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मज़ाक बन गई है ओलंपिक की तैयारी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
चीन की राजधानी बीजिंग में ओलंपिक खेल इसी साल 8 अगस्त से शुरू होंगे. दुनिया भर की तरह भारत के भी जाने-माने खिलाड़ी इन खेलों में क़ामयाबी और शोहरत के सपने लिए तैयारी में जुटे हुए हैं. लेकिन यह तैयारी किन परिस्थितियों में हो रही है यह जानकर बीजिंग में पदक जीतने की उम्मीद भी रखना शायद ज़्यादती ही लगे. ओलंपिक खेल चार साल में एक बार ही होते हैं और हर खेल के बाद भारत में सड़क से लेकर संसद तक हर जगह पदक न जीत पाने का शोक मनाया जाता है. पर तुरंत सब कुछ भूल कर लोग अपने-अपने काम में जुट जाते हैं और अगले ओलंपिक खेलों तक के लिए मामला रफ़ा-दफ़ा हो जाता है. पिछले तीन ओलंपिक खेलों से भारत महज़ एक पदक जीत कर ही लौटा है. वर्ष 1996 के ओलंपिक में टेनिस के लिए लिएंडर पेस ने, वर्ष 2000 में भारोत्तोलन के लिए कर्णम मल्लेश्वरी ने और वर्ष 2004 में निशानेबाज़ी के लिए राज्यवर्द्धन सिंह राठौर ने पदक जीते. इससे पहले के तीन ओलंपिक खेलों से भारतीय खिलाड़ी खाली हाथ ही लौट रहे थे. ओलंपिक खेलों का आयोजन वर्ष 1984 में लॉस एंजिल्स, 1988 में सोल और 1992 में बार्सिलोना में किया गया था. क्षमता तो है लेकिन...
बीजिंग में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए मुक्केबाज़ी, तैराकी और निशानेबाज़ी में खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में ओलंपिक खेलों के लिए क्वालीफ़ाई करके पदक जीतने की उम्मीद ज़रूर जगा दी है. इसके अलावा भारत के खिलाड़ी एथलेटिक्स और टेनिस में भी पदक जीतने की क्षमता रखते हैं. लेकिन क्वालीफ़ाई करना एक बात है और पदक जीतना बिल्कुल अलग. ओलंपिक खेलों की तैयारी में जुटे खिलाड़ियों को ही नहीं बल्कि सभी खेल फ़ेडरेशन को भी हाल के दिनों में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम का 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के लिए पुनर्निर्माण किया जा रहा है. इस वजह से सभी खेल फ़ेडरेशनों को स्टेडियम में बने अपने-अपने दफ़्तर ख़ाली करने पड़े हैं. अब आलम ये है कि ओलंपिक खेलों से ठीक पहले फ़ेडरेशन अपने खिलाड़ियों के बीजिंग जाने की तैयारियाँ क्या करेंगे, उनके पास तो खेल मंत्रालय की चिट्ठियों का जवाब देने का भी कोई रास्ता नहीं है. ठौर-ठिकाना तक नहीं... मुक्केबाज़ी फ़ेडरेशन के सचिव कर्नल पीके मुरलीधरन राजा कहते हैं, "खेल मंत्रालय हमें फ़ोन करके पूछता है कि आपकी चिट्ठी किस पते पर भेज दें और हमारा जवाब होता है कि आप अपने पास ही रखें, हमारा कोई आदमी शास्त्री भवन से चिट्ठी ले लेगा."
वे कहते हैं, "लेकिन जब बात अंतरराष्ट्रीय फ़ेडरेशन या फिर बीजिंग खेलों की आयोजन समिति की हो तो फिर हम क्या करें. मैं अभी सेना में हूँ तो मैं अपने दफ़्तर में चिट्ठी मँगवा लेता हूँ." मुरलीधरन बताते हैं, "लेकिन जब खेल मंत्रालय हमसे कोई कागज़ माँगता है तो हमें कहना पड़ता है कि सारी फ़ाइलें डब्बे में बंद है. कागज़ात नहीं मिलने के कारण हमें मंत्रालय ओलंपिक खेलों की तैयारी के लिए पैसे नहीं दे रहा है." भारत के पाँच मुक्केबाज़ बीजिंग के लिए क्वालीफ़ाई कर चुके हैं और फ़ेडरेशन को तमाम दिक्कतों के बावजूद रिंग से एक पदक लेकर लौटने का भरोसा है. भारत में सभी खेल फ़ेडरेशन सरकारी कामकाज से निबटने के लिए अपना एक दफ़्तर नेहरू स्टेडियम में बनाए हुए थे. लेकिन अब जबकि स्टेडियमों की मरम्मत की जा रही है तो भारतीय खेल प्राधिकरण (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया) ने नेहरू स्टेडियम ही नहीं बल्कि मेजर ध्यानचंद राष्ट्रीय स्टेडियम, इंदिरा गाँधी इंडोर स्टेडियम और तालकटोरा तैराकी कॉम्प्लेक्स के सभी कमरे खाली करवा लिए हैं. खेल प्राधिकरण के नए महानिदेशक सायन चटर्जी का जवाब है, "हमारे पास इसके अलावा और कोई चारा भी तो नहीं है. हम जानते हैं कि ओलंपिक खेलों से ठीक पहले फ़ेडरेशन को काफ़ी मुश्किल होगी लेकिन हमें भी तो 2010 की तैयारी करनी है." चटर्जी कहते हैं, "फ़ेडरेशन को चाहिए कि वो खेल मंत्रालय से बात करके इसका हल ढूँढ़ने की कोशिश करें." अभ्यास भी मुश्किल
फ़ेडरेशन की किसी भी तरह मदद करने में चटर्जी अपने को असहाय महसूस करते हैं क्योंकि अभी उन्हें अपना पद सँभाले एक महीना भी तो नहीं हुआ है. चटर्जी को आठ मई को रतन वत्तल की जगह पर प्राधिकरण का महानिदेशक नियुक्त किया गया था. तैराकी संघ के महासचिव वीरेंद्र नानावती को चिंता है, "जब हमारे तैराक बीजिंग जाने से पहले दिल्ली में कागज़ी कार्रवाई पूरी करने आएँगे तो हमारे पास उनके रहने के लिए भी कोई जगह नहीं है." नानावती कहते हैं, "होटल के कमरे बहुत महँगे हैं और सरकारी हमें कोई जगह देने को तैयार नहीं है. अभी तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से मिलने वाले 40 लाख रुपए भी तुरंत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि हमारा दिल्ली का दफ़्तर काम नहीं कर रहा है." भारतीय राष्ट्रीय राइफ़ल एसोसिएशन के सचिव बलजीत सिंह सेठी को निशानेबाज़ों के लिए कारतूस मँगाने में ख़ासी मुश्किलें पेश आ रही हैं. सेठी अपनी मज़बूरी ज़ाहिर करते हैं, "हमारे लोग तो ई-मेल भी चेक करने के लिए साइबर कैफ़े जाते हैं. अब अगर कोई कागज़ गुम हो जाए तो फिर सीमा शुल्क विभाग के दफ़्तर के चक्कर लगाते-लगाते कई ओलंपिक बीत जाएँगे लेकिन कारतूस नहीं मिलेंगे." वे कहते हैं, "लेकिन खेलमंत्री को ये चिंता क्यों होने लगे. आख़िर 2010 की तैयारी ज़्यादा ज़रूरी है." करिश्मा ही दिला सकेगा पदक
भारतीय एथलेटिक्स फ़ेडरेशन और अखिल भारतीय टेनिस एसोसिएशन को दिल्ली में ही दफ़्तर के लिए दूसरी जगह तो मिल गई है लेकिन उन्हें भी खिलाड़ियों को दिल्ली में ठहराने की बड़ी चिंता है. एथलेटिक्स फ़ेडरेशन के कर्ता-धर्ता ललित भानोट ने कहा, "हमारा दफ़्तर तो कलमाडी साहब के घर से चल रहा है लेकिन एथलीट्स को तो वहाँ नहीं ठहरा सकते. सिर्फ़ एथलीट ही क्यों, कोच और दूसरे अधिकारियों का भी तो बीजिंग जाने से पहले दिल्ली आना ज़रूरी है." ललित का कहना है, "इन बातों से खेल मंत्रालय को कोई मतलब नहीं है. उन्हें तो पूरे कागज़ चाहिए तभी पैसे मिलेंगे. नहीं तो ये ओलंपिक खेल क्या अगले दो-तीन खेल और निकल जाएँगे, फिर भी पैसा हाथ नहीं आएगा." अब अगर भारतीय खिलाड़ी बीजिंग से ख़ाली हाथ लौटते हैं तो ठीकरा किनके सिर फूटेगा. ज़ाहिर है फ़ेडरेशन और खिलाड़ियों के सर. लेकिन जब फ़ेडरेशन के पास न पैसा है और ना ही अपना काम करने के लिए कोई निर्धारित जगह तो फिर प्रशिक्षण शिविर चला पाना भी मुश्किल काम बन जाता है. इन हालात में भारत अगर बीजिंग में कोई पदक जीत जाता है तो ये किसी करिश्मे से कम नहीं होगा. |
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