सऊदी अरब में लोग क्यों सजाते हैं फूलों का ताज

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- Author, मौली थियोडोरा ओरिंगर
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
सऊदी अरब और अरब प्रायद्वीप के दूसरे हिस्सों से आए सैलानी हरे-भरे पहाड़ों पर पहुंचते हैं तो सेल्फी लेने की उनकी इच्छा जग जाती है.
ठंडी हवा के झोंके के बीच से उनकी गाड़ियां गुजरती हैं तो वे खुद को रोक नहीं पाते. कैमरे बाहर निकल आते हैं.
शहद, फल और रंग-बिरंगे फूलों से बने ताज बेचने वाले स्टॉल पर उनकी गाड़ियां रुकती हैं. फ्लैश चमकते हैं और सोशल मीडिया के लिए फूलों वाले ताज के साथ उनकी मुस्कुराती तस्वीरें कैमरे में क़ैद हो जाती हैं.
सऊदी अरब के असिर प्रांत में बिकने वाले फूलों के ताज सिर्फ़ अमीर सैलानियों को लुभाने के लिए नहीं हैं. बारीकी से बुने जाने वाले फूलों के ये मुकुट सऊदी अरब के "फ़्लावर मेन" के पारंपरिक परिधान हैं.
क़हटन कबीले के लोग सुंदरता और सेहत दोनों के लिए फूलों और पत्तियों को सिर पर सजाने की परंपरा निभाते हैं. अब वे इस परंपरागत ताज को यहां आने वाले सैलानियों को बेचते भी हैं.
मुख्य रूप से अरब महाद्वीप के दक्षिणी हिस्से में केंद्रित क़हटन कबीले के लोग हिब्रू बाइबिल के अब्राहम के बेटे इश्माएल के वंशज होने का दावा करते हैं.

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खूबसूरती की दोस्ताना प्रतियोगिता
कबीले के मर्द परंपरागत रूप से सिर पर जड़ी-बूटियों, फूलों और घासों का ताज सजाते हैं. उनके उपनाम भी फूलों से जुड़े होते हैं.
दिवंगत शोधकर्ता थियरी मॉगर के मुताबिक कबीले के युवा सदस्य खूबसूरती की दोस्ताना प्रतियोगिता में ये ताज बनाते हैं. वे जितना हो सके उतने रंगीन फूल (गेंदे, मोगरा वगैरह) का इस्तेमाल करते हैं.
प्रौढ़ मर्दों के ताज में फीकापन झलकता है. रंगीन फूलों की जगह वे जंगली तुलसी की हरी पत्तियों का इस्तेमाल करते हैं.
सुंदर दिखने के लिए कुछ लोग इसे रोज पहनते हैं तो कुछ लोग सिर्फ़ ख़ास मौकों जैसे प्रमुख इस्लामिक छुट्टियों के दिन.
कुछ लोग बीमार हो जाने पर भी इनको पहनते हैं. बीमारी में वे जड़ी-बूटियों और इलाज के काम आने वाली पत्तियों का इस्तेमाल करते हैं.
इस कबीले की परंपरा सऊदी अरब में दबदबा रखने वाले शासक वर्ग की संस्कृति से अलग है. लेकिन इसकी वजह सिर्फ़ फूलों के ताज नहीं हैं.
शासक वर्ग के लोग नज्द और हिजाज़ क्षेत्रों से आते हैं. फूलों वाले लोगों का मूल इलाका असिर पठार के ऊपर है. यहां सऊदी साम्राज्य के किसी भी दूसरे इलाके से ज्यादा बारिश होती है.
मई और जून में जब देश के शहरों में तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है, तब राजधानी रियाद से करीब 900 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में बसा असिर ठंडी हवाओं और कभी-कभी होने वाली तूफानी बारिश से सैलानियों का स्वागत करता है.
चोटियों पर रहने वाले लोगों ने ऊपर खेत बना रखे हैं, जहां छोटे स्तर पर गेहूं, कॉफ़ी और फलों की खेती होती है.

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असिर यानी मुश्किल
क़हटन कबीले का इतिहास मुश्किलों भरा है. अरबी में "असिर" का अर्थ होता है "कठिन" या "मुश्किल".
स्थानीय लोककथाओं के मुताबिक करीब 350 साल पहले ऑटोमन (तुर्की) साम्राज्य की आक्रमणकारी सेनाओं से बचने के लिए आसपास के निचले इलाकों के कुछ क़हटनी परिवार असिर की नुकीली चट्टानों वाली चोटियों पर आ गए थे.
सऊदी शासकों के प्रति वफादार सेना ने जब असिर पर कब्ज़ा कर लिया तब 1932 में इसे सऊदी राष्ट्र में शामिल कर लिया गया था.
20वीं शताब्दी के अंत तक पहाड़ों पर छोटे स्वशासित समूहों में रहने वाले, क़हटनी के गांवों तक पहुंचना मुश्किल था. इससे दूसरे कबीलों से उनकी रक्षा होती थी. साथ ही, राजनीतिक स्वायत्तता भी सुरक्षित रहती थी.
मिसाल के लिए, हबला (अरबी में रस्सी के लिए शब्द) बस्ती तक सिर्फ़ बांस या रस्सी की सीढ़ियों से पहुंचा जा सकता था.

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रीति-रिवाज़
1990 के दशक में सऊदी सरकार ने यहां केबल कार का निर्माण कराया, तब यहां तक पहुंचना आसान हुआ.
पहुंच आसान हो जाने के बाद इस कबीले की राष्ट्रीय पहचान से एकीकरण का मुद्दा भी सामने आया. यह भी सवाल उठा कि क्या आधुनिकीकरण में इनकी विशिष्ट संस्कृति बच पाएगी.
विपरीत हालात में भी उनके कई रीति-रिवाज़ बचे हुए हैं. असल में जिन परंपराओं पर पहले भुला दिए जाने का ख़तरा मंडरा रहा था, वही परंपराएं अब इस क्षेत्र में सैलानियों को लुभाने के काम आ रही हैं.
सऊदी अरब की सबसे ऊंची चोटी जबल सादा के पास छोटे भोजनालयों में वे बकरे का गरम गोश्त और चावल परोसते हैं.
हबला में वे अपनी कमर में रंगीन धारीदार कपड़े लपेटकर मेहमानों का स्वागत करते हैं.
देश के सूखे और गर्म इलाके की महिलाएं सादे कपड़े पहनती हैं. उनके उलट क़हटन कबीले की महिलाएं क्लोज़र-कट स्टाइल वाले कपड़े पहनती हैं, जो तापमान गिरने पर भी उनको गर्म रखते हैं.
महिलाएं सिर पर फूलों के ताज नहीं पहनतीं, लेकिन उनके स्कार्फ और लबादे कढ़ाई और लटकन-फुदेनों से सजे होते हैं. उनके कपड़े चटख पीले, नीले और लाल रंगों के होते हैं.
वास्तुशिल्प में रंगों की बहार
यहां सफ़र के दौरान मिट्टी और पत्थरों से बनी इमारतें दिखती हैं जो 200 साल से भी पुरानी हैं. वे छोटी बहुमंजिला इमारतों की तरह दिखती हैं.
इन घरों का निर्माण कबीलों की व्यवस्था के मुताबिक किया गया था. यमन के शहरों- साना या शिबाम में भी इसी तरह के घरों के अवशेष मिले हैं, जिससे लगता है कि नये सरहद बनने से पहले दोनों देशों में एक साझा संस्कृति रही होगी.
सैलानी यहां के वॉच टावर को अच्छे से देखने के लिए रुकते हैं. आवासीय घरों से ऊपर बनाए गए इस वॉचटावर का अब कोई इस्तेमाल नहीं हैं.
यहां बनी इमारतों का वास्तुशिल्प असिर की जलवायु के अनुरूप है. नालियों की व्यवस्था छत पर पानी को रूकने नहीं देती.
ईंट की मोटी दीवारें घरों को अंदर से गर्म रखती है. इन घरों की खिड़कियां छोटी हैं और उनकी किनारियों को नीले रंग से सजाया गया है. लोग मानते हैं कि ये मच्छरों और बुरी आत्माओं को दूर रखते हैं.
इन घरों को अंदर से देखकर आंखों को सुकून मिलता है. अंदर की दीवारें, खास कर मजलिस (जहां मेहमानों का स्वागत किया जाता है) की दीवारें चटख नीले, हरे, लाल और पीले रंगों में रंगी जाती हैं.
भित्ति चित्र
दीवारों पर बनाई गई ज्यामितीय आकृतियां उस पैटर्न को प्रतिबिंबित करती हैं जो असिर की पहचान का आवश्यक तत्व है.
ये भित्ति चित्र वास्तुशिल्प के उन प्रतीकों से प्रेरणा लेते हैं जो मेहमानों को घर के बाशिंदों के बारे में बताते थे. उनके पैटर्न, आकार और रंग घर वालों की उम्र, लिंग और साज-सज्जा के बारे में सूचना देते थे.
हर साल हज के महीने में, जब मुसलमान पवित्र शहर मक्का की तीर्थयात्रा करते हैं तब इन चित्रों को दोबारा रंगा जाता है.
यह सजावट स्थानीय महिलाएं करती हैं. सालाना रखरखाव के लिए वे सभी उम्र के रिश्तेदारों को आमंत्रित करती हैं. इससे इस कला को फैलने में मदद मिलती है.
चोटियों पर बसे छोटे गांवों में से ज्यादातर गांव खाली हैं.
असिर तक सैलानियों की पहुंच को आसान बनाने के लिए सऊदी सरकार ने हबला जैसे गांवों के निवासियों को जबरन वहां से हटा दिया. उनको नये घरों में बसाया गया, जहां बेहतर बुनियादी सुविधाएं और स्कूल वगैरह हैं.
उनके गांव अब सिर्फ़ सैलानियों को दिखाने के लिए हैं, जहां वे असिर की सभ्यता को देखने-समझने के लिए आते हैं.
क़हटन कबीले के फ्लावर मेन अपने पुश्तैनी गांवों में अस्थायी रूप से सैलानियों को घुमाने के लिए आते हैं. वे मंच पर अपनी परंपरागत नृत्य करके दिखाते हैं और पर्यटन के इर्द-गिर्द अपना बिजनेस बढ़ाते हैं.

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जो मिटा रहा है वही बचा रहा है
यहां इस क्षेत्र का विरोधाभास भी दिखता है. आधुनिकीकरण धीरे-धीरे यहां के देहाती जीवन को मिटा रहा है, लेकिन बाहरी लोगों की रुचि बढ़ने से उन परंपराओं के बचने की संभावना भी बढ़ी है जिन पर ख़त्म होने का ख़तरा था.
हबला अपनी कुदरती खूबसूरती और दुनिया से कटे रहने के इतिहास की वजह से सैलानियों को खास तौर पर लुभाता है. मगर इसका यह मतलब नहीं है कि क़हटनी संस्कृति पूरी तरह नष्ट हो गई है.
कबीले के कई मर्द परिवार पालने के लिए पर्यटन की अर्थव्यवस्था पर निर्भर हैं, लेकिन इस प्रांत में रुचि बढ़ने से कई स्थानीय लोगों को मौका मिला है कि वे अपनी संस्कृति के बचाव के काम से जुड़ें.
तेल के भंडारों ने सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को मज़बूत कर दिया है. सरकार ने "सऊदी अरब विज़न 2030" बनाया है.
इस विज़न में आने वाले दशकों में तेल राजस्व पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य है. इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों और पर्यटन को बढ़ावा देने की भी बात है.

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असिर समेत देश भर के विरासत स्थलों को बहाल करने के लिए एक अरब अमरीकी डॉलर का फंड जारी किया गया है.
विज़न 2030 जैसी पहल अतीत को बचाने पर केंद्रित है. कुछ अन्य परियोजनाएं संस्कृति और आर्थिक उत्पादन में स्थानीय ज्ञान को शामिल करने से जुड़ी हैं.
2017 में आर्ट जमील नाम के संगठन ने स्थानीय कलाकारों को असिर के परंपरागत भित्ति-चित्रों की डिजिटल रिकॉर्डिंग करना सिखाया.
इसका लक्ष्य सामुदायिक स्तर परंपरागत कला और शिल्प को सहारा देने वाले निर्माताओं को तैयार करना है.

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असली पहचान
इसी तरह, जेद्दाह में दार अल-हेक्मा यूनिवर्सिटी ने 2014 में "रि-इन्वेंटिंग असिर" परियोजना का नेतृत्व किया. इसमें समकालीन कला, टिकाऊ स्थानीय विकास और खेती के साथ-साथ वास्तुकला के संरक्षण के लिए मीडिया, विज्ञान, कला और तकनीक का सहारा लिया गया.
परियोजना के ध्येय में कहा गया है, "असिर के लोग गर्व के साथ अपनी जमीन पर रहते हैं और अपने घरों को आत्मनिर्भर तरीके से बनाते हैं. असल में वे वैश्विक स्तर पर अत्यानुधिक रुझानों को समझने में सबसे आगे हैं."
रात में सैलानियों की बसें जब वापस होटल की ओर मुड़ती हैं तब हबला जैसे पहाड़ी गांव खाली हो जाते हैं.
एक बार असिर छोड़ देने पर फूलों के ताज को बचाकर रखना मुश्किल होता है. कुछ ही दिनों में फूल सूख जाते हैं और झूने भर से बिखर जाते हैं. तुलसी और मोगरे की खुशबू चली जाती है.
वैसे तो असिर की आर्थिक सफलता स्थानीय इतिहास के संरक्षण पर टिकी है, उम्मीद है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाने की नई कोशिशों से असिर का भविष्य भी फलेगा-फूलेगा.
दार अल-हेक्मा यूनिवर्सिटी में आर्किटेक्चर डिपार्टमेंट की हेड अन्ना क्लिंगमैन कहती हैं, "असली पहचान दोनों से बनती है- अतीत से भी और भविष्य से भी, यादों से भी और खोज से भी. अगर हम एक के ऊपर दूसरे को प्राथमिकता देते हैं तो हमारी पहचान का एक हिस्सा संकट में पड़ जाता है."
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