मौत देने का वो तरीका जो बेरहम, तड़पानेवाला ना हो

मौत देने का आसान तरीका

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    • Author, जारिया गोरवेट
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर

(चेतावनी: इस स्टोरी में मौत की सज़ा दिए जाने के तरीकों का विवरण है, कुछ पाठकों के लिए ये जानकारी तनाव पैदा करने वाली हो सकती है)

.....'आई लव यू' ये उनके आख़िरी शब्द थे, फिर उन्होंने नमाज़ पढ़ी. हत्या के दोषी चार्ल्स ब्रूक्स जूनियर ने अपनी गर्लफ्रेंड (प्रेमिका) को दूर से देखा और महसूस किया कि मौत उनकी रगो में रेंग रही है.

80 के दशक के लिबास, सुनहरी पैंट और खुले बटन की शर्ट में सफ़ेद स्ट्रेचर पर पड़े वो डॉक्टरों से घिरे हुए थे और उनके एक हाथ में नस के ज़रिए ज़हर का इंजेक्शन लगा था.

1982 की यह घटना, वो पहला मौका था जब अमरीका में किसी अपराधी को मृत्युदंड के लिए इस तरह के घातक इंजेक्शन का इस्तेमाल किया गया.

इस तरीके को अमल में लाने से पहले इलेक्ट्रिक कुर्सी पर बैठा कर मौत की सज़ा दी जाती थी, जिसे आज व्यापक रूप से यातना माना जाता है.

यह इतना हिंसक था कि कभी कभी अपराधी की आंखें बाहर निकल कर उसके गालों पर झूल तक जाती थीं.

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इमेज कैप्शन, 1985 में बिटी लॉउ बीट्स को अपने पांचवे पति की हत्या का दोषी करार दिया गया. 2000 में उन्हें ज़हर के इंजेक्शन से मौत की सज़ा दी गई.

ज़हर का इंजेक्शन इस मायने में बेहतर था कि इसमें ना तो ख़ून बहता था और ना ही चीख. पर इस तरीके पर भी सवाल उठे कि क्या ये उतना ही शांतिपूर्ण है जितना दिखाई देता है. क्योंकि इस पर कोई परीक्षण नहीं किया गया.

पश्चिमी देशों में ये बहस छिड़ी हुई है. मौत की सज़ा पाने वाले किसी इंसान को किस तरह मौत के घाट उतारा जाए कि उसे तकलीफ़ न हो.

क्या किसी को मौत की नींद सुलाने का ऐसा तरीक़ा है, जो बेरहम न हो?

दुनिया में तमाम देश हैं, जहाँ मौत की सज़ा नहीं दी जाती. भारत, दुनिया के उन देशों की सूची में शामिल है, जहां मौत की सज़ा दी जाती है. भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मौत की सज़ा बंद करने पर बहस होती रही है.

भारत में सज़ायाफ़्ता मुजरिम को मौत की सज़ा देने का एक ही तरीक़ा है, फांसी.

वहीं, अमरीका जैसे कई देश हैं, जो घातक इंजेक्शन के ज़रिए मौत की सज़ा पाए इंसान को मौत की नींद सुलाते हैं.

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मौत की सज़ा का 'क्रूर' इतिहास

तारीख़ के पन्ने पलटें, तो सभ्यता का हज़ारों सालों का इतिहास मौत के घाट उतारने के ऐसे तमाम तरीक़ों के क़िस्सों से भरा पड़ा है.

एक दौर था, जब सरेआम जुर्म की सज़ा दी जाती थी. सऊदी अरब से लेकर ईरान तक कई देशों में, आज भी कई जुर्मों की सज़ा सरेआम दी जाती है, ताकि लोग सबक़ ले सकें.

लेकिन, बात पहले के दौर की. जब मौत की सज़ा पाने वाले को बोरे में बांधकर ख़ूंख़ार जानवरों के बीच, पानी में धकेल दिया जाता था. कई देशों में तो पीठ की तरफ़ से लोगों के फेफड़े निकालकर उन्हें मारा जाता था.

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सिर क़लम करने का तरीक़ा, मौत की सज़ा देने का सब से आम तरीक़ा था. भारत में नाराज़ होने पर राजा-महाराजा और बादशाह एक से एक तरीक़े से मौत की सज़ा देते थे. कभी हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया जाता था. तो, कभी ज़िंदा ही दीवार में चुनवा दिया जाता था. और, कभी ऊंची इमारत से फेंक कर मौत की सज़ा दी जाती थी. कई बार इंसानों को शेर या बाघ जैसे खूंख़ार जानवरों के बाड़े में मरने के लिए फेंक दिया जाता था.

फ़ारस, यानी आज के ईरान में किसी शख़्स को दो नावों के बीच में दबाकर उसे शहद और दूध से नहला दिया जाता था. कीड़े उस इंसान को धीरे-धीरे खा जाते थे.

लेकिन, धीरे-धीरे मौत की सज़ा को सभ्य तरीक़े से देने का ख़याल समाज को आने लगा.

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गिलोटिन से मौत की सज़ा

अठारहवीं सदी के आख़िर में फ्रांस में क्रांति की शुरुआत में फ्रेंच रईसों को बड़ी बेरहमी से मारा गया. किसी का सिर कुल्हाड़ी से काट डाला गया, तो किसी का पत्थर से फोड़ कर इसे मौत के घाट उतार दिया गया. फ्रेंच क्रांति के आख़िरी दिनों में गिलोटिन से फांसी दी जाने लगी.

हुआ यूं था कि फ्रांस के एक डॉक्टर जोसेफ़ इग्नेस गिलोटिन को महसूस हुआ कि मौत की सज़ा देने में भी इंसानियत होनी चाहिए. डॉक्टर गिलोटिन ने एलान किया कि अब मौत के घाट उतारे जाने वाले का सिर पलक झपकते ही धड़ से अलग करने का ये तरीक़ा ही इस्तेमाल होगा.

वैसे, डॉक्टर ने गिलोटिन ईजाद नहीं किया था, मगर इसकी वक़ालत के चलते डॉक्टर का नाम मौत देने के इस तरीक़े को मिल गया.

लेकिन, गिलोटिन से मौत की सज़ा कितनी कम दर्दनाक थी, इसका पता लगाने के लिए प्रयोगशाला में कुछ चूहों पर प्रयोग किए गए. कुछ प्रयोगों के लिए चूहों को ऐसे मारा जाता है. 1975 में हुई रिसर्च से पता चला कि मारे गए चूहों को 9 से 18 सेकेंड तक मरने से पहले तड़प झेलनी पड़ी. ये तजुर्बा बाद में कुछ और जानवरों पर रिसर्च में भी सही पाया गया.

साफ़ है कि गिलोटिन से मारे जाने वाले इंसानो को भी ऐसे ही दर्दनाक लम्हों से गुज़रना होता होगा.

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सूली पर लटकाना

सऊदी अरब जैसे कई देश हैं, जहां अभी भी लोगों को सिर क़लम कर के मौत के घाट उतारा जाता है. 2017 में ही सऊदी अरब में 146 लोगों का सिर काट कर उन्हें मौत की सज़ा दी गई.

लेकिन, आज की तारीख़ में मौत की सज़ा वाले ज़्यादातर देशों में लोगों को फांसी पर लटकाया जाता है.

इसके भी दो तरीक़े होते हैं.

पहला तरीक़ा है कम ऊंचाई से लटकाना. इसे बेहद तकलीफ़देह तरीक़ा माना जाता है. इसमें किसी इंसान को कम ऊंचाई से लटकाया जाता है. फिर फंदा गर्दन पर कसने से उसकी दम घुटने से मौत हो जाती है.

मौत की सज़ा का ये तरीक़ा दर्दनाक माना जाता है.

दूसरा तरीक़ा है, ज़्यादा ऊंचाई से झटका देकर सूली पर लटकाना. इसमें रस्सी के झटके से फांसी की सज़ा पाने वाले इंसान के गले की दूसरी हड्डी टूट जाती है. इससे स्पाइनल कॉर्ड यानी मेरु रज्जु, जो हमारे दिमाग़ को शरीर के बाक़ी हिस्सों के तंत्रिका तंत्र से जोड़ती है, वो टूट जाती है. इसमें एक सेकेंड से भी कम वक़्त में इंसान का ब्लड प्रेशर ज़ीरो हो जाता है. इंसान फ़ौरन अचेत हो जाता है. लेकिन उसके दिल की धड़कन रुकने में क़रीब 20 मिनट और समय लगता है.

इस तरीक़े के साथ सबसे बड़ा मसला ये है कि इंसान की लंबाई के हिसाब से उसे कितनी ऊंचाई से लटकाया जाए, इसका एकदम सटीक गुणा-गणित लगाना होता है. अगर लंबाई ज़्यादा है, तो हो सकता है कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूटे ही न. और कम है, तो फिर, उसकी मौत दम घुटने से ही होगी.

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अमरीका में मौत की पहली सज़ा

अमरीका के बर्कले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया में डेथ पेनाल्टी क्लिनिक चलाने वाली मेगन मैक्क्रैकेन कहती हैं कि अक्सर लंबी ऊंचाई से फांसी के मामले में लोग ग़लत हिसाब लगाते हैं. मरने वाला बहुत दर्दनाक वक़्त से गुज़रता है.

अमरीका में 1996 के बाद से किसी को सूली पर नहीं लटकाया गया है.

ज़्यादातर अमरीकी राज्यों में मौत की सज़ा घातक इंजेक्शन के ज़रिए दी जाती है.

अमरीका में इंजेक्शन से सब से पहले मौत की सज़ा चार्ल्स ब्रुक्स जूनियर नाम के हत्यारे को 1982 में दी गई थी.

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इससे पहले अमरीका में लोगों को बिजली के झटके वाली कुर्सी पर बैठाकर मौत की सज़ा दी जाती थी. ये सज़ा कम और टॉर्चर ज़्यादा थी. जिसमें कई बार सज़ा पाने वाले की आंखें लटककर बाहर आ जाती थीं.

कभी कभी सज़ा के वक़्त बिजली के झटके से अपराधी के बालों में आग लग जाती थी.

इसीलिए जब प्राण लेने वाले इंजेक्शन से मौत की सज़ा दी जाने लगी, तो अमरीकी मानवाधिकार संस्थानों ने इसे मानवीय तरीक़ा बताया.

लेकिन, अब इस तरीक़े पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. क्योंकि एक तो मारने वाले घातक इंजेक्शन नहीं मिल रहे हैं. वहीं, दूसरी तरफ़ ये भी कहा जा रहा है कि इंजेक्शन देने से मरने के बीच के वक्त तक, इंसान को बहुत तकलीफ़ होती है.

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2005 में अमरीका के इंडियानापोलिस सूबे के लियोनिडास कोनियारिस ने इस पर रिसर्च की. पता ये चला कि मौत की सज़ा पाने वाले कम से कम 44 फ़ीसद लोगों को मरते वक़्त इसका एहसास हो रहा था. वो बेहद तकलीफ़ में थे. मगर इंजेक्शन के असर से वो कुछ बोल नहीं पाए, या चीख नहीं पाए.

एक और रिसर्च से पता चला कि ऐसे घातक इंजेक्शन में डाली जाने वाली जिस दवा से ये उम्मीद थी कि वो दिल की धड़कनें रोक देगी, वो काम ही नहीं कर रही थी.

आज ज़्यादातर अमरीकी जो मौत की सज़ा के हक़ में हैं, वो ये भी चाहते हैं कि मारने का तरीक़ा ऐसा हो कि अपराधी को तकलीफ़ न हो.

लेकिन, घातक इंजेक्शन से मौत की सज़ा के कई मामले ऐसे हुए हैं, जिसमें कई कोशिशों के बाद इंसान की जान ली जा सकी. एक अपराधी तो मरने से पहले क़रीब दो घंटे तक तड़पता रहा. उसे 640 बार हिचकियां आईं.

इसीलिए, अब मौत की सज़ा देने के मानवीय तरीक़े तलाशे जा रहे हैं.

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फायरिंग स्क्वॉड

जो लोग सैन्य अपराध या युद्ध से जुड़े रहे हैं, उन्हें इस तरीक़े से मौत की सज़ा के बारे में पता होगा. हाल ही में अमरीका के यूटा प्रांत ने फायरिंग स्क्वॉड से मौत की नींद सुलाने के तरीक़े को फिर से अपना लिया है.

लेकिन, इसका लंबा चौड़ा इतिहास रहा है. भारत में 1857 की जंग में बाग़ी बने तमाम हिंदुस्तानियों को अंग्रेज़ों ने मौत के घाट उतार दिया था.

फायरिंग स्क्वॉड से मौत की सज़ा के लिए किसी इंसान को एक कुर्सी से बांध दिया जाता है. उसके सिर पर नक़ाब पहना दिया जाता है. फिर पांच निशानेबाज़ उसके सीने पर गोलियां दागते हैं. इनमें से एक की बंदूक ख़ाली होती है.

अमरीका के यूटा सूबे में 1938 में 40 साल के एक शख़्स जॉन डीरिंग को क़त्ल के जुर्म में फायरिंग स्क्वॉड से मौत की सज़ा दी गई थी. मरने से पहले जॉन डीरिंग के दिल की हरकत को रिकॉर्ड करने के लिए इलेक्ट्रो कार्डियोग्राम से जोड़ने का फ़ैसला किया.

पता ये चला कि गोली लगने के ठीक 15 सेकेंड बाद उसके दिल ने धड़कना बंद कर दिया था. हालांकि ये पता लगा पाना नामुमकिन है कि वो कितनी देर दर्द सहता रहा. मगर जानवरों पर हुए तजुर्बे बताते हैं कि इसके बाद क़रीब 30 सेकेंड तक चूहे तकलीफ़ में रहे.

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बिजली के झटके वाली कुर्सी

1887 में अमरीका के न्यूयॉर्क राज्य में इंसान को मारने के 34 तरीक़ों पर एक रिसर्च हुई. इसके नतीजे बेहद डरावने थे. इस रिपोर्ट को तैयार करने वालों में से एक दांतों के डॉक्टर ने बिजली के झटके से मौत की सज़ा देने की सिफ़ारिश की.

तीन साल बाद यानी 1890 को पहली बार एक हत्यारे को बिजली के झटके से मौत की सज़ा दी गई.

उस दौर में इसे मौत की सज़ा देने का मानवीय तरीक़ा समझा गया था. मगर, जल्द ही इसके ख़राब नतीजे सामने आए और इसका विरोध होने लगा.

हालांकि, आज भी 9 अमरीकी राज्यों ने पहले तरीक़े यानी इंजेक्शन से मौत ना होने पर बिजली के झटके से मौत की सज़ा के विकल्प क़ानूनी तौर पर रखा है.

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नाइट्रोजन हाइपोक्सिया

ये मौत की सज़ा देने का सबसे नया तरीक़ा है. इसकी चर्चा बीबीसी की एक डॉक्यूमेंट्री How to Kill a Human Being से तेज़ हुई. इसे पूर्व सांसद माइकल पोर्टिलो ने पेश किया था.

हवा में 78 फ़ीसद नाइट्रोजन होती है. हवा में अगर सिर्फ़ नाइट्रोजन हो, तो 17-20 सेकेंड के अंदर मौत हो जाती है. जानवरों में तो 3 सेकेंड के बाद ही सांस रुकने की घटनाएं दर्ज की गई हैं.

और विज्ञान कहता है कि हमारा शरीर हवा में ऑक्सीजन न होने की बात महसूस ही नहीं कर सकता. वर्ज़िश के बाद हमारे पैरों में दर्द इसलिए होता है क्योंकि कार्बन डाई ऑक्साइड ज़्यादा हो जाती है.

यानी, हवा में सिर्फ़ नाइट्रोजन होगी, तो मौत दम घुटने से होगी, मगर दम घुटने का एहसास नहीं होगा.

अमरीका के बोस्टन में रहने वाले पायलट जॉन लेविनसन ने एक बार विमान उड़ाते वक़्त कुछ देर के लिए ऑक्सीजन का मास्क हटा दिया. क़रीब 30 सेकेंड बाद उन्हें अजीब महसूस होने लगा. उन्हें दर्द या झटका तो नहीं लगा. मगर अजीब लगा.

ऑक्सीजन की कमी से इंसान अचेत हो सकता है. अच्छी बात ये रही कि लेविंसन के साथ उनके ट्रेनर थे, जो उनके अचेत होने की सूरत में विमान नीचे ला सकते थे.

अब 3 अमरीकी राज्यों ने मौत की सज़ा देने के लिए नाइट्रोजन हाइपोक्सिया को बैक-अप के विकल्प पर क़ानूनी मान्यता दे दी है.

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लेकिन, इसका भी विरोध हो रहा है. जानकार कहते हैं कि इस तरीक़े से मरने वालों को भी मरने से पहले लंबे वक़्त तक मौत होने के एहसास से गुज़रना पड़ता है.

अमरीका में जानवरों के अधिकार के लिए लड़ने वाली संस्थाएं भी इसका विरोध कर रही हैं.

इस तरीक़े से मौत की सज़ा देने की पहली शर्त ये है कि मरने वाला इसमें साझीदार बने. अगर वो देर तक सांस रोके रखता है, तो ये तरीक़ा उसे मौत की नींद सुलाने में काफ़ी वक़्त ले लेगा.

कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के डेथ पेनाल्टी इन्फॉर्मेशन सेंटर के रॉबर्ट डनहम कहते हैं कि इसके लिए पहले सज़ा पाने वाले को एनस्थीसिया देकर अचेत करना होगा.

आज की तारीख़ में कोई दवा कंपनी ये नहीं चाहती कि उसकी दवा से किसी की मौत की बात आम हो. तो, फिर मसला घूम-फिरकर वहीं पहुंचता है. वो एनस्थीसिया कौन देगा, जो मरने वाले को पहले अचेत करेगा?

ये कैसी विडंबना है कि लोग मौत की सज़ा भी देना चाहते हैं और इसे दर्दनाक भी नहीं होने देना चाहते.

(जारिया गोरवेट की मूल स्टोरी में हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं.)

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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