सत्ता को चुनौती देने से पीछे क्यों हट जाते हैं हम

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, मार्था हेनरिक्स
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
ख़ुद के बारे में हम ढेरों ख़याली पुलाव पकाकर रखते हैं. हम सोचते हैं कि मुश्किल हालात में हम सही फ़ैसले करेंगे, ज़रूरत पड़े तो अपने बॉस का भी विरोध करेंगे, किसी को सताया जा रहा हो तो हम वहां दखल देंगे, और अगर हमें कुछ ग़लत करने को कहा जाए तो हम नहीं करेंगे. नैतिकता के पैमाने पर हम ख़ुद को ऊंचा मानते हैं और दबाव में भी ग़लत करने की नहीं सोचते.
वास्तव में हम ऐसा नहीं कर पाते. सत्ता को चुनौती देने का समय आता है तो हम पीछे हो जाते हैं. कुछ नये शोध यह राज़ खोलते हैं कि हमारा मस्तिष्क ऐसा क्यों करता है. दूसरे शब्दों में कहें तो मुश्किल हालात में ऐसा करने में असफल क्यों हो जाता है. यही शोध हमें यह भी बताते हैं कि हम मुश्किल हालात में भी कैसे दृढ़ बने रह सकते हैं और जब ज़रूरत हो तो अपनी बात पर कैसे अडिग रह सकते हैं.
नीदरलैंड्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूरोसाइंस की सोशल न्यूरोलॉजिस्ट एमिली कैस्पर ने कुछ प्रयोग किए.
बिजली के झटकों वाला प्रयोग
कैस्पर ने प्रतिभागियों के एक समूह को एक-दूसरे को बिजली के झटके देने को कहा. 1960 के दशक में स्टैनली मिलग्राम ने भी ऐसे कुछ प्रयोग किए थे, लेकिन कैस्पर के प्रयोग नैतिक और वैज्ञानिक रूप से अलग थे.

इमेज स्रोत, Reuters
कैस्पर ने प्रतिभागियों से कहा कि वे अपने साथी को बिजली के झटके दें जिसके बदले उनको कुछ पैसे मिलेंगे. एक-एक प्रतिभागी को 60 बार बिजली के झटके देने का मौका दिया गया. लगभग आधी बार प्रतिभागियों ने ऐसा नहीं किया. 5 से 10 फ़ीसदी प्रतिभागियों ने हर बार अपने साथी को झटका देने का आदेश मानने से इंकार कर दिया.
अगली बार कैस्पर वहीं खड़ी हो गईं और उन्होंने प्रतिभागियों से बिजली के झटके देने की क्रिया दोहराने को कहा.
इस बार उन प्रतिभागियों ने भी अपने साथियों को झटके लगाने शुरू किए जिन्होंने पहले एक बार भी झटका नहीं लगाया था.
इलेक्ट्रोइन्सेफ़ेलोग्राम (ईईजी) स्कैन से पता चला कि कैस्पर जब झटके लगाने का आदेश दे रही थीं, प्रतिभागियों के दिमाग़ की हलचल बदल रही थी. उनका दिमाग़ उस व्यक्ति की प्रतिक्रिया को पढ़ने-समझने में सक्षम नहीं हो पा रहा था, जिसे झटके लग रहे थे. अपनी क्रिया पर उनका नियंत्रण और उसके प्रति उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो जा रही थी.
कैस्पर कहती हैं, "मैंने 450 प्रतिभागियों पर यह परीक्षण किया और अब तक केवल तीन लोगों ने आदेश मानने से इंकार किया." सवाल है कि ये लोग दूसरों से अलग कैसे हैं?

इमेज स्रोत, Getty Images
चोटिल या बीमार मस्तिष्क के रोगियों पर हुए अध्ययन से इसे समझने में थोड़ी मदद मिलती है. जिन लोगों के दिमाग़ के सबसे अगले और बाहरी हिस्से- प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स में क्षति थी, वे आम लोगों के मुकाबले आदेशों को मानने में ज़्यादा तत्पर थे.
अमरीका में हैमलीन यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ़ लिबरल आर्ट्स में मनोविज्ञान के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर एरिक एस्प कहते हैं, "वे लोग अधिकारियों की बात को तुरंत सुनने और उन्हें मानने को तैयार थे. उन्हें कोई शक भी नहीं था. मतलब ये कि अगर उनसे कहा जाए कि किसी को पीटना है तो वे निश्चित ही ऐसा कर देंगे."
दिमाग़ में विरोध का केंद्र
अब बात दिमाग़ के उस हिस्से की जो सत्ता के विरोध में खड़ा होने में हमारी मदद करता है.
यहूदी परिवार में जन्मे डच दार्शनिक बारूश स्पिनोजा ने "एथिक्स" नामक किताब लिखी थी.

इमेज स्रोत, Getty Images
जीवन, प्रकृति और दर्शन के बारे में स्पिनोजा का मॉडल इसे समझने में हमारी मदद कर सकता है. स्पिनोजा मॉडल कहता है कि किसी नये विचार या तथ्य को समझने के लिए क्षण भर के ही सही, हमें उस पर भरोसा करना पड़ता है.
एरिक एस्प कहते हैं, "समझना ही विश्वास करना है. ये प्रक्रियाएं चाहे जो हो, वे एक ही हैं."
पल भर के विश्वास के बाद आप किसी नये विचार या नई सूचना पर सवाल उठा सकते हैं या उसे खारिज कर सकते हैं. अविश्वास करना या सवाल उठाना एक अलग मानसिक प्रक्रिया है.
एस्प कहते हैं, "प्री-फ़्रंटल कोर्टेक्स के मरीज़ों में यह दूसरी प्रक्रिया नहीं हो पाती." इसलिए आदेश देने वाले की बात पर दो बार विचार करने की जगह वे वही कर गुजरते हैं जो वे सुनते हैं या उनसे करने को कहा जाता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
यदि प्रीफ़्रंटल कोर्टेक्स शक करने और सवाल पूछने की हमारी योग्यता को प्रभावित करते हैं तो स्वस्थ व्यक्तियों में इसे और मज़बूत करने का तरीका भी है. प्रीफ़्रंटल कोर्टेक्स को सुधारा जा सकता है, इसे हुए नुकसान को ठीक किया जा सकता है.
शक करने या सवाल उठाने की योग्यता बढ़ाने का सबसे बेहतर उपाय शिक्षा है. शिक्षा पाकर ही किसी चीज़ या आदेश के बारे में गंभीरता से विचार किया जा सकता है.
देश-समाज का हित
आपके व्यवहार को प्रभावित करने वाला एक अन्य कारक भी है. चेस्टर यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक और सीनियर लेक्चरर मेगन बिर्नी कहती हैं कि 'सत्ता प्रतिष्ठान का कोई नुमाइंदा जब हमसे कुछ करने को कहता है तो हम सामान्यतया वैसा ही करते हैं क्योंकि हम उसके कहने के पीछे के कारण पर विश्वास करते हैं.'
बिर्नी और उनकी सहयोगियों ने एक प्रयोग किया जिसमें लोगों से कुछ ऐसा करने को कहा गया जो नैतिक रूप से ग़लत था. यह देखा गया कि कितने लोग उनकी बात को मानने से इंकार करते हैं.
लोगों को कुछ तस्वीरें दिखाई गईं और उनके बारे में नकारात्मक बातें लिखने को कहा गया. शुरुआत उन तस्वीरों से की गई जिनको आसानी से नापसंद किया जा सके, जैसे जर्मनी की नाजी पार्टी और अमरीका के दक्षिणपंथी कु क्लक्स क्लान की तस्वीरें. धीरे-धीरे उन लोगों को तस्वीरें दिखाई गईं जो तटस्थ थे. फिर आम परिवारों और बच्चों की तस्वीरें दिखाई गईं.

इमेज स्रोत, Reuters
बेकसूर लोगों के लिए नकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल करना भावनात्मक रूप से तकलीफ़देह है और ज़्यादातर प्रतिभागियों ने इसमें असहजता महसूस की. जैसे-जैसे यह प्रक्रिया आगे बढ़ी, कई लोग बीच में ही अलग हो गए. जो रह गए, वे इस विश्वास के साथ रहे कि वे एक महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं और यह एक लंबे मगर वैज्ञानिक शोध का हिस्सा है.
बिर्नी कहती हैं, "जो शोध से अलग हो गए थे, उनमें से कई मेरे पास आए और खेद जताया." प्रतिभागियों के मन में एक किस्म का अपराध बोध था कि उन्होंने सहयोग नहीं किया.
बिर्नी कहती हैं, "जब आप इस तरह की दुविधा वाली स्थिति में होते हैं तो आपके अंदर दो बातें चलती हैं- हां और ना. इनमें से जो बात आपको ज़्यादा सही लगती है, आप उसे चुनते हैं और उसी तरह प्रतिक्रिया देते हैं."
सत्ता का विरोध चुनौतीपूर्ण
यह दुविधा तब ज़्यादा खतरनाक हो जाती है, जब किसी एक वजह या मुद्दे से मज़बूती से जुड़े व्यक्ति को आदेश दिया जाता है.
बिर्नी कहती हैं, "वे यह सोच सकते हैं कि मैंने इस बारे में बहुत कुछ किया है या मैं इस बारे में कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण कर रहा हूं." एक ऐसी स्थिति बन सकती है जब आप यह महसूस करें कि आप जो कर रहे हैं वह बहुत ही ख़तरनाक है. लेकिन यदि हम अपने काम को बहुत महत्वपूर्ण समझते हैं और उसके नतीजे को लेकर उम्मीदों से भरे हैं तो वहां तक पहुंचने के तरीके को भी मंज़ूर कर लेते हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
सत्ता प्रतिष्ठान के विरोध में खड़े होने की योग्यता का बहादुरी, साहस, आत्मविश्वास या जिद से कोई संबंध नहीं है. मस्तिष्क की क्रियाएं और मस्तिष्क के क्षेत्र यह निर्धारित करते हैं कि सत्ता का विरोध करना है या नहीं. इसके अलावा किसी मसले से हमारा जुड़ाव भी अहम रोल निभाता है. कुल मिलाकर यह जटिल प्रक्रिया है.
सत्ता के विरोध के लिए ख़ुद को तैयार करना एक चुनौतीपूर्ण काम है. अभी तक इस बात के सबूत नहीं हैं कि मुश्किल हालात में अपनी प्रतिक्रिया के लिए ख़ुद को तैयार करने की ट्रेनिंग कितनी कारगर हो सकती है. कैस्पर ऐसे ही ट्रेनिंग प्रोग्राम का सपना देखती हैं.
कैस्पर कहती हैं, "मेरा लक्ष्य लोगों को विरोध के लिए तैयार करना है. सेना में भी एक सैनिक की ड्यूटी होती है कि वह आदेशों का पालन करे, लेकिन एक सैनिक का हक़ है कि वह अवैध या अनैतिक आदेशों को ना माने."
"हमें यह पता लगाना है कि लोगों को कैसे प्रशिक्षित किया जाए ताकि चुनौतीपूर्ण हालात में वे ज़्यादा जिम्मेदारी निभा सकें".
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












