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ओलंपिक खेलों में भारत का सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ओलंपिक आंदोलन से भारत का रिश्ता 1920 के एंटवर्प ओलंपिक से जुड़ा जहां पहली बार चार भारतीय खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया. 1900 के पेरिस ओलंपिक में एक एंग्लो-इंडियन नॉर्मन प्रिचार्ड ने एथलेटिक्स में दो रजत पदक हासिल किये थे और कई वर्षों तक तालिका में ये पदक भारत के नाम दर्ज रहे. ये तो निश्चित है कि प्रिचार्ड कोलकाता में जन्मे थे लेकिन उनके जीते गये पदक भारतीय पदकों में गिने जायें या नहीं ये काफी विवाद का विषय रहा है. लेकिन ओलंपिक में असली पहचान भारत को मिली हॉकी से. हॉकी का वर्चस्व सन् 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक से शुरू हुआ भारतीय हॉकी का सुनहरा सफर 1956 के मेलबोर्न ओलंपिक तक बेरोकटोक चला. हॉकी के जादूगरों एक लंबी फेहरिस्त थी भारतीय टीम में जिसके बेताज बादशाह थे ध्यानचंद.
खेल के मैदान से बाहर उनके साथी रहे माधोकृष्ण जी के पास यादों का नायाब ख़ज़ाना है, “एक बार ध्यान चंद भाईसाहब जब ग्वालियर आये तो ग्राउंड में ग्यारह लोगों को एक तरफ खड़ा किया और दूसरी तरफ ध्यानचंद जी थे." ये तब की बात है जब उनका फॉर्म उतर चुका था. लेकिन उसके बावजूद उन्होंने एक के बाद एक ग्यारह लोगों को छकाया. गेंद तो जैसे उनकी स्टिक से चिपकी रहती थी इसीलिये उन्हें हॉकी का जादूगर कहा जाता है. 1960 में रोम में पहली बार भारतीय हॉकी के विजय रथ को रोका पाकिस्तान ने. करोड़ों भारतीय हॉकी प्रेमियों के लिये वो एक बेहद उदास लम्हा था. पिछड़ गए मिल्खा सिंह अनुभवी खेल पत्रकार कमलेश थपलियाल रोम ओलंपिक में मौजूद थे जहाँ उड़न सिख मिल्खा सिंह से कांस्य पदक बड़े मामूली अंतर से छिटक गया था. उन्होंने बताया “1960 में हम सब उम्मीद कर रहे थे कि भारत एक मर्तबा फिर हॉकी का स्वर्ण जीतेगा लेकिन जब पाकिस्तानी टीम ने गोल करके बढ़त ली और आख़िरकार भारत पराजित हुआ तो हम सब बहुत उदास हो गये थे.” 1964 में टोक्यो में हॉकी का स्वर्ण फिर भारत ने हासिल किया और यहीं गुरबचन सिंह रंधावा 110 मीटर बाधा दौड़ में पांचवें नंबर पर रहे. दरअसल भारत को पहला व्यक्तिगत पदक दिलवाने का श्रेय हासिल किया पहलवान केडी जाधव ने. जाधव ने 1952 में हेलसिंकी में कुश्ती में कांस्य पदक जीतकर मल्लयुद्ध की प्राचीन भारतीय परंपरा की याद दिलाई. चूक उसके बीस साल बाद सुदेश कुमार और प्रेमनाथ म्यूनिख में मामूली अंतर से पदक जीतने से चूक गये और चौथे स्थान पर रहे.
सुदेश कुमार को अभी तक इस बात का अफ़सोस है,“ओलंपिक खेलों में पदक हासिल करना क़िस्मत की बात होती है, 1972 में हमारे साथ भी यही हुआ. हम दो पहलवानों की कुश्ती साथ पड़ गई और दूसरे देश का पहलवान जीत गया.” ज़्यादातर लोग आज की तारीख़ में भारत को फुटबॉल से जोड़कर नहीं देखते लेकिन ये भी एक दिलचस्प बात है कि 1956 के मेलबोर्न ओलंपिक में भारत को फुटबॉल में चौथा स्थान हासिल हुआ था. 1968, 1972 और 1976 के तीन ओलंपिक साल भारतीय खेल प्रेमियों के लिये ख़राब साबित हुए हालांकि 1976 में श्रीराम सिंह का 800 मीटर फाइनल में पहुंचना एक उपलब्धि कही जा सकती है. 1980 में मॉस्को में पश्चिमी देशों के बहिष्कार के बीच भारतीय हॉकी टीम ने अब तक का आठवां और अंतिम स्वर्ण पदक जीता है. वैसे 1980 के हॉकी स्वर्ण को वो अहमियत तो नहीं मिली जो पिछले सात सोने के तमग़ों को मिली थी. लेकिन पूर्व ओलंपियन कमांडर नंदी सिंह ने 1928 से 1956 के सुनहरे सफ़र की एक और हक़ीक़त बयान की,“1928 से 1936 तक मैं ये कहना चाहूंगा कि हमारी हॉकी टीम बहुत ही अच्छी थी और दूसरी टीमें कमज़ोर थीं. सच तो ये है कि उन दिनों अगर हमारी कॉलेज की टीम भी वहां जाती तो वो विश्व कप आसानी से जीत सकती थी.” पीटी ऊषा का दौर 1984 में लॉस एंजेल्स में “पायोली एक्सप्रेस” पीटी ऊषा के साथ भी वही “कितने पास कितने दूर” वाला क़िस्सा दोहराया गया जो सेकेंड के सौवें हिस्से से कांस्य पदक से चूक गईं.
1988 में सियोल और 1992 में बार्सेलोना से भारतीय खिलाड़ी ख़ाली हाथ लौटे लेकिन 1996 में अटलांटा में लियेंडर पेज़ ने टैनिस में और चार साल पहले सिडनी में कर्णम मल्लेश्वरी ने कांस्य जीता और पदक तालिका में भारत को जगह दिलाई. एक खेल प्रेमी के लिए आंकड़े याद रखना मुश्किल नहीं है लेकिन दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को बहुत कुछ याद है,“ऐसा नहीं है कि हमारा प्रदर्शन बहुत ख़राब रहा लेकिन हमारे देश की जनसंख्या के हिसाब से उपलब्धियां बहुत कम हैं और इस दिशा में गंभीरता से प्रयास किये जाने की ज़रूरत है." वैसे 84 साल की ओलंपिक भागीदारी में 8 स्वर्ण, एक रजत और पाँच कांस्य पदकों के अलावा भारतीय खेल प्रेमियों के लिये ज़्यादा कुछ है भी नहीं. लेकिन उम्मीद पर दुनिया क़ायम है और ज़ाहिर सी बात है कि ओलंपिक पदक के लिये हौसले और जज़्बे के साथ ईमानदार कोशिश गंभीरता से किये जाने की ज़रूरत है. |
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