वह नक्शा, जिसने अमरीका का नामकरण किया

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- Author, माधवी रमानी
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
उत्तरी-पूर्वी फ्रांस का क़स्बा 'सांत-दिए-दे-वोज़' म्यूर्थ घाटी में स्थित एक छोटी सी जगह है. ये फ्रांस के शहर स्ट्रासबर्ग से 68 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में है.
स्विटज़रलैंड का बेसेल शहर इससे 93 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में है. वहीं सांत-दिए-दे-वोज़ से 74 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में जर्मनी का फ्रीबर्ग शहर है.
आज आधुनिक तकनीक, सैटलाइट, ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम और दूसरे तरीक़ों से हम सांत-दिए-दे-वोज़ क़स्बे को नक़्शे पर एकदम सटीक बता सकते हैं. लेकिन, आज से सैकड़ों साल पहले, जब ज़्यादातर दुनिया के बारे में लोगों को पता नहीं था, इसके राज़ खुले नहीं थे, तब यूरोप के कुछ लोगों ने इस क़स्बे में इकट्ठे होकर दुनिया का एक असाधारण नक़्शा बनाया था.
ये नक़्शा उस दौर से पहले के तमाम नक़्शों से एकदम अलग था. उन लोगों ने ऐसा मानचित्र तैयार किया, जिसका असर आज तक है. इसी क़स्बे ने अमरीकी महाद्वीप को उसका नाम दिया.
वो ऐतिहासिक नक़्शा 1507 में छापा गया था. इसकी लंबाई चौड़ाई 1.4 मीटर चौड़ा 2.4 मीटर लंबा था. इतने विशाल नक़्शे को बनाने का मक़सद पूरी दुनिया को एक साथ एक ही नज़र से दिखाना था, जो उससे पहले कभी नहीं हुआ था.
दुनिया का चौथा हिस्सा
इस नक़्शे के बनने से पहले यूरोपीय लोग मानते थे कि दुनिया तीन विशाल भूभागों से मिलकर बनी है-एशिया, अफ्रीका और यूरोप. वो यरूशलम को इसका केंद्र मानते थे.
यही वजह है कि इटली के अन्वेषक क्रिस्टोफ़र कोलंबस अपने आख़िरी वक़्त में इसलिए दुखी थे कि जिस नई दुनिया यानी आज के अमरीका की उन्होंने खोज की थी, वो असल में एशिया का ही एक हिस्सा था.
लेकिन, सांत-दिए-दे-वोज़ में 1507 में छपे इस नक़्शे ने पहली बार यूरोपीय लोगों को दुनिया के चौथे हिस्से के अस्तित्व से रूबरू कराया. नक़्शे में यूरोप के बांयी ओर दक्षिण अमरीका को एक लंबी पतली पट्टी के तौर पर उकेरा गया था. वहीं, इसके ऊपर एक छोटे से उत्तरी अमरीका को दर्शाया गया था.

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इस नये महाद्वीप को चारों तरफ़ समंदर से घिरा हुआ दिखाया गाया था. नक़्शे में जिस जगह आज का ब्राज़ील है, वहां पर इसे बनाने वालों ने नाम लिखा था- अमरीका.
नक़्शानवीस इसे आज वॉल्डसीमुलर नक़्शे के नाम पर जानते हैं. इसका ये नाम इसे बनाने वाले जर्मन मार्टिन वॉल्डसीमुलर के नाम पर पड़ा. हालांकि मार्टिन वॉल्डसीमुलर इस नक़्शे को बनाने वाले अकेले आदमी नहीं थे.
कैसे हुई नक्शा बनाने की पहल
इस नक़्शे को बनाने की पहल सांत-दिए-दे-वोज़ की चर्च के पादरी वाल्टर लुड ने की थी. वाल्टर की ब्रह्मांड शास्त्र यानी कॉस्मोग्राफ़ी में बहुत दिलचस्पी थी. वो धरती और ब्रह्मांड में इसकी जगह को लेकर पढ़ते-लिखते रहते थे. वाल्टर लुड चाहते थे कि उस दौर से पहले के ज़माने में जिस दुनिया का तसव्वुर होता था, और अब जब अन्वेषक नई दुनिया की खोज की ख़बरें दे रहे थे, उन्हें मिलाकर दुनिया का नया नक़्शा बनाया जाए.
इसके लिए उन्होंने स्थानीय सामंत रीन द्वितीय से पैसे का जुगाड़ कर लिया और सांत-दिए-दे-वोज़ में एक प्रिंटिंग प्रेस लगाया. इसके बाद वाल्टर लुड ने जर्मन मानवतावादियों मार्टिन वॉल्डसीमुलर और मैथियास रिंगमैन समेत कई नक़्शानवीसों को सांत-दिए-दे-वोज़ में इकट्ठा किया.
इतिहास के जानकार लेखक टोबी लेस्टर बताते हैं कि रिंगमैन ने इस नक़्शे के साथ छापी गई किताब लिखी थी और उन्होंने ही अमरीका नाम सोचा.
जर्मनी के दो क़ाबिल लोग नक़्शा बनाने के इस प्रोजेक्ट के लिए फ्रांस के क़स्बे सांत-दिए-दे-वोज़ में इकट्ठे हुए थे, तो, इसके पीछे सिर्फ़ पैसा कमाना ही वजह नहीं थी. इस क़स्बे का ठिकाना भी अहम था.
जैसा कि टोबी लेस्टर ने हमें बताया, 'उस वक़्त अटलांटिक पार से नई दुनिया होकर अन्वेषक पुर्तगाल और स्पेन पहुंच रहे थे और नई जानकारियां ला रहे थे. ऐसे मिशन में इटली के रईस पैसे लगा रहे थे. वहीं इन दोनों के बीच में पड़ने वाला जर्मनी प्रिंटिंग के क्षेत्र में नई-नई कामयाबियां हासिल कर रहा था'.

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ऐसे में सांत-दिए-दे-वोज़ उन शहरों की तरह था, जहां ढेर सारी जानकारियां आ रही थीं और वो शहर प्रिंटिंग प्रेस लगाकर इन जानकारियों को किताब से लेकर नक़्शों तक की शक़्ल दे रहे थे.
आज, सांत-दिए-दे-वोज़ में उस मध्यकालीन युग के बहुत कम ही निशान मिलते हैं. दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस क़स्बे को नए सिरे से बनाया-बसाया गया था.
पहला ग्लोब भी बना था
सांत-दिए-दे-वोज़ क़स्बे की चर्च के बाहर ज़मीन पर अमरीका का एक नक़्शा बना हुआ है. ध्यान से न देखें, तो आप उसे महज़ सजावटी चित्रकारी समझेंगे. चर्च से लगे मठ में एक परनाला बना हुआ है, जिस पर अमरीकी आदिवासियों की छाप दिखती है.
हर साल ये शहर भूगोल के दो अंतरराष्ट्रीय मेलों का आयोजन करता है. ताकि विचारों का हेल-मेल हो. शायद यही वजह है कि सांत-दिए-दे-वोज़ आने वाले ज़्यादातर लोगों को इसके नक़्शे बनाने के इतिहास के बारे में नहीं मालूम. उन्हें नहीं पता कि वो इस ऐतिहासिक नक़्शे के बचे-खुचे सबूत शहर की लाइब्रेरी में देख सकते हैं.

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पिछले साल 18 हज़ार लोग यहां के टूरिस्ट ऑफ़िस आए थे. लेकिन, केवल 664 लोग ही लाइब्रेरी आए. इस लाइब्रेरी में आधुनिकता के साथ-साथ पुराने दौर के निशान भी सहेजकर रखे गए हैं. तमाम दुर्लभ किताबों के साथ वो किताब भी यहां रखी है, जो वॉल्डसीम्यूलर नक़्शे के साथ 1507 में छापी गई थी. इस किताब का नाम है-इंट्रोडक्शन टू कॉस्मोग्राफ़ी.
इसकी प्रस्तावना लैटिन में लिखी है, जिसमें किताब लिखने का मक़सद बयां किया गया है. उस दुनिया से लोगों को रूबरू कराना जिसका नक़्शा ग्लोब और सतह पर बनाया गया है. इस सतह का मतलब है वॉल्डसीम्यूलर नक़्शा.
इसे 12 अलग-अलग पन्नों में टुकड़ों मे छापकर जोड़ा गया था. फिर इस नक़्शे को एक बड़ी सी गेंद पर चिपका कर दुनिया का पहला ग्लोब तैयार किया गया था. इससे ये भी साबित होता है कि मध्यकाल में ही यूरोपीय लोगों को ये पता था कि दुनिया गोल है, चपटी नहीं.
अमरीका का नाम अमरीका क्यों?
इस किताब से हमें ये भी पता चलता है कि आखिर अमरीका का नाम अमरीका क्यों दिया गया. अमरीकी महाद्वीप का नाम इटली के अन्वेषक अमेरिगो वेसपुची के नाम पर दिया गया था. लैटिन भाषा में दूसरे महाद्वीपों के नाम ज़नाना थे-यूरोपा, अफ्रीका, एशिया-तो, किताब के लेखक ने कहा कि नई दुनिया का नाम भी वैसा ही होना चाहिए और इस तरह 'अमरीका' को उसका नाम उसकी तलाश करने वाले के नाम पर दिया गया.
सदियों तक इस बात को लेकर विवाद होता रहा था. सोलहवीं सदी के स्पेन के भिक्षु बार्थोलोम्यो डे ला कसास ने कहा था कि ये कोलंबस का अपमान है क्योंकि कोलंबस, अमेरिगो वेसपुची से पहले अमरीका पहुंचे थे. वहीं 1809 में अमरीकी लेखक वॉशिंगटन इर्विंग ने लिखा कि फ्लोरेंस के लोगों ने साज़िशन, कोलंबस से उनकी शोहरत छीनी.
लेकिन, हक़ीक़त ये है कि कोलंबस ने चार बार अमरीका की यात्रा की. पहली बार वो 1492 में कैरेबियाई द्वीपों तक पहुंचा थे. 1498 में अपने तीसरे सफ़र में जाकर कोलंबस अमरीकी महाद्वीप की मुख्य भूमि को छू सके थे.

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इसके उलट, 1504 में अमेरिगो वेसपुची ने फ्रांस के लॉरेन इलाक़े के सामंत रीन को जो ख़त लिखा था, उसे इस क़िताब यानी इंट्रोडक्सन टू कॉस्मोग्राफ़ी में छापा गया था. इसमें अमेरिगो के 1497 से 1504 के दौरान चार अमरीकी यात्राओं का ज़िक्र था. यानी वो कोलंबस से एक साल पहले ही अमरीकी महाद्वीप की मुख्य भूमि तक पहुंच चुके थे. हालांकि इतिहासकार इस चिट्ठी की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हैं. लेकिन वॉल्डसीम्यूलर और मैथियास रिंगमैन ने इस चिट्ठी पर यक़ीन करते हुए, महाद्वीप का नाम अमेरिगो के नाम पर रखा.
इस नक़्शे को लेकर ये इकलौता विवाद नहीं था. नक़्शे में नए महाद्वीप को समंदर से घिरा हुआ दिखाया गया था. सवाल उठा कि नक़्शा बनाने वालों को कैसे मालूम कि नया महाद्वीप समंदर से घिरा है.
रिकॉर्ड बताते हैं कि प्रशांत महासागर का दीदार करने वाला पहला यूरोपीय नागरिक था स्पेन का वास्को नुनेज़ डे बाल्बोआ. जिसने 1507 में नक़्शा छपने के 6 साल बाद 1513 में पनामा की एक पहाड़ी चोटी से प्रशांत महासागर को देखा था.
फिर, नक़्शा बनाने वालों ने क्या केवल अटकलों के आधार पर अमरीका को समंदर से घिरा दिखाया था या फिर कुछ पुर्तगालियों ने महाद्वीप के उस पार जाकर देखा था. और इस बात को छुपाए रखा गया था क्योंकि, पुर्तगालियों और स्पेन के बीच 1494 में समझौता हुआ था, जिसके तहत दोनों देशों ने पूरी दुनिया को आपस में बांटा था.
टॉर्डेसिलास की उस संधि के मुताबिक़ आज के ब्राज़ील के पश्चिम का सारा इलाक़ा स्पेन का था. यही वजह है कि दक्षिणी अमरीका में ब्राज़ील इकलौता देश है, जहां पुर्तगाली भाषा बोली जाती है.
कहां ग़ायब हुईं प्रतियां
एक और रहस्य है इस नक़्शे के होने का. 1507 में इसकी एक हज़ार प्रतियां छापी गई थीं लेकिन जल्द ही वो सब ग़ायब हो गईं. हालांकि किताब बची रह गई, जिसे इस लाइब्रेरी में रखा गया था. वहीं, नक़्शों को तमाम शिक्षण संस्थानों में प्रदर्शित किया गया था. इसलिए वो ज़्यादा दिन तक नहीं चले.
बहुत से लोगों ने सदियों तक इसकी तलाश की और कोशिश की कि वॉल्डसीम्यूलर नक़्शे को नए सिरे से बनाएं. आख़िर में जर्मनी के इतिहास के प्रोफ़ेसर फ़ादर जोसफ़ फ़िशर ने इस नक़्शे की एक प्रति को जर्मनी की वॉल्फ़गेग कैसल में ढूंढ निकाला.

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इस नक़्शे को कुछ लोग अमरीका का बर्थ सर्टिफ़िकेट कहते हैं. 2003 में अमरीकी संसद की लाइब्रेरी ने इस नक़्शे को एक करोड़ डॉलर यानी क़रीब 70 करोड़ रुपए की मोटी रक़म देकर ख़रीदा था.
टोबी लेस्टर कहते हैं कि नक़्शा बनाने में कई लोगों ने रोल निभाया था. तमाम जानकारियों को जोड़कर ये नक़्शा तैयार किया गया था. इसकी अहमियत इसके दौर की वजह से है.
नक्शे के माध्यम से संदेश
नक़्शे के ऊपर की तरफ़ यूनानी भूगोलविद् टॉल्मी की तस्वीर बनी है. इसके ज़रिए नक़्शानवीसों ने पुराने नज़रिए से दुनिया देखने को बयां किया है. वहीं दूसरी तरफ़ अमेरिगो वेसपुची की तस्वीर है, जो दुनिया को नई जानकारी और नए नज़रिए से देखने की सोच को बयां करता है. पुराने ख़यालात को जगह देने की वजह से ही वॉल्डसीम्यूलर ने इस नक़्शे में उस यूरोप को उकेरा, जिसे टॉल्मी के दौर में जाना जाता था, जो 1507 में ग़लत था. ये यूरोप का एक हज़ार साल पहले का नक़्शा था.
पहले के नक़्शों में ऊपर की तरफ़ भगवान की तस्वीर हुआ करती थी. मगर इसमें दो इंसानों को उकेरा गया था. यानी नक़्शानवीस ये संदेश दे रहे थे जब इंसान नई दुनिया की तलाश कर सकता है, तो वो इस पर राज भी कर सकता है.
वॉल्डसीम्यूलर नक़्शा भी बताता है कि सारे नक़्शे सियासी होते हैं. उत्तर दिशा को नक़्शे में सबसे ऊपर दिखाकर, यूरोप को बीच में रखकर नक़्शा बनाने वालों ने यूरोप को दुनिया का केंद्र बताया था. जबकि इससे पहले के नक़्शों में पूरब को सबसे ऊपर रखा जाता था. एक महाद्वीप का नाम एक यूरोपीय नागरिक के नाम पर रखकर नक़्शानवीसों ने यूरोपीय देशों की महत्वाकांक्षाएं भी उजागर की थीं. इसके ज़रिए बताया गया था कि यूरोप के लोग दूसरी दुनिया को जीतकर उसकी सभ्यता, संस्कृति, संसाधनों और इंसानों पर अपना हक़ जमा लेंगे. पुरानी सभ्यताओं को उखाड़ फेंकेंगे.
टोबी लेस्टर कहते हैं, 'ये नक़्शा उस दुनिया का जन्म प्रमाणपत्र है, जो 1492 में अस्तित्व में आई. साथ ही वो उससे पहले की दुनिया का डेथ वॉरंट भी है'.
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