मछली या सी-फ़ूड खाने से पहले ज़रा रुकिए

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अगली बार जब आप किसी रेस्टोरेंट में जाएं और वहां मछली या कोई और सी-फ़ूड ऑर्डर करें तो इस तस्वीर को ज़हन में रखें. इस तस्वीर को अगर ज़ूम करके देखेंगे तो बहुत से नीले बिंदु नज़र आएंगे. ये नीले बिंदु दुनिया भर में हज़ारों जहाज़ों से की जाने वाली कमर्शियल फ़िशिंग को दर्शाते हैं.
हमारी धरती के दो तिहाई हिस्से पर समंदर फैले हुए हैं और दुनिया के क़रीब 55 फ़ीसद समुद्री इलाक़े में कारोबार के लिए मछली पकड़ने का काम हो रहा है. ये दुनिया भर में खेती की जाने वाली ज़मीन का चार गुना है.
वैसे तो मछली पकड़ने के लिए अक्सर लोग फ़िशिंग क़ानून का पालन करते हैं. लेकिन कुछ उसका उल्लंघन भी करते हैं. इस से व्यापार और समुद्र दोनों को नुक़सान पहुंचता है.
ऐसे लोग ज़रूरत से ज़्यादा मछली समुद्र से निकाल लेते हैं इससे समुद्र में मछलियों का संतुलन बिगड़ता है, और मछली पालन को भी नुकसान पहुंचता है.
अरबों डॉलर की मछलियां

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बहुत से देश मछली पकड़ने के क़ायदे क़ानून मज़बूती से लागू नहीं करा पाते. इसी वजह से ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से मछली पकड़ने का कारोबार लाखों डॉलर तक पहुंच चुका है.
क़ानूनी और ग़ैर-क़ानूनी दोनों तरीक़ों से हर साल लगभग 23 अरब डॉलर की मछलियां समंदर से पकड़ी जाती है. विश्व खाद्य संगठन के आकलन के मुताबिक़ समुद्र में मछलियों की तादाद कम होने से विश्व भर में लाखों लोगों की नौकरी और खाने का संकट पैदा हो सकता है.
मसला ये है कि ग़ैर कानूनी तरीक़े से मछली पकड़ने का काम छिप कर होता है. समुद्र में लाखों जहाज़ मछली पकड़ते हैं. ऐसे में वैध तरीक़े से कौन मछली पकड़ रहा है और कौन ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से, इसका पता लगाना बहुत मुश्किल हो जाता है.
इस पर रोक लगाने के लिए ही 2016 में स्काई ट्रूथ और गूगल की मदद से ग्लोबल फ़िशिंग वॉच तैयार की गई है जो सैटेलाइट डेटा की मदद से पर्यावरण संरक्षण का काम करती है. ये एक मैपिंग प्लेटफॉर्म है. इस मैप के ज़रिए दुनिया भर में चल रही कमर्शियल फ़िशिंग का पता लगया जा सकता है.
सैटेलाइट का इस्तेमाल

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समुद्र के संरक्षण के लिए काम कर रही संस्था ओशियाना समुद्र में चल रही ग़ैर क़ानूनी गतिविधयों पर नज़र रखने के लिए इस डेटा का इस्तेमाल कर रही है.
बहुत से बड़े-बड़े जहाज़ों में ऑटोमेटिक आईडेंटिफ़िकेशन सिस्टम यानी AIS लगा होता है. सैटेलाइट के ज़रिए इन जहाज़ों की स्थिति पता चलती रहती है और छोटे जहाज़ इनसे टकराने से बच जाते हैं.
इस डेटा के इस्तेमाल से क़रीब 70 हज़ार जहाज़ों को देखा जा सकता है. AIS की वजह से ग्लोबल फ़िशिंग वॉच आंकडों के ज़रिए ये पता लगा लेती है कि कौन सा जहाज़ किस समय मछली पकड़ रहा है.
नक़्शे में नज़र आ रहे लाल रंग वाले इलाक़े को नो-टेक कहा जाता है. ये समुद्र का संरक्षित क्षेत्र है, जहां कमर्शियल फ़िशिंग की इजाज़त नहीं है. नक़्शे में नज़र आ रहे लाल रंग वाले बड़े वर्ग वर्ल्ड हेरिटेज साइट संरक्षित फ़ीनिक्स द्वीप को दर्शाते हैं. ये द्वीप किर्बाती राष्ट्र का है. इस इलाक़े में किरीबाती के समुद्री क़ानून चलते हैं. एक जनवरी 2015 से यहां मछली पकड़ना ग़ैर क़ानूनी है.
लेकिन, पाबंदी के छह महीने बाद ही ग्लोबल फ़िशिंग वॉच से पता चला कि संरक्षित इलाक़े में ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से मछली पकड़ी जा रही है. इस तकनीक की मदद से ही किरीबाती जैसे छोटे से देश ने ग़ैरक़ानूनी फ़िशिंग करने वाली कंपनी पर बीस लाख डॉलर का जुर्माना लगाया. किरीबाती जैसे छोटे देश के लिए ये रक़म बहुत बड़ी थी. ये रक़म इस देश की कुल जीडीपी का एक फ़ीसद थी.
ग्लोबल फ़िशिंग वॉच जहाज़ों पर लगी AIS की बत्ती के ज़रिए उन्हें पहचानती है. सवाल उठता है कि अगर जुर्माना इतना भारी है, तो, ये जहाज़ AIS की बत्तियां बुझा क्यों नहीं देते. अगर जहाज़ बत्तियां बुझा देंगे तो वो अपने लिए ही ख़तरा मोल ले लेंगे. ऐसा करने से रात में दूसरे जहाज़ों से टकराने की संभावना काफ़ी बढ़ जाएगी.
अगर कोई जहाज़ ऐसा करता है, तो ज़ाहिर हो जाएगा कि वो किसी अवैध काम में लगा हुआ है. मसलन, हो सकता है वो किसी ऐसे देश की सरहद में दाखिल हो रहा है, जहां उसे जाने की इजाज़त नहीं है. या हो सकता है कि वो प्रतिबंधित इलाक़े में मछली पकड़ रहे हों. ग्लोबल फ़िशिंग वॉच ने ऐसी हरकतें भी अपने कैमरे में क़ैद की हैं.
ग़ैर कानूनी फ़िशिंग

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ग्लोबल फ़िशिंग वॉच के ज़रिए ट्रांसशिपिंग पर भी नज़र रखी जाती है. ट्रांसशिपिंग के समय जहाज़ पकड़ी गई मछलियां कार्गो वाले जहाज़ पर शिफ़्ट करते हैं. वो यहीं तेल भी भरवाते हैं. ट्रांसशिपिंग के तहत जहाज़ समुद्र में कई महीने तक खड़े रह सकते हैं. ये पूरी तरह से क़ानूनी है.
लेकिन, कई जगह इसकी भी इजाज़त नहीं है. दरअसल इस दौरान दीगर ग़ैर कानूनी गतिविधियां होने लगती है. जैसे मानव तस्करी का ख़तरा बढ़ जाता है. या हो सकता है अगर कोई कर्मचारी जाना चाहता है, उसे यहां बंदी बना कर रखा जा सकता है.
अमरीकी विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक़ फ़िशिंग इंडस्ट्री में कम उम्र बच्चों को तस्करी के ज़रिए लाकर काम पर लगाया जाता है. क़रीब 40 फ़ीसद कर्मचारी 18 से कम उम्र के होते हैं. यहां मारपीट भी ख़ूब होती है.

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समुद्र से मछली पकड़ने के काम में पारदर्शिता लाने के लिए सरकारें अहम रोल निभा सकती हैं. इसके लिए उन्हें वेज़ल मॉनिटरिंग सिस्टम डेटा को सार्वजनिक करना होगा.
इंडोनेशिया इस दिशा में पहल कर चुका है. समुद्र में मछलियों का संतुलन बनाए रखने और ग़ैर कानूनी फ़िशिंग पर लगाम कसने के लिए अन्य देशों से भी ऐसे ही सहयोग की उम्मीद है.
(बीबीसी फ्यूचर की इस मूल स्टोरी को पढ़ने के लिए क्लिक करें)
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