हिंसा को महामारी मानने की ज़रूरत क्यों है

साल 2005 में ग्लैसगो में एक महिला

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इमेज कैप्शन, साल 2005 में ली गई इस तस्वीर में ग्लैसगो में रहने वाली एक महिला वो चाकू दिखा रही हैं जो वो हमेशा अपने साथ रखती हैं. 2005 में यूरोप में सबसे अधिक हिंसा होने वाले शहरों में इस शहर का नाम सबसे ऊपर था.
    • Author, समीरा शैकल
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर

क्रिस्टीन गुडाल, स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में फेशियल सर्जन हैं. साल 2000 की शुरुआत से ही क्रिस्टीन ने गले, चेहरे, सिर और जबड़े पर चोट वाले सैकड़ों मरीज़ों का इलाज किया होगा.

एक बार एक युवक आधी रात को उनके अस्पताल आया. उसके पूरे चेहरे पर चाकू के कटे का निशान था. क्रिस्टीन को उस युवक को ये बताने में हिचक हो रही थी कि ये ज़ख़्म कभी भी पूरी तरह से भर नहीं सकेगा.

लेकिन, जब उन्होंने उस युवक को ये बात बताई, तो उस पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. यूं लगा जैसे ये तो उसे पता ही था. इसके लिए वो ज़हनी तौर पर तैयार था.

क्रिस्टीन बताती हैं कि, 'बाद में जब उस युवक के कुछ दोस्त उससे मिलने आए, तो मेरी समझ में आया कि उस युवक को चेहरे पर घाव से फ़र्क़ क्यों नहीं पड़ा. उसके सारे दोस्तों के चेहरों पर ज़ख़्मों के निशान थे.'

वो तजुर्बा क्रिस्टीन को हमेशा के लिए याद रह गया. वो कहती हैं कि ये इस बात की मिसाल था कि ग्लासगो शहर में अपराध किस क़दर बढ़ गए थे.

2005 में संयुक्त राष्ट्र ने एक रिपोर्ट में बताया था कि पश्चिमी देशों में स्कॉटलैंड सबसे हिंसा प्रभावित देश है. उसी साल विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 21 यूरोपीय देशों में किए गए सर्वे की बुनियाद पर, ग्लासगो को यूरोप में 'क़त्ल की राजधानी' करार दिया था.

हाल ये था कि उस वक़्त एक साल में एक हज़ार से ज़्यादा लोगों को हिंसक अपराध के चलते चेहरे की सर्जरी कराने की ज़रूरत पड़ती थी.

उस दौर के बारे में क्रिस्टीन गुडाल कहती हैं कि, "हम इन लोगों के ज़ख़्मी होने पर इलाज के बजाय इन्हें घायल होने और फिर अस्पताल आने से ही क्यों न रोकने की कोशिश करें?"

फिलाडेल्फिया

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इमेज कैप्शन, 2018 में फिलाडेल्फिया में बंदूकों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों ने हिंसा में मारे गए लोगों की तस्वीरों और उनके जूतों को प्रदर्शन के लिए रखा है

इंसान हिंसक क्यों हो जाता है?

इंसान अक्सर जोखिम भरा बर्ताव करता है, ख़तरों से खेलता है. जैसे कि नुक़सान पता होने के बावजूद स्मोकिंग करना या फिर पेट भरने के बावजूद ज़्यादा खाना. बिना एहतियात बरते सेक्स करना.

डॉक्टर हमेशा कहते हैं कि इलाज से बचाव बेहतर है. यानी किसी मर्ज़ को होने से ही रोका जाए.

लेकिन, जब बात हिंसक बर्ताव की आती है, तो, इससे निपटने का एक ही तरीक़ा लोग बताते हैं, क़ानून सख़्त बना दो. जैसे हाल ही में 12 साल से कम उम्र की बच्ची से बलात्कार पर मौत की सज़ा का प्रावधान. या फिर भीड़ की हिंसा से निपटने के लिए सख़्त क़ानून बनाने पर हमारे देश में विचार चल रहा है.

हिंसा को इंसान का जन्मजात बर्ताव मान लिया गया है, जिसे बदला नहीं जा सकता. सोच यही है कि जो लोग हिंसा करते हैं, उन्हें सही रास्ते पर नहीं लाया जा सकता. इसलिए सख़्त क़ानूनों की बात ही की जाती है.

लेकिन, सख़्त क़ानूनों से बात बनती होती, तो कब की बन जाती. सऊदी अरब और ईरान में कई जुर्मों के लिए मौत की सज़ा है. मगर अपराध तब भी नहीं रुकते. भारत में भी कई अपराधों के लिए मौत की सज़ा मिलती है. मगर वो जुर्म अब भी होते हैं.

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फ्रांस पुलिस

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छुआछूत की बीमारी की तरह फैलती है हिंसा

स्कॉटलैंड पुलिस की विश्लेषक कैरिन मैकक्लस्की ने 2005 में एक रिपोर्ट तैयार की थी. इस रिपोर्ट में ये कहा गया था कि पुलिस के तौर-तरीक़ों से अपराध कम नहीं हो रहे थे.

बढ़ते अपराधों की बड़ी वजह ग़रीबी, ग़ैर-बराबरी, मर्दाना दिखने की सोच और शराबनोशी थी. और केवल पुलिस का रवैया सख़्त करने से इन समस्याओं से नहीं निपटा जा सकता.

मैक्क्लस्की के साथ काम करने वाले विल लिंडेन कहते हैं कि पुलिस शराब की लत तो छुड़ा नहीं सकती.

इसके बाद कैरिन, लिंडेन और उनकी टीम ने अपराध को कम करने के दूसरे तौर-तरीक़ों की तलाश शुरू की.

विल लिंडेन बताते हैं कि इसी मुहिम के तहत स्कॉटलैंड में वायोलेंस रिडक्शन यूनिट (VRU) की स्थापना हुई. 2005 में VRU की स्थापना के बाद से स्कॉटलैंड में अपराध की दरों में लगातार कमी आनी लगे. आज की तारीख़ में वहां हत्या की घटनाओं में 60 फ़ीसद से ज़्यादा की कमी आई है.

क्रिस्टीन गुडाल के अस्पताल में हिंसा से हुए ज़ख़्मों का इलाज कराने वालों की तादाद हज़ार से घटकर पांच सौ तक आ गई है. वीआरयू ने हिंसा को क़ानून-व्यवस्था के मसले जैसा समझने के बजाय, इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती के तौर पर लिया.

इसके पीछे जो लोग हैं, उनका मानना है कि हिंसक बर्ताव एक महामारी है, जो छुआछूत की बीमारियों की तरह एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलती है.

जो लोग हिंसा के पीड़ित होते हैं, उनके हिंसा करने की आशंका बढ़ जाती है. मतलब साफ़ है कि अगर किसी इलाक़े में गोलीबारी और छुरेबाज़ी की घटनाएं ज़्यादा हिंसा को महामारी मानने की ज़रूरत क्यों हैहो रही हैं, तो भले ही उसी जैसा कोई और इलाक़ा हो, वहां पर हिंसा पीड़ित कम हैं, तो अपराध कम ही रहेंगे.

समर हारून पर चाकू से हमला

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इमेज कैप्शन, समर हारून खुद पर हुए चाकू के हमले के निशान दिखा रही हैं. उन पर साल 2013 में हमला हुआ था.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, "हिंसा को ठीक उसी तरह रोका जा सकता है, जैसे गर्भधारण से जुड़ी चुनौतियां, काम के दौरान लगने वाली चोटों या संक्रामक बीमारियों को रोका जाता है."

दिक़्क़त ये है कि दुनिया भर में हिंसा से सख़्ती से निपटने की सोच हावी है. इसलिए हिंसक घटनाओं पर हंगामा होते ही, नेता हों या जनता, सख़्त क़ानून की मांग करने लगते हैं. फिर स्कॉटलैंड में वीआरयू ने कैसे जनता और सरकार का समर्थन हासिल कर के ग्लासगो में अपराध कम किए?

इसकी प्रेरणा उन्हें अमरीका के शहर शिकागो से मिली थी.

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मलावी में लड़कियों में हाथ धोने की आदत डालने के लिए ख़ास कार्यक्रम चलाए गए

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इमेज कैप्शन, मलावी में लड़कियों में हाथ धोने की आदत डालने के लिए ख़ास कार्यक्रम चलाए गए

अमरीका के संक्रामक रोग विशेषज्ञ गैरी स्लटकिन ने 1980 और 1990 के दशक में काफ़ी वक़्त सोमालिया में गुज़ारा था. वो वहां पर टीबी की महामारी की रोकथाम के लिए गए डॉक्टरों की टीम का हिस्सा थे.

गैरी और उनकी टीम ने सोमालिया के टीबी प्रभावित इलाक़ों से जुड़े तमाम आंकड़े इकट्ठा किए. जैसे किस इलाक़े में बीमारी ज़्यादा फैल रही है या लोगों के किस बर्ताव या आदत की वजह से ये बीमारी बढ़ रही है. फिर गैरी और उनकी टीम ने इसकी रोकथाम के लिए ज़रूरी क़दम उठाए.

अक्सर कुछ बीमारियों के पीछे आदतें और कुछ की वजह हालात होते हैं. जैसे कि डायरिया. जो साफ़-सफ़ाई की कमी और संक्रामक पानी की सप्लाई से होता है. अगर हम पानी की सप्लाई को दुरुस्त कर लें. साफ़-सफ़ाई रखें, तो, डायरिया होने की आशंका कम हो जाती है. इस बड़े सुधार के दौरान डायरिया के शिकार लोगों को ओआरएस का घोल देकर उनकी जान बचाई जा सकती है.

शिकागो के साउथ साइड में 2009 में एक रैली

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इमेज कैप्शन, शिकागो के साउथ साइड में 2009 में एक रैली हुई में जैसी जैकसन और रोज़ ब्रैक्सटन. ब्रैक्सटन के 16 साल के भतीजे की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी.

बर्ताव बदलने से मुश्किलें हल हो सकती हैं

लोगों के बर्ताव में बदलाव लाकर हम कई चुनौतियों को जड़ से ख़त्म कर सकते हैं. जैसे सुरक्षित सेक्स के लिए लोगों को कंडोम के इस्तेमाल के लिए राज़ी कर के एड्स को रोका जा सकता है. साफ़-सफ़ाई की आदत से डायरिया जैसी बीमारी को रोका जा सकता है.

ये क़दम तब और असरदार हो जाते हैं, जब एक पीड़ित, दूसरे की मदद करता है. वो अपने ख़ुद के तजुर्बे साझा कर के लोगों का भरोसा जीत सकते हैं. जैसे कोई सेक्स वर्कर दूसरे सेक्स वर्कर के पास जाकर कंडोम के फ़ायदे समझाए या टीबी-हैजा के मरीज़ रहे लोग इसके शिकार लोगों के बीच काम करें.

1990 के दशक के आख़िर में जब गैरी स्लटकिन अमरीका लौटे, तो बीमारियों और इलाज से दूर जाना चाहते थे. लेकिन, जब वो शिकागो पहुंचे, तो देखा कि वहां हिंसक घटनाएं बेक़ाबू हो रही थीं. हत्या की दर बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी.

गैरी ने हिंसा की बीमारी के इलाज की ठानी. उन्होंने बंदूक और हिंसक घटनाओं से जुड़े आंकड़े इकट्ठे किए. ठीक उसी तरह, जैसे उन्होंने बीमारी से जुड़े आंकड़े जमा किए थे.

गैरी बताते हैं कि बीमारी की तरह हिंसक घटनाएं भी एक शख़्स से दूसरे शख़्स तक पहुंच रही थीं. ठीक उसी तरह जैसे सर्दी लगने पर दूसरों को हो जाती है. फ्लू होने पर आस-पास के लोगों को भी हो जाता है. इसी तरह हिंसा से और हिंसा फैल रही थी.

गैरी स्लटकिन की ये सोच हिंसा को लेकर परंपरागत सोच से बिल्कुल अलग थी. वो हिंसा करने वालों को बुरा मानने के आम नज़रिए से अलग सोच रहे थे. हिंसा करने वालों को सज़ा देने के बजाय उन्हें सुधारने की सोच रहे थे, ताकि हिंसा की संक्रामक बीमारी को रोक सकें.

हिंसा के मामले हॉ़न्डूरास में बढ़े हैं

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शिकागो में अफ्रीकी मूल के लोगों की बस्तियां अलग हैं और यूरोपीय मूल या लैटिन अमरीकी लोगों की बस्तियां अलग बसी हैं. लैटिन अमरीकी और अश्वेतों की बस्तियों में संसाधनों की भारी कमी देखी गई है.

सरकारों की अनदेखी का नतीजा ये कि इन इलाक़ों में रोज़गार कम थे. यूरोपीय मूल के लोगों की बस्तियों के मुक़ाबले शिकागो के इन इलाक़ों में हत्या की घटनाएं दस गुना ज़्यादा हो रही थीं.

गैरी का कहना है कि शिकागो में बढ़ती हिंसा के पीछे ये कारण भी नहीं थे. असल वजह थी, मुट्ठी भर युवाओं का हिंसा के रास्ते पर चलना. उनका हिंसक बर्ताव संक्रामक बीमारी की तरह फैल रहा था.

साल 2000 में गैरी ने शिकागो के वेस्ट गारफील्ड इलाक़े में एक प्रायोगिक योजना शुरू की. उन्होंने हिंसा रोकने के लिए वही मॉडल अपनाया, जो सोमालिया में बीमारियों की रोक-थाम के लिए इस्तेमाल किया था. इलाज से बचाव बेहतर के फॉर्मूले पर काम किया. पहले ही साल वेस्ट गारफील्ड इलाक़े में एक साल के भीतर ही हिंसक घटनाओं में 67 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई.

इन नतीजों से उत्साहित होकर गैरी ने अपना प्रोजेक्ट शिकागो के दूसरे इलाक़ों में भी लागू किया. जहां भी गैरी का प्रोजेक्ट शुरू किया गया, वहां हिंसाक की घटनाओं में 40 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई.

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शिकागो पुलिस

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हिंसा का मुक़ाबला करने में कामयाबी

हिंसा से निपटने के गैरी के तरीक़े को दूसरे अमरीकी शहरों में भी अपनाया गया. आज उनकी संस्था 'क्योर वायोलेंस' शिकागो की 13 बस्तियों में हिंसक घटनाएं रोकने पर काम कर रही है. इसके अलावा न्यूयॉर्क, बाल्टीमोर और लॉज एंजेलेस शहरों में भी ऐसे ही प्रोजेक्ट लागू किए गए.

तमाम रिसर्च ने साबित किया है कि क्योर वायोलेंस के काम करने के तरीक़े से हिंसक घटनाओं में 40 से 50 फ़ीसद तक की गिरावट आई है. अमरीका के मशहूर जॉन हॉपकिंस स्कूल ऑफ़ पब्लिक हेल्थ ने भी गैरी के प्रोजेक्ट की कामयाबी पर मुहर लगाई है.

अब कई और अमरीकी देश क्योर वायोलेंस के नुस्खों की मदद से हिंसा रोकने पर काम कर रहे हैं.

क्योर वायोलेंस से जुड़े एक शख़्स हैं दिमेत्रियस कोल. 43 बरस के कोल ने ज़िंदगी के 12 बरस जेल में बिताए हैं. 15 साल की उम्र में उन्होंने अपने सबसे अच्छे दोस्त को गोलीबारी में मरते देखा. 19 साल की उम्र में गाड़ी चोरी की घटना के बाद हिंसा करने के जुर्म में दिमेत्रियस कोल को जेल जाना पड़ा था.

सज़ा पाने वाले का वापिस समाज में आकर साधारण जीवन जी पाना आसान नहीं होता

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इमेज कैप्शन, सज़ा पाने वाले का वापिस समाज में आकर साधारण जीवन जी पाना आसान नहीं होता

पिछले साल अक्टूबर से दिमेत्रियस कोल, क्योर वायोलेंस के लिए काम कर रहे हैं. वो शिकागो की बस्तियों में जाते हैं. अपने तजुर्बे को बताकर लोगों को हिंसा से बचने की सलाह देते हैं.

कोल, किसी इलाक़े में हिंसा होने के बाद लोगों को शांत करने के लिए भेजे जाते हैं. वो ख़ास तौर से उन इलाक़ों में जाते हैं, जहां के लोग उन्हें जानते हैं.

कोल जैसे कई लोग हैं, जो क्योर वायोलेंस के लिए लोगों को समझाने-बुझाने का काम करते हैं. ये वो लोग होते हैं, जो आस-पास के मुहल्लों में रहते हैं. जिनका हिंसा का ख़ुद का इतिहास रहा था और जिसकी वजह से उन्हें बुरा वक़्त काटना पड़ा था.

क्योर वायोलेंस किसी भी इलाक़े में काम शुरू करने से पहले हिंसा से जुड़े आंकड़े जुटाता है. फिर वो लोगों को हिंसा से बचने की सलाह देने पर काम करता है. इसमें स्थानीय लोगों की भूमिका बहुत अहम होती है. क्योंकि जान-पहचान के लोगों पर भरोसा आसानी से हो जाता है.

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सख़्त होने भर से हिंसा नहीं रुकती

2005 में ग्लासगो में वीआरयू की स्थापना से पहले कैरिन मैकक्लस्की और उनकी टीम ने क्योर वायोलेंस के तरीक़ों का अध्ययन किया. इसके अलावा उन्होंने बोस्टन के अपराध वैज्ञानिक डेविड केनेडी के सुझावों को भी समझा.

हिंसा रोकने का केनेडी का मॉडल भी बोस्टन शहर में 1990 के दशक में शुरू किया गया था. इसके तहत हिंसा करने वालों को दो विकल्प दिए जाते थे. या तो वो सख़्त सज़ा भुगतें. या फिर हिंसा को पूरी तरह छोड़ने का वादा करें. शिक्षा हासिल करें. काम करें. इसके साथ ही पुलिस को भी गश्त बढ़ाने और जांच-पड़ताल को और तेज़ करने को कहा जाता था.

स्कॉटलैंड के विल लिंडेन कहते हैं कि ये ज़रूरी इसलिए था कि पुलिस का भरोसा भी जीतना था. उन्हें बताना था कि आप अच्छा काम कर रहे हैं, मगर सिर्फ़ आप के सख़्त होने से हिंसा नहीं रुकने वाली.

आज स्कॉटलैंड में हिंसा रोकने के लिए काम करने वाली वायोलेंस रिसर्च यूनिट यानी VRU पुलिस के साथ काम करती है. इसे स्कॉटलैंड सरकार का समर्थन भी हासिल है.

एक जेल का नज़ारा

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स्कॉटलैंड पुलिस ने अपनाए नए तरीके

स्कॉटलैंड की पुलिस दुनिया की इकलौती पुलिस है, जिसने हिंसा रोकने के लिए बीमारी की रोकथाम जैसे मॉडल पर काम किया है.

जबकि क्योर वायोलेंस यूनिवर्सिटी के ज़रिए चलती है. जबकि बाल्टीमोर और न्यूयॉर्क में ऐसे ही तजुर्बे शहर के स्वास्थ्य विभाग की तरफ़ से किए जा रहे हैं. जिस से डॉक्टर और सामाजिक कार्यकर्ता जुड़े हैं.

ग्लासगो में क्रिस्टीन गुडाल ने 2008 में दो साथी सर्जन के साथ मिलकर मेडिक्स अगेंस्ट वायोलेंस नाम का संगठन शुरू किया. ये संस्था स्कूलों में जाकर बच्चों को छुरेबाज़ी और दूसरी हिंसक वारदातों को लेकर समझाती है. उन्हें एहसास कराती है कि अगर वो किसी साथी को चाकू रखे हुए देखें, तो क्या करें.

इसके अलावा क्रिस्टीन की संस्था हिंसा के शिकार लोगों को भी इलाज करने के साथ-साथ समझाती है. बदला लेने की मानसिकता के नुक़सान समझाती है, ताकि इलाज के बाद वो फिर उसी हिंसक दुष्चक्र में न फंस जाएं.

कोई शराबी है या ड्रग का आदी है, तो उसकी इलाज करने में मदद की जाती है. फिर उसे रोज़गार दिलाने की कोशिश होती है. विल लिंडेन कहते हैं कि उनके संगठन की कोशिशों का असर 6 से 12 हफ़्तों में दिखने लगता है. इतने दिनों में कोई भी शख़्स एकदम से बदला हुआ नज़र आने लगता है.

रैली में पोस्टर थामे प्रदर्शनकारी

विल लिंडेन कहते हैं कि ऐसे प्रयोग के लिए वक़्त चाहिए होता है. चार या पांच साल के चुनाव चक्र के बाद सरकारें बदलती हैं. अगर नई सरकार को ये प्रयोग समझ में नहीं आता, तो बदलने का डर होता है.

लेकिन स्कॉलैंड में कैरिन मैकक्लस्की, क्रिस्टीन गुडाल और विल लिंडेन ने अपने प्रयोगों के लिए बदलती सरकारों से समर्थन हासिल किया है. हालांकि गैरी स्लटकिन कहते हैं कि तमाम सबूत होने के बावजूद, अभी भी सरकारें हिंसा को बीमारी के तौर पर देखने को तैयार नहीं हैं.

लेकिन, ग्लासगो में वीआरयू का काम और बेहतर होता जा रहा है. आज 13 साल बाद कई पुलिसवाले मिशन मोड में काम कर रहे हैं.

ऐसे ही एक पुलिसकर्मी हैं इयान मरे. उन्होंने अमरीका में देखा था कि होमबॉय इंडस्ट्रीज़ नाम की संस्था पुराने अपराधियों को काम पर रखती है और उन्हें सुधरने का मौक़ा देती है.

इसी तर्ज़ पर इयान मरे भी स्कॉटलैंड में ब्रेवहार्ट इंडस्ट्रीज़ नाम की कंपनी चलाते हैं. जो अपराध छोड़ने की चाहत रखने वालों की मदद करती है. उन्हें नौकरी पर रखती है उनके बर्ताव की निगरानी करती है. इयान मरे कहते हैं कि पुलिस अपराधी से सख़्ती से निपटने की उस्ताद है. लेकिन, बेहतर हो कि हम लोगों को अपराध करने से ही रोकें.

इयान की संस्था से जुड़े 80 फ़ीसद लोगों ने हिंसा को पूरी तरह से त्याग दिया और अब सामान्य ज़िंदगी जी रहे हैं.

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(ये बीबीसी फ्यूचर की मूल कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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