, 26 अगस्त 2011 Pravin Ganore:

    मेरा मानना है कि अन्ना के आंदोलन से जुड़ रहे 75 प्रतिशत लोगों को मालूम ही नहीं कि जन लोकपाल बिल है क्या और क्या लाभ होगा सभी लोगों को.

  • 31. 22:18 IST, 26 अगस्त 2011 ashish kumar:

    सही प्रश्न उठाया है आपने. धन्यवाद.

  • 32. 02:09 IST, 27 अगस्त 2011 Rohit Doe Jha:

    आज का भारत, विशेष कर मध्यवर्गीय भारत इतने सारी समस्याओं से जूझ रहा है कि जीविकोपार्जन के अलावा उसके पास वक़्त ही नहीं होता, इसके बाबजूद इतने सारे लोग स्वत: इस विरोध में भाग ले रहे हैं ये अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है. इसे जनचेतना कहिये या, अन्ना के व्याक्तित्व का चमत्कार या फिर भ्रष्टाचार की मार. ये तो अच्छी बात की. अब अच्छे कामों के लिए पैसे दे कर लोगों को नहीं बुलया जाता है. इसे ही तो जनतंत्र कहते हैं. यही तो लोकतंत्र के सफलता का राज है. ये बुनियाद है एक नए भारत का. ये किरण है एक नए प्रभात का. ये जागरण है आम आदमी का, किसी राजनितिक विचारधारा का नहीं !

  • 33. 14:05 IST, 27 अगस्त 2011 Krishna:

    विकास के नाम पर सांसदों और विधायकों को फ़ंड मिलता है मगर दुर्भाग्य की बात है कि ये जन प्रतिनिधि पहले फंड की घोषणा करते हैं और फिर मेज़ के नीचे से कमीशन लेते हैं. ये लोग तबादले, भर्ती और दूसरे कामों के लिए अपने मध्यस्थों के ज़रिए रिश्वत लेते हैं. तो अगर लोग इसका विरोध कर रहे हैं तो ग़लत क्या है? राजेश जी, अगर आप ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड या बीपीएल कार्ड बनवाने जाएँ तो बिना रिश्वत दिए नहीं बनवा सकते. जनता के आंदोलन के बारे में आप जैसे मीडिया के लोगों को नकारात्मक टिप्पणियाँ नहीं करनी चाहिए. कोई नहीं जानता कि कब एक किसान अपने औज़ार को तलवार में बदल दे. इसलिए पत्रकारिता के नियमों का पालन कीजिए.

  • 34. 16:20 IST, 27 अगस्त 2011 Sandeep Kumar:

    राजेश जी, आप जैसे वरिष्ठ पत्रकार से ऐसे लेख की उम्मीद नहीं की जा सकती. ये तो दिग्भ्रमित करने वाला लेख लग रहा है.

  • 35. 17:11 IST, 27 अगस्त 2011 Abhinav:

    बीबीसी वालो सुधर जाओ वरना कोई पढ़ना तो दूर खोलना भी पसंद नहीं करेगा. जब देखो इस आंदोलन की बुराई करते रहते हो...

  • 36. 18:21 IST, 27 अगस्त 2011 babu singh rathore:

    आप क्यों डर रहे हैं ?

  • 37. 07:09 IST, 28 अगस्त 2011 sakeel ahamad:

    राजेश जी रामलीला मैदान में सिविल सोसाएटी का केवल जनसंगठनों से ही द्वन्द नहीं चल रहा है बल्कि संसदीय तंत्र और जनसंगठन के नाम पर जो विकृतियां पनप रही हैं उन दोनों के साथ समान द्वन्द चल रहा है. आप यह नहीं कह सकते हैं कि जनसंगठन उन तमाम विकृतियों से ग्रस्त नहीं है जो आज संसद में पसरती जा रही हैं और जिनके खिलाफ लोगों के गुस्से को अन्ना ने एक मंच दिया है जिसे आप सोसायटी का द्वन्द कह रहे हैं. संसदीय विकृतियों के खिलाफ अन्ना सडक पर है दुर्भाग्यवश जनसंगठनों में व्याप्त विकृतियों के खिलाफ वैसा संघर्ष हम नहीं चला सके जैसा कि चीन में माओ ने बमबार्ट द बुर्जुआ हैडक्वार्टर का नारा दिया था. लोकतंत्र,चुनाव और संसद सभी महान अनुभूतियां है इन शब्दों की अपनी महिमा है लेकिन इनकी आड में क्या हो रहा है यह किसी से छुपा नहीं है. इसी तरह जनसंगठन भी बडी बात है लेकिन जनसंगठनों के भीतर जो सडांध है वैसी शायद संसद में भी नहीं होगी संसद अपेक्षाकृत खुला मंच है इसका लाईव प्रसारण भी होता है जिसे लोग देख पाते हैं लेकिन जनसंगठनों में फैली विकृतियां के कारण ही लोग अब सोसायटी के साथ है. कम से कम बात तो खुले मंच से की जा रही है और हर व्यक्ति लोगों की निगाह में है. आपने लिखा है कि जनसंगठन लहुनुहान चित्त पडा हुआ है, यह कथन ठीक नहीं है क्योंकि जनसंगठन चित्त पडे नही रह सकते हैं वे आज सिविल सोसायटी की अवधारण के साथ नये प्रयोग कर रहे है लेकिन वे लोग जरूर चित्त पडे हैं जो जनसंगठनों पर हावी हो गये थे.


  • 38. 08:15 IST, 28 अगस्त 2011 डा ० उत्सव कुमार चतुर्वेदी , क्लीवलैंड:

    बिना लाइसेंस कार चलने वाले मियां छब्बू जैसे ही पुलिस को पांच सौ रूपये पकड़ाकर आगे बढ़े , मैंने उन्हें रोक लिया . बोले - मियां, मैं परिवहन कार्यालय से ही आ रहा हूँ . वहां सब कागजात सही होने पर भी अफसर ड्राइविंग लाइसेंस बनाने का पांच हज़ार मांग रहा था !!!
    -अगर जन लोकपाल विधेयक पारित हो गया तो वह अधिकारी सलाखों के पीछे होगा और मियां छब्बू केवल लाइसेंस बनवाने की फ़ीस देकर तन के गाड़ी चला रहे होंगे.

  • 39. 23:20 IST, 28 अगस्त 2011 Ram Gopal Dwivedi:

    राजेश जी आप कहना क्या चाहते हैं.....क्या उस बच्चे पर आपको शक है जो अपने पिता के साथ गया था.. या फिर उस यंगिस्तान पर शक है जो क्रिकेट की दुनिया को छोड़ कर अन्ना के कंधा से कंधा मिलाकर खड़ा रहा

  • 40. 08:31 IST, 29 अगस्त 2011 rajmohan singh rawat:

    ईश्वर का धन्यवाद कि इन दिनों मैने बीबीसी की वेबसाइट नही खोली, वरना मेरी भी मानसिकता बदल जाती और दिल से अन्ना के आंदोलन में हिस्सा नही ले पाता.

  • 41. 18:50 IST, 31 अगस्त 2011 shailesh kumar singh:

    आपका ब्लॉग बिल्कुल सही है लेकिन चिंता की बात ये है कि अन्ना के भ्रष्टाचार अभियान में कभी भ्रष्ट लोग ना जुड़ जाए नहीं तो अन्ना की मेहनत बेक़ार चली जाएगी.

  • 42. 10:07 IST, 02 सितम्बर 2011 ratanesh jha:

    मैं आपके नज़रिए से सहमत नहीं हूं. अपने नज़रिए को बदलिए राजेश जी.

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