जापान का वो किला जिसे दुश्मन कभी नहीं जीत सका

कुमामोतो कैसल

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    • Author, माइक मैकिचर्न
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

दुनिया में कई ऐसे क़िले हैं, जिन्हें दुश्मन कभी नहीं जीत सका. हिंदुस्तान में मौजूद ऐसे क़िलों के बारे में तो आपको मालूम होगा. आज आपको जापान के ऐसे ही एक क़िले की कहानी सुनाते हैं.

ये क़िला, जापान के चार बड़े द्वीपों में से एक क्यूशू के कुमामोतो शहर में सैकड़ों साल से अजेय खड़ा है.

इसे जापान के लोग कुमामोतो कैसल के नाम से जानते हैं. इसकी सबसे बड़ी ख़ूबी है इसका रंग. ये बिल्कुल काला है, जो आम तौर पर किसी इमारत का रंग नहीं होता.

हिमेजी का हाकुरो-जो क़िला

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जापान में यूं तो ऐसे कई क़िले हैं, जो मशहूर हैं. इनमें से एक है हिमेजी का हाकुरो-जो क़िला, यानी सफेद बाद क़िला. इसे यूनेस्को की विरासत की लिस्ट में रखा गया है. इसकी सबसे बड़ी ख़ूबी है इसके 80 निगरानी टॉवर.

फिर मात्सुमोतो का तेल जैसे रंग वाला कारासु-जो यानी कौवा क़िला है. ये जापान का सबसे पुराना आबाद क़िला है. इसे 1504 में बनाया गया था.

टोक्यो, ओसाका, नगोया जैसे बड़े शहरों के अलावा जापान के कमोबेश हर छोटे शहर में ऐसी क़िलेबंदी वाली इमारतें मिल जाएंगी. सबके आस-पास खंदकें खुदी हुई हैं, जिनसे जापान के लड़ाका इतिहास की झलक मिलती है.

कुमामोतो कैसल

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जापान के इतिहास में एक दौर ऐसा था, जब ये छोटे-छोटे सूबों में बंटा था. इनमें आपस में अक्सर युद्ध होते रहते थे. इसलिए हर शहर ने अपने बचाव के लिए क़िले बनवाए थे.

इन्हीं क़िलों में से सबसे चर्चित क़िला है कुमामोतो का. इन दिनों कुमामोतो की मरम्मत का काम चल रहा है.

16 अप्रैल 2016 को आए भयंकर ज़लज़ले ने कुमामोतो क़िले को बहुत नुक़सान पहुंचाया था. इन दिनों इसकी मरम्मत करके इसे पुराने रंग-रूप में लाने की कोशिश हो रही है.

ये कुछ-कुछ एक पहेली हल करने जैसा काम है. हर टुकड़े को सही जगह लगाना बहुत बड़ी चुनौती है.

कुमामोतो कैसल

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पहले ही कुमामोतो के क़िले की हालत ठीक नहीं थी. भूकंप ने इसे बहुत नुक़सान पहुंचाया है. इसकी बुनियाद हिल गई है. निगरानी टावर ध्वस्त हो चुके हैं. छतों की टाइलें टूटकर बिखर चुकी हैं. यानी कभी न जीता जा सकने वाला ये क़िला आज खंडहर में तब्दील हो चुका है.

जापान की सरकार अब इसकी मरम्मत करा रही है. इसमें 63.4 अरब येन की रक़म ख़र्च होगी.

कुमामोतो का ये काले रंग का क़िला क़रीब 400 साल पुराना है. इसे जापान के इतिहास के समुराई दौर में बनाया गया था. ये वो दौर था जब जापान में सूबेदारों और सामंतों के बीच वर्चस्व की जंग छिड़ी हुई थी.

कुमामोतो का क़िला 1607 में बना था. इससे पहले क्यूशू द्वीप में औद्योगिक क्रांति की आमद बस होने ही वाली थी. तरक़्क़ी के इस इंक़लाब से पहले समुराई सामंतों में ख़ूनी भिड़ंत चल रही थी.

कुमामोतो कैसल

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कुमामोतो के दक्षिण में स्थित सामंत टोयोटोमी हिडेयोशी की मौत के बाद इलाक़े में घमासान छिड़ा था. टोयोटोमी इलाक़े के रसूखदार समुराई और राजनेता थे. अब हर कोई उनकी सियासी विरासत पर हक़ जमाने की जुगत में था. मौक़ा देखकर विरोधी शिमाज़ु कुनबे के लोगों ने सोचा कि टोयोटोमी के सूबे पर क़ब्ज़ा कर लें.

इस हमले से बचने के लिए टोयोटोमी के सेनापति रहे काटो कियोमासा ने ये क़िला बनवाया था. उन्हें मालूम था कि समुराई या तो मरते हैं या मारते हैं. ऐसे में काटो को ऐसा क़िला बनाना था, जिसे कोई जीत ही न सके.

इस कैसल में 29 फाटक और 49 निगरानी टॉवर थे. उस हमले में तो इस क़िले का बाल भी बांका नहीं हुआ. कुमामोतो के क़िले का असल इम्तिहान तो दो सौ साल बाद आया.

तमाम घरेलू युद्धों के बाद मेजी राजवंश 1877 में जापान को एकजुट करने में जुटा हुआ था. लेकिन सत्सुमा वंश के समुराई इसके लिए राज़ी नहीं थे. समुराई सेनापति सैगो टकामोरी ने राजधानी टोक्यो की तरफ़ कूच कर दिया. इसके लिए सैगो को कुमामोतो के क़िले को जीतना ज़रूरी था, क्योंकि वो टोक्यो के रास्ते में पड़ा था.

कुमामोतो कैसल

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कुमामोतो का क़िला उस वक़्त जापान की शाही सेना का सबसे बड़ा ठिकाना था. सैगो ने तय किया कि उसे हर हाल में इस क़िले को जीतना होगा.

जापान के राजा मेजी को भी पता था कि क़िले पर 20 हज़ार समुराई धावा बोलने वाले हैं. इसके लिए कुमामोतो के क़िले की ज़बरदस्त मोर्चेबंदी की गई थी. मेजी को अपनी हुकूमत बचाए रखने के लिए हर हाल में कुमामोतो को बचाना था.

कुमामोतो कैसल

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19 फरवरी से 12 अप्रैल 1877 तक समुराई ने लगातार क़िले को जीतने की कोशिश की. आस-पास के इलाक़े जला दिए. लोगों को मार डाला. मगर, वो क़िला जीतने में कामयाब नहीं हो सके. इस दौरान क़िले में एक बार ग़लती से आग भी लग गई. समुराई अपने मक़सद में नाकाम रहे और जापान में मेजी राजशाही बच गई.

राजशाही को समुराई से बचाने में कुमामोतो के क़िले ने बहुत अहम रोल निभाया था. मगर क़ुदरत के हंटर ने इसे तहस-नहस कर दिया है.

अब उम्मीद है कि जापान के लोग अपने गौरवशाली इतिहास के इस सुनहरे पन्ने को दोबारा उसी रूप में लौटा सकेंगे.

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