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कहाँ चूक जाते हैं भारतीय खिलाड़ी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक सौ आठ वर्षों का ओलंपिक खेलों का इतिहास, जिसके पन्नों में दर्ज हैं, एक अरब से अधिक आबादी वाले इस विशाल देश भारत की उपलब्धियाँ भी! 108 वर्षों में केवल चौदह पदक- जिनमें से आठ स्वर्ण, एक रजत और दो कांस्य केवल हॉकी के नाम हैं. बाक़ी तीन कांस्य पदकों में से एक टेनिस, एक कुश्ती और एक महिला भारोत्तोलन में भारत की झोली में आए. भारत की मिट्टी में ओलंपिक पदक विजेताओं की यह कमी क्यों? कहाँ चूक जाते हैं भारतीय खिलाड़ी? क्या सचमुच प्रतिभाओं की कमी है या फिर ओलंपिक में शामिल खेलों के प्रति सरकार और नागरिकों की उदासीनता की गाथा संजोए हुए दबा पड़ा है ओलंपिक इतिहास में भारत का पन्ना? कमी नहीं एमेच्योर एथलेटिक फेडरेशन ऑफ़ इंडिया के सचिव ललित भनोट का मानना है कि प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है. वे कहते हैं, ''हमारे पास इतने प्रतिभावान खिलाड़ी हैं जो दुनिया में कहीं नहीं है. सबसे पहले तो हमारे पास खेलों के संबंध में आधुनिक तकनीकी जानकारी की कमी है. अच्छे कोच का अभाव है." उनका कहना है कि पदक जीतने के लिए केवल अच्छा खिलाड़ी होना या अच्छे कोच का होना ही काफ़ी नहीं है. इसके लिए वर्षों पहले से योजना बनानी पड़ती है.खिलाड़ियों के खाने-पीने, प्रशिक्षण और उसकी देखभाल की व्यवस्था करनी होती है. लेकिन भारतीय ओलंपिक संघ के महासचिव रणधीर सिंह कहते हैं कि अभी जितनी सुविधाएं उपलब्ध हैं, उतनी पहले कभी नहीं थीं. रणधीर सिंह कहते हैं ''मैं खुद खिलाड़ी रहा हूँ. हमारे समय और आज की स्थिति में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है. सबसे ज्यादा ख़र्च आज निशानेबाज़ी पर हो रहा है.'' निशानेबाज़ी में रणधीर सिंह का तर्क भले ही सही हों, जहाँ तक खिलाड़ियों को दी जाने वाली सुविधाओं का प्रश्न है, तो भारत के खेल मंत्री सुनील दत्त भी इन्हें उपयुक्त नहीं मानते. उनका कहना है, ''ओलंपिक में भाग लेने हमारे जो युवा खिलाड़ी जाते हैं, वो हमारे बेहतरीन खिलाड़ी होते हैं. मेरा मानना है कि उन्हें वैसी ही सुविधाएं मिलनी चाहिए जो किसी दूसरे देश के ओलंपियन को उसके अपने देश में मिलती हैं. उन सुविधाओं की हमारे यहाँ कमी है. इन्हें दूर करने के लिए हमें काफ़ी काम करना होगा.'' वित्तीय सहायता सुविधाएँ जुटाने के लिए धन की ज़रूरत पड़ती है और आज भारत में खेल के लिए दिया जाने वाला पैसा सबसे ज़्यादा क्रिकेट में जा रहा है.
शायद इसीलिए क्रिकेट और क्रिकेट खिलाड़ियों की लोकप्रियता भी ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ गई है. ललित भनोट कहते हैं ''जो मान सम्मान एक क्रिकेट के खिलाड़ी को मिलता है, वो हमारे किसी भी एथलीट या दूसरे खिलाड़ियों को नहीं मिलता. इसका गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव हमारे खिलाड़ियों पर पड़ता है और उनमें हीन भावना पैदा होती है.'' 1972 ओलंपिक में कुश्ती में काँस्य पदक जीतते-जीतते रह गए पहलवान प्रेमनाथ की राय अलग है. उनका कहना है कि पैसे की कमी से ज़्यादा बड़ी समस्या है खेल संघों और महासंघों पर राजनेताओं और नौकरशाहों का क़ब्ज़ा. प्रेमनाथ कहते हैं ''जब तक महासंघों के अधिकारी पुराने और जाने-माने खिलाड़ी नहीं होंगे, तब तक ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीत पाना संभव नहीं होगा. हमारे अखाड़े के एक पहलवान मुकेश खत्री ने ओलंपिक के लिए क्वालीफ़ाई किया है. फ़ेडरेशन के सारे अधिकारी उसके पीछे हाथ धोकर पड़े हैं. वे अपने साथ अपने निजी कोच को ले जाना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि अगर मुकेश अपने कोच के साथ गए तो पदक जीत कर लौटेंगे. लेकिन फ़ेडरेशन का रवैया इतना ख़राब है कि पदक मिले या नहीं मिले इसकी परवाह किए बिना खिलाड़ी को सताया जा रहा है. राजनीतिकरण खेल महासंघों के राजनीतीकरण पर हॉकी खिलाड़ी और पूर्व भारतीय कप्तान मोहम्मद शाहिद भी अपनी कटु प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए कहते हैं '' फ़ेडरेशन में कुछ ऐसे लोग हैं जो खेल के बारे में कुछ नहीं जानते. इसमें कोई शक नहीं कि केपीएस गिल एक जाने-माने पुलिस अधिकारी हैं लेकिन हॉकी महासंघ के अध्यक्ष के नाते उन्हें दिल्ली में ही रहने वाले ज़फर इक़बाल और अशोक कुमार जैसे पुराने खिलाड़ियों से सलाह लेनी चाहिए. जबकि मैंने देखा है कि वे ऐसे लोगों से घिरे रहते हैं, जिन्हें हॉकी की ए बी सी डी का अंदाज़ा नहीं है.'' लेकिन रणधीर सिंह मानते हैं कि लोकतंत्र में संघों और महासंघों में किसी भी व्यक्ति के आने पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता और अपवाद तो किसी भी तबके के लोग हो सकते हैं. ओलंपिक खेलों में भारत का अतीत बहुत सुनहरा नहीं रहा है. लेकिन भारतीय ओलंपिक संघ के अधिकारियों का मानना है कि इस अतीत को भूलकर अगर हम भविष्य की ओर देखें तो स्थिति बहुत बदली हुई नज़र आती है. इस बार ओलंपिक में जा रहे भारतीय दल से जितने पदकों की उम्मीद है, उतनी पहले कभी नहीं थी और इसी बेहतर भविष्य की आशाओं का टिमटिमाता दीपक एथेंस ओलंपिक तक कितना प्रकाश फैला पाएगा यह तो वक़्त ही बताएगा. |
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