भारी-भरकम सैटेलाइट की जगह ले लेंगे हवा से हल्के गुब्बारे

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- Author, डेविड हैम्बलिंग
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
आज आपको आने वाले भविष्य की खिड़की से बाहर की एक तस्वीर दिखाते हैं. मंज़र कुछ यूं है: धरती से ऊपर किसी ठिकाने पर बैठे सैलानी खिड़की से बड़े उत्साह से झांक रहे हैं. वो काले आसमान में टिमटिमाते सितारे देखते हैं.
उनके नीचे नीली धरती चमकती दिखाई देती है. सैलानी बड़े उत्साहित हैं. उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि चांद-तारों के बीच बैठकर ये ख़ूबसूरत नज़ारा देखेंगे. सो, उन्हें यक़ीन ही नहीं हो रहा है कि वो किसी ऐसी जगह पर पहुंचे हैं, जहां से वो चांद-तारों को छूने का एहसास कर सकते हैं.
आप सोचेंगे कि ये टूरिस्ट किसी अंतरिक्ष यान में बैठे होंगे. लेकिन, ऐसा नहीं है. ये कोई स्पेसक्राफ्ट नहीं, बल्कि एक बड़ा सा गुब्बारा है. और इसे अमरीकी स्पेस एजेंसी नासा ने नहीं छोड़ा. बल्कि चीन ने मंगोलिया से अंतरिक्ष के सफ़र पर भेजा है. इस में बैठे सैलानी पश्चिमी देशों के नहीं, बल्कि चीनी नागरिक हैं.
भविष्य की ये तस्वीर कोरी कल्पना नहीं है. बल्कि बहुत जल्द आप को हक़ीक़त में बदलती दिख सकती है.
अंतरिक्ष की रेस में शामिल हुए ये तकनीक के नए 'घोड़े' या यूं कहें कि गुब्बारे हैं.


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1958 में रूस ने स्पुतनिक नाम के सैटेलाइट को अंतरिक्ष भेजकर दुनिया में तहलका मचा दिया था. आनन-फ़ानन में अमरीका ने अपनी स्पेस एजेंसी नासा का गठन किया.
शीत युद्ध के दौरान चली स्पेस रेस में आख़िरकार अमरीका ने रूस को मात दे दी. आज की तारीख़ में अंतरिक्ष की बात करें, तो अमरीका दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त है.
लेकिन, स्पुतनिक लॉन्च हुए अब साठ साल बीत गए हैं. स्पेस रेस अलग ही पैमानों पर हो रही है. अब बड़े से बड़े सैटेलाइट लॉन्च करने के बजाय गुब्बारों से अंतरिक्ष में नई छलांग लगाई जा रही है.
गुब्बारे, अंतरिक्ष में बहुत काम के हो सकते हैं. धरती से क़रीब 30 किलोमीटर की ऊंचाई पर इन्हें स्थापित कर के संचार और निगरानी के साथ इंटरनेट सेवाएं देने का काम लिया जा सकता है. किसी उपग्रह के मुक़ाबले ये गुब्बारे बहुत सस्ते पड़ते हैं. ज़रूरत पड़ने पर इन्हें आसानी से मरम्मत के लिए वापस धरती पर लाया जा सकता है.

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अंतरिक्ष में गुब्बारे भेजने की शुरुआत नासा ने 50 के दशक में की थी. आज अमरीकी एजेंसी गुब्बारों का इस्तेमाल वायुमंडलीय रिसर्च में करती है.
इससे धरती पर निगाह रखी जाती है और ब्रह्मांड से आने वाली किरणों का अध्ययन किया जाता है. कई गुब्बारे तो मशहूर सेंट पॉल के गिरजाघर से भी सात गुना बड़े हैं. ये प्लास्टिक से बने होते हैं और इनकी मोटाई सैंडविच के बराबर होती है. इन गुब्बारों में हीलियम गैस भरी हो सकती है.
गुब्बारों के साथ दिक़्कत ये है कि ये अपनी जगह से उड़कर दूसरी जगह जाने लगते हैं. लेकिन अब ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है कि इन्हें अंतरिक्ष में स्थिर रखा जा सके.
अमरीकी अंतरिक्ष कंपनी नैनोरॉक्स के सीईओ जेफ्री मैनबर कहते हैं कि हम गुब्बारों को अंतरिक्ष में रखने को लेकर नई-नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं. जेफ्री के मुताबिक़, "हम दोबारा उस दौर में जा रहे हैं, जब गुब्बारों के ज़रिए हम आसमां को छूने की कोशिश करते थे."
"धरती के ऊपर जो वायुमंडल है उसका सबसे ऊपरी हिस्सा स्ट्रैटोस्फेयर कहलाता है. इसकी वजह ये है कि इसमें कई परतें होती हैं और हवा अलग-अलग दिशाओं में चलती है. नतीजा ये होता है कि गुब्बारा किसी भी दिशा में उड़कर जा सकता है."


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गूगल की मालिक कंपनी अल्फ़ाबेट, अंतरिक्ष में गुब्बारों को भेजने के लिए 'प्रोजेक्ट लून' पर काम कर रही है.
इसके तहत अल्फ़ाबेट ने अंतरिक्ष में गुब्बारे भेजकर संचार सुविधाएं देने का काम किया है. गुब्बारों में ऐसी मशीनें लगाई जा रही हैं, जो हवा के रुख़ के हिसाब से इसकी ऊंचाई स्ट्रैटोस्फेयर में घटा या बढ़ा सकती हैं.
अभी पिछले साल प्रोजेक्ट लून के तहत प्यूर्टो रिको में क़रीब 3 लाख लोगों को इंटरनेट सुविधा गुब्बारों के ज़रिए मुहैया कराई गई थी.
समुद्री तूफ़ान मारिया की वजह से प्यूर्टो रिको में इंटरनेट सेवाएं देने वाले सिस्टम तबाह हो गए थे. इसी मिशन की कामयाबी से उत्साहित होकर अब अल्फ़ाबेट इस प्रोजेक्ट को दुनिया के दूसरे हिस्सों में लागू करने की तैयारी कर रही है.

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इसी तरह अमरीका के टक्सन स्थित कंपनी वर्ल्ड व्यू गुब्बारों की मदद से न सिर्फ़ इंटरनेट की सुविधा देने, बल्कि निगरानी का काम भी करने की कोशिश कर रही है.
कंपनी की अधिकारी एंजेलिका डेलुसिया मॉरिसे कहती हैं कि "गुब्बारों को अंतरिक्ष में भेजकर हम अनगिनत फ़ायदे उठा सकते हैं. जैसे कि जंगल में लगी आग की निगरानी हो सकती है. तूफानों की आमद का पता लगाया जा सकता है. समंदर में डकैती पर निगरानी रखी जा सकती है. फ़सलों की सेहत पर नज़र रखी जा सकती है."
आज से तीन साल पहले वर्ल्ड व्यू कंपनी के लक्ष्य ख्वाब सरीखे लगते थे. लेकिन एक के बाद एक कई कामयाब टेस्ट फ्लाइट के बाद कंपनी को कई सरकारी ठेके मिल चुके हैं. कई निजी कंपनियों ने भी वर्ल्ड व्यू को काम दिया है. यहां तक कि सैन्य अधिकारी भी वर्ल्ड व्यू के गुब्बारों, स्ट्रैटोलाइट के बहुत सारे फ़ायदे गिनाते हैं.
अमरीकी सदर्न कमांड के प्रमुख एडमिरल कुर्त टिड कहते हैं कि "ये गेम चेंजर फॉर्मूला है. इससे दुनिया के तमाम हिस्सों पर निगरानी की जा सकेगी."
"इसी तकनीक से हम मौसम के बदलावों पर निगाह रख सकते हैं. जैसे कि किसी समुद्री तूफ़ान के मूवमेंट पर क़रीबी नज़र रखी जा सकती है."


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वर्ल्ड व्यू के मौजूदा स्ट्रैटोलाइट गुब्बारे क़रीब 50 किलो वज़नी मशीनें अपने साथ ले जा सकते हैं. इनमें सोलर सेल लगी होती हैं, जिससे ये अनंत काल तक काम कर सके हैं.
अब तो इनसे भी बड़े गुब्बारे बनाने की तैयारी है. बड़े गुब्बारों की मदद से अंतरिक्ष में सैलानियों को भी सैर के लिए भेजा जा सकेगा. इसी तकनीक से दूर-दराज़ के इलाक़ों तक किसी आपदा के दौरान मदद भी पहुंचाई जा सकती है. अमरीकी कंपनियों को इस सेक्टर में चीन से कड़ी टक्कर मिल रही है.
चीन की कंपनी कुआंगशी साइंस (KC) की स्थापना 2010 मे शेनजान में हुई थी. ये गुब्बारों से बनी एयरशिप को अंतरिक्ष में भेजकर संचार सुविधाएं मुहैया कराती है. आजकल ये कंपनी ट्रैवेलर बैलून विकसित कर रही है. इसके ज़रिए अंतरिक्ष में टूरिस्ट भेजने की योजना है.
कंपनी के प्रमुख चाऊ फेई कहते हैं कि हम रिमोट सेंसिंग तकनीक और दूरसंचार सुविधाएं मुहैया कराने पर ज़ोर दे रहे हैं. चाऊ कहते हैं कि किसी सैटेलाइट के मुक़ाबले ऐसे संचार गुब्बारे दस से सौ गुने तक सस्ते पड़ते हैं.


ट्रैवेलर बैलून के ज़रिए केसी साइंस, अंतरिक्ष में मुसाफ़िरों को ले जाने के प्लान पर भी काम कर रही है. पिछले साल अक्टूबर में कंपनी ने एक गुब्बारा अंतरिक्ष में भेजा था जिसमें एक कछुआ था.
इसे सुरक्षित वापस धरती पर लाने में कंपनी को कामयाबी मिली थी. चाऊ का मानना है कि 2021 तक उनकी कंपनी एक लाख डॉलर के टिकट पर लोगों को अंतरिक्ष की सैर के लिए भेजने लगेगी.
इसके अलावा ट्रैवेलर बैलून की मदद से भविष्य में लॉन्च पैड विकसित करने में मदद मिलेगी. मतलब ये कि इन गुब्बारों से अंतरिक्ष में छोटे रॉकेट और छोटे-छोटे रिसर्च सैटेलाइट भी लॉन्च किए जा सकेंगे.
इनकी मदद से भविष्य में ड्रोन भी लॉन्च किए जा सकेंगे. केसी साइंस के प्रोजेक्ट में चीन की सेना भी दिलचस्पी ले रही है. चीन की सेना को लगता है कि ये सैन्य निगरानी का बेहद सस्ता ज़रिया हो सकता है.
यानी अंतरिक्ष में कम ऊंचाई वाली रेस बहुत तेज़ हो चुकी है. फिलहाल तो अमरीका इस में सब से आगे है. मगर, चीन भी ज़्यादा पीछे नहीं.
(डेविड हैम्बलिंग की मूल स्टोरी में हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं.)
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