भारत का वो राज्य जहाँ तीरंदाज़ी पर सट्टा, कमाई का बड़ा ज़रिया है

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    • Author, चारूकेसी रामादुरई
    • पदनाम, बीबीसी ट्रेवल

तीर से निशाने लगाए जाते हैं. उनसे युद्ध लड़े और जीते जाते हैं. मगर, आपको ये जानकर हैरानी होगी कि तीर से लॉटरी भी खेली जा सकती है!

यक़ीन नहीं होता, तो चलिए हमारे साथ पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय की सैर पर.

मेघालय यानी बादलों का घर. इसकी राजधानी है शिलॉन्ग. शिलॉन्ग के पुलिस बाज़ार से गुज़रिए, तो सड़कों के किनारे तमाम छोटी-छोटी दुकानें दिखती हैं.

इन दुकानों पर आपको कुछ ऐसी चीज़ बिकती दिखती है, जो लॉटरी का टिकट लगती है. इन दुकानों के सामने ब्लैकबोर्ड पर कुछ नंबर लिखे होते हैं.

दुकानों के बाहर खड़े लोग बड़े उत्साह से इन नंबरों के बारे में चर्चा करते रहते हैं.

फिर वो दुकान से पर्ची ख़रीदते हैं. उन पर्चियों पर ब्लैकबोर्ड में लिखे नंबर दर्ज होते हैं.

मेघालय

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1 से लेकर 99 तक

तीर, शिलौंग में रोज़मर्रा की ज़िंदगी का अहम हिस्सा है. मेघालय के लोगों का तीर से सदियों का नाता रहा है.

कभी इसका इस्तेमाल दुश्मन को हराने और बाहरी हमलों से अपनी हिफ़ाज़त में किया जाता था.

मगर, आज तीर से लॉटरी के नंबर का शिकार किया जाता है.

इस दिलचस्प खेल या यूं कहें कि जुए में आप को एक से लेकर 99 तक किसी भी नंबर पर दांव यानी पैसा लगाना होता है.

इसके बाद होता है तीर चलाने का मुक़ाबला. जितने तीर निशाने पर लगते हैं, उनकी संख्या अगर आपके लगाए दांव के नंबर से मिलती है, तो आपकी अच्छी कमाई हो जाती है.

दांव ख़ाली गया, तो अगली बार का इंतज़ार.

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लॉटरी पर दांव

सुबह के वक़्त आप इन दुकानों पर अपने दांव लगा सकते हैं. यानी लॉटरी ख़रीद सकते हैं.

इसके बाद भीड़ चल पड़ती है शिलौंग के पोलो मैदान की तरफ़. अब इस मैदान का नाम ख़ासी हिल्स आर्चरी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट हो गया है.

यहां पर तीर कमान लिए क़रीब 50 धनुर्धर जमा हैं. घेरा बनाकर बैठे इन तीर-धनुष के उस्तादों में से ज़्यादातर आप को पान चबाते हुए दिखेंगे. जिनके दांत लाल होंगे.

साथ ही भीड़ है तीर वाली लॉटरी पर दांव लगाने वालों की.

रेफ़री के इशारे पर मैदान में सन्नाटा पसर जाता है. इसके बाद हर धनुर्धर एक के बाद एक 30 तीर निशाने पर छोड़ता है.

मौक़े पर मौजूद लोगों की आंखों के सामने तीरों की बौछार सी होती मालूम होती है.

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इमेज कैप्शन, प्रोफ़ेसर डेसमंड खार्माफलांग कहते हैं, 'तीर-धनुष से निशानेबाज़ी की जड़ें खासी समुदाय में काफी गहरी हैं. इससे कई क़िस्से-कहानियां मिथक भी जुड़े हुए हैं, जो आज भी सुने-सुनाए जाते हैं'

गहरी हैं निशानेबाज़ी की जड़ें

मेघालय की खासी जनजाति के लिए तीर चलाना खेल भी रहा है और आत्मरक्षा का ज़रिया भी.

ज़्यादातर पूर्वोत्तर राज्यों की तरह मेघालय भी देश की मुख्यधारा से अलग-थलग जनजातीय ज़िंदगी जीता रहा था.

आज भी मेघालय में राजधानी शिलॉन्ग के सिवा कोई बड़ा शहर नहीं है. यहां की ज़िंदगी अभी भी ग्रामीण और जंगली परिवेश वाली ही है.

लोगों के लिए तीर से निशाना साधना समय काटने का बड़ा ज़रिया रहा है.

शिलौंग की नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डेसमंड खार्माफलांग कहते हैं, 'तीर-धनुष से निशानेबाज़ी की जड़ें खासी समुदाय में काफी गहरी हैं. इससे कई क़िस्से-कहानियां मिथक भी जुड़े हुए हैं, जो आज भी सुने-सुनाए जाते हैं'.

डेसमंड खार्माफलांग के मुताबिक़, धनुर्विद्या खासी लोगों को ऊपरवाले से तोहफे में मिली थी.

मिथक कहता है कि ख़ुद भगवान ने इसे स्थानीय देवी का शिनाम को सिखाया था. उस देवी का शिनाम ने फिर ये तीर कमान अपने बेटों यू शिना और यू बतितों को विरासत में सौंपी. इससे खेलते-खेलते दोनों बच्चे बहुत बड़े निशानेबाज़ बन गए.

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इमेज कैप्शन, मेघालय में ऐसे 5,000 से ज़्यादा लॉटरी काउंटर हैं, जिनमें से 1,500 अकेले शिलॉन्ग शहर में हैं

ब्रिटिश सेना से मुक़ाबला

मेघालय के लोगों के बीच ये दैवीय कला आज भी ख़ूब रचती-बसती है.

डेसमंड खार्माफलांग बताते हैं कि मेघालय में आज भी जब कोई लड़का पैदा होता है, तो उसके बगल में तीन तीर और धनुष रखे जाते हैं.

पहला तीर उसकी ज़मीन की निशानी होता है. तो, दूसरा तीर उसके ख़ानदान की पहचान और तीसरा तीर ख़ुद उसकी पहचान बनता है.

लोगों की मौत के बाद इस धनुष को उनके साथ रखा जाता है. ये तीर किसी भी लड़के के जन्म के बाद से सहेजकर रखे जाते हैं.

मौत के बाद उन्हें आसमान की तरफ़ निशाना साधकर फेंका जाता है. इसका मतलब ये होता है कि ये तीर उस आदमी के साथ जन्नत तक जाएंगे.

तीर से निशानेबाज़ी का हालिया इतिहास उन्नीसवीं सदी के आग़ाज़ से शुरू होता है.

अप्रैल, 1829 में स्थानीय योद्धा यू तिरोत सिग सिएम ने धनुर्धरों की सेना के साथ ब्रिटिश सेना का मुक़ाबला किया था.

हालांकि इस जंग में वो अंग्रेज़ों से हार गए. मगर आज भी उनकी बहादुरी के क़िस्से चलन में हैं. यू तिरोत सिग सिएम को इस इलाक़े का सबसे बहादुर स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है.

वीडियो कैप्शन, मेघालय में पेड़ों के पुल

लॉटरी: अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान

भारत के आज़ाद होने के बाद से मेघालय को देश की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिशें शुरू हुईं.

तरक़्क़ी के साथ-साथ तीर-कमान का चलन कम हो गया. अब ये टाइमपास के तौर पर ही सीखा और इस्तेमाल किया जाता है.

हालांकि आज भी शिलौंग और राज्य के दूसरे इलाक़ों में तीर-कमान से निशानेबाज़ी के बड़े मुक़ाबले आयोजित किए जाते हैं.

अक्सर ऐसे आयोजन त्यौहारों पर होते हैं. इन्हें जीतना शान की बात मानी जाती है. दूर-दूर से तीरंदाज़ ऐसे मुक़ाबलों में हिस्सा लेने के लिए आते हैं.

विजेताओं को इनाम में मोटी रक़म मिलती है. कई बार तो बड़े कारोबारी घराने भी ऐसे आयोजनों के प्रायोजक बनते हैं.

वक़्त के साथ तीरंदाज़ी में जुए के दांव भी शामिल हो गए. पहले मेघालय सरकार ने लॉटरी पर रोक लगा रखी थी. लेकिन आज इसका राज्य की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान माना जाता है.

आज तीरंदाज़ी मेघालय की संस्कृति का अटूट हिस्सा बन गई है.

स्थानीय सरकार के मुताबिक़ पूरे मेघालय में क़रीब पांच हज़ार सट्टेबाज़ हैं, जो तीरंदाज़ी के मुक़ाबले में सट्टा लगाते हैं. इनमे से 1500 तो अकेले शिलौंग में सक्रिय हैं.

तीरंदाज़ी में सट्टा लगाने वाले को एक रुपए के बदले में 500 रुपए तक की कमाई हो सकती है. हारने पर नई बाज़ी का इंतज़ार किया जाता है.

स्थानीय ट्रैवल ब्लॉगर अमृता दास यहीं पली-बढ़ी थीं. अब वो बाहर रहती हैं. लेकिन साल में तीन-चार बार अपने माता-पिता से मिलने आती हैं.

अमृता जब भी आती हैं, तो वो तीरंदाज़ी में सट्टा ज़रूर लगाती हैं. उन्हें ब्लैकबोर्ड पर लिखे नंबर बहुत लुभाते हैं.

डेसमंड खार्माफलांग कहते हैं कि सट्टेबाज़ी की वजह से मेघालय की संस्कृति की अहम पहचान ये तीरंदाज़ी आज भी सुरक्षित है.

अब तो राज्य की सरकार भी इसे बढ़ावा देने के लिए तमाम क़दम उठा रही है. लोगों को सिखाने के लिए आर्चरी क्लब खोले गए हैं.

अब तो खासी जनजाति के लोगों के अलावा दूसरे समुदायों के लोग भी तीरंदाज़ी सीख रहे हैं.

वीडियो कैप्शन, एक बीफ़ बॉय की कहानी

(बीबीसी ट्रेवल की ये कहानी अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें.)

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