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भुला दिए गए हैं पहले पदक विजेता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
स्वतंत्र भारत में व्यक्तिगत तौर पर ओलंपिक में पदक जीतने वाले पहले खिलाड़ी थे केडी जाधव. 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में जाधव ने फ़्री स्टाइल कुश्ती में काँस्य पदक हासिल किया था. उस साल भारत को दो पदक मिले थे. पहला हॉकी में स्वर्ण और दूसरा कुश्ती में काँस्य. आज़ादी के बाद 57 सालों में भारत ने ओलंपिक में व्यक्तिगत तौर पर केवल तीन ही पदक जीते हैं. लेकिन फिर भी उसने अपने हीरो को आसानी से भुला दिया. महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव गोलेश्वर में रहते थे केडी जाधव. वे बचपन से ही खेलों में काफ़ी रुचि रखते थे. कुश्ती बाप-दादा से विरासत में मिली थी और वे बचपन से ही अखाड़े में जाकर अपने पिताजी से कुश्ती सीखने लगे. जोश उनके बचपन के दोस्त दिवोलेकर कहते हैं कि केडी जाधव में शुरू से ही बड़ा जोश था. वे कुछ कर दिखाने की ठान लेते थे तो करके ही दिखाते थे. केडी जाधव की यही लगन और आत्मविश्वास उन्हें विश्व के सबसे बड़े खेल मेले ओलंपिक तक ले गई. भारत को आज़ादी मिलने के बाद पहला ओलंपिक लंदन में 1948 में हुआ था. जिसमें जाधव को निराशा ही हाथ लगी. लेकिन 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में उन्होंने फ़्री स्टाइल कुश्ती में तीसरा स्थान हासिल किया. उनके बेटे रंजीत बताते हैं कि अगर दोस्तों और शुभचिंतकों ने मदद न की होती तो पैसों की कमी की वजह से जाधव ओलंपिक तक नहीं पहुँच पाते. भुला दिए गए जाधव जाधव भारत के लिए काँस्य पदक जीतकर लौटे लेकिन उन्हें क्या ख़बर थी कि जिस देश के लिए वे इतना बड़ा गौरव हासिल करे लौटे वो देश उन्हें इतनी आसानी से भुला देगा. जीते जी जाधव के दिन ग़रीबी में कटे और उन्हें सरकार से ना तो कोई आर्थिक मदद मिली और ना ही अपनी जीत के लिए कोई मान्यता.
विश्व के सर्वश्रेष्ठ कुश्ती खिलाड़ियों में गिने जाने वाले जाधव ने अपने 22 साल महाराष्ट्र पुलिस में एक सब इंस्पेक्टर की हैसियत से गुजारी. तरक्की मिली भी तो आख़िर के दिनों में. 18 अगस्त 1984 को एक सड़क दुर्घटना में उनकी मौत हो गई. उनके बेटे रंजीत 12 साल के थे जब उनके पिता की मृत्यु हुई थी. रंजीत बताते हैं कि उन्हें जीते जी पेंशन तक नहीं मिली. केडी जाधव की मौत के बाद उनके परिवारवालों की लगातार कोशिशों से उन्हें अर्जुन पुरस्कार और महाराष्ट्र सरकार द्वारा छत्रपति शिवाजी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. परिवार को थोड़ी आर्थिक मदद भी मिली. लेकिन इससे बहुत कुछ नहीं बदला है. जाधव के साथी दिवोलकर कहते हैं कि गोलेश्वर गाँव में कोई कुश्ती तक नहीं खेलता. अगले महीने ओलंपिक में भारत को पदक जीतने की उम्मीद तो है लेकिन खेल संगठनों की कार्यशैली पर फिर सवाल उठे हैं. हाल ही में भारत में लाई गई ओलंपिक मशाल विवाद में घिर गई क्योंकि मशाल के साथ खिलाड़ी कम और फ़िल्म स्टार ज़्यादा देखे गए. खेल विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत में खेल का स्तर ऊपर उठाना है तो ज़रूरी है व्यवस्था बदलने की. खेल को राजनीति से अलग कर असली प्रतिभा को सही प्रशिक्षण और प्रोत्साहन देने की. ताकि जाधव जैसे खिलाड़ी नयी पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन सकें. |
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