ई-स्कूटर को लेकर पूरी दुनिया में कभी इनकार, कभी इक़रार क्यों?

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- Author, फ्रांसेस्का पेरी
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
कोरोना ने हमें नए तरीक़े से ज़िंदगी जीने का ढंग सिखाया है. कभी सोचा भी नहीं था कि सारी दुनिया को ताला लग जाएगा. लेकिन, अब हम लॉकडाउन से अनलॉक की तरफ़ बढ़ रहे हैं. हालांकि, अभी भी बहुत बातों का ख़याल रखना बहुत ज़रूरी है. इसमें सबसे ज़्यादा ज़रूरी है बार-बार हाथ धोना, मास्क पहनना और दो गज़ की दूरी बनाए रखना.
लेकिन, सार्वजनिक वाहनों में ये दूरी बनाए रखना ज़रा मुश्किल है. इसलिए, सारी दुनिया में निजी वाहनों के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया जा रहा है. सरकारें चाहती हैं कि लॉकडाउन के दौरान कार्बन उत्सर्जन पर जितना नियंत्रण हुआ है, वो बरक़रार रहे. लोग पेट्रोल-डीज़ल से चलने वाले वाहनों के बजाए इलेक्ट्रिक गाड़ियां ज़्यादा इस्तेमाल करें.
ऐसे में ई-स्कूटर का क्रेज़ तेज़ी से बढ़ रहा है. कोरोना काल में तो ई-स्कूटर लोगों की पहली पसंद बना है. लेकिन कुछ लोग ऐसे वाहनों की सुरक्षा और स्थिरता को लेकर कई सवाल कर रहे हैं.
ई-स्कूटर पिछले एक दशक से बाज़ार में मौजूद हैं. लेकिन महंगा होने की वजह से ये सबकी पहुंच के बाहर थे. बाद में कंपनियों ने इसे सुलभ विकल्प बनाने के लिए तकनीक का सहारा लिया और कुछ ऐप की मदद से ई-स्कूटर किराए पर दिए जाने लगे. देखते ही देखते इनकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी.
इस वक़्त लगभग 20 देशों के 100 शहरों में ई-स्कूटर शेयर करने की योजनाएं चल रही हैं. हालांकि, इनके उपयोग के मामले में अमरीका अव्वल है. एक अंदाज़े के मुताबिक़ 2024 तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 46 लाख शेयरिंग ई-स्कूटर चलाए जाएंगे.

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ई-स्कूटर पर्यावरण के लिए जितने अच्छे हैं, सुरक्षा के लिहाज़ से उतने ही ख़राब हैं. ख़ासतौर से नेत्रहीनों, कमज़ोर नज़र वालों और फुटपाथ पर चलने वालों के लिए ई-स्कूटर ख़तरा पैदा करते हैं. नियमों की कमी के कारण ई-स्कूटर सड़कों पर चलाना ख़तरे को दावत देता है.
यहां तक कि अगर ई-स्कूटर उपयोग में ना हो तब भी ख़तरा पैदा करता है. ज़्यादातर, शेयरिंग सेवाएं डॉकलेस होती हैं. जिसके चलते स्कूटर को फ़ुटपाथ पर यूं ही छोड़ दिया जाता है. और अन्य लोगों के लिए रुकावट पैदा होती है.
ई-स्कूटर के तमाम फ़ायदों के बावजूद बहुत से देशों में इसे ग़ैरक़ानूनी वाहन माना गया है. कुछ समय पहले तक ये ब्रिटेन में भी अवैध थे. लेकिन इसी वर्ष मई महीने में सरकार ने घोषणा की कि शेयरिंग ई-स्कूटर परीक्षणों को एक साल में राष्ट्रीय स्तर पर उतारा जाएगा.
जकार्ता, सिंगापुर और शंघाई में तो ई-स्कूटर आज भी प्रतिबंधित हैं. पेरिस में इन्हें फुटपाथ पर भी चलाने की इजाज़त नहीं है. जिन देशों में ई-स्कूटर चलाने की इजाज़त है, वहां भी इसकी गति सीमा तय है. यहां तक कि पार्किंग के लिए भी नियम क़ानून हैं.
ई-स्कूटर के लिए सुरक्षा ही एकमात्र मुद्दा नहीं है. बल्कि, इनसे पर्यावरण के लिए फ़ायदे या नुक़सान के दावों की भी जांच हो रही है. हालांकि ई-स्कूटर का शेयरिंग मॉडल पूरी तरह कार्बन उत्सर्जन मुक्त है. लेकिन इसे बनाने और ग्राहक तक पहुंचाने में ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन होता ही है.
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2019 की एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक़ एक ई-स्कूटर, एक आम बस की तुलना में कहीं ज़्यादा ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन करता है. कुछ अन्य रिसर्च के नतीजे भी ऐसे ही हैं. अभी एक ई-स्कूटर की उम्र एक से दो साल के दरमियान होती है. लेकिन बार-बार हादसों का शिकार होने की वजह से इनकी उम्र और भी कम रह जाती है.
इसके लिए रिसर्चर डॉकलेस सिस्टम को ज़िम्मेदार मानते हैं. जानकारों को डर है कि जिस तरह डॉकलेस बाइक-शेयर की योजना ने साइकिलों के क़ब्रिस्तान बना दिए. कहीं वैसा हश्र ई-स्कूटर के साथ भी न हो.
ई-स्कूटर ईको-फ़्रेंडली वाहन के विकल्प के तौर पर विकसित किया गया था. लेकिन, इसके बढ़ते इस्तेमाल के साथ ही लोगों की पैदल चलने की आदत ख़त्म होने लगी. सार्वजनिक वाहनों का उपयोग कम होने लगा.
हालांकि अब ई-स्कूटर बनाने वाली कंपनियां इसकी स्थिरता को लेकर फ़िक्रमंद हैं और इस दिशा में काम कर रही हैं. ख़ासतौर से इसकी बैट्री में सुधार और नए प्रयोग किए जा रहे हैं. उन्हें पूरी तरह इलेक्ट्रिक बनाया जा रहा है. कोरोना काल में जबकि सरकारें सोशल डिस्टेंसिंग को बढ़ावा दे रही हैं तो ऐसे में ई-स्कूटर का क्रेज़ लोगों में बढ़ रहा है.
फ़िनलैंड, आयरलैंड और ब्रिटेन में ई-स्कूटरों की बिक्री बढ़ी है, जबकि यहां ई-स्कूटर चलाने की इजाज़त नहीं है. कोलंबिया जैसे विकासशील देश के शहर यानी राजधानी बोगोटा में ई-स्कूटर प्रमोट करने के लिए नए नियम लचीले किए जा रहे हैं. रोम में तो मई महीने में ही पहली बार ई-स्कूटर का स्वागत किया गया है.

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रिसर्च बताते हैं कि अगर किसी भी वाहन का इस्तेमाल समाज का कोई एक ही वर्ग करेगा तो वो कामयाब नहीं हो सकता. ई-स्कूटर का इस्तेमाल ज़्यादातर मर्द करते हैं. ऐसे में इसकी कामयाबी पर अभी लोगों को शक़ है.
हालांकि कुछ कंपनियां समाज के कमज़ोर तबक़ों को ध्यान में रखते हुए कम क़ीमत वाली ई-स्कूटर तैयार करने की योजना बना रही हैं. साथ ही जिन लोगों के पास स्मार्टफ़ोन नहीं है, वो भी ई-स्कूटर का इस्तेमाल कर सकें, ऐसी व्यवस्था पर भी काम चल रहा है.
ई-स्कूटर का सबसे बड़ा फ़ायदा है कि इसमें पैडल का इस्तेमाल नहीं होता लिहाज़ा ये विकलांगों के लिए भी सुलभ है.
ई-स्कूटर अपनी तमाम कमियों के बावजूद पर्यावरण और आम लोगों के इस्तेमाल के लिए फ़ायदेमंद हैं. बशर्त कि सरकारें इसे योजनाबद्ध तरीक़े से उपलब्ध कराएं और ट्रैफिक के नियमों का पालन कराएं.
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