खुद ही बुने स्पिन के जाल में फँसी टीम इंडिया

वानखेड़े में मेजबान भारत और इंग्लैंड के विरुद्ध हुए टेस्ट श्रृंखला के दूसरे टेस्ट मैच से पहले भारत के पास 1-0 की बढ़त थी जो अब नहीं है.
मोटेरा में भारतीय टीम ने बेहतरीन प्रदर्शन किया था जबकि इंग्लैंड की टीम में खामियां दिखीं थी.
लेकिन मुंबई में जिस तरह से इंग्लैंड के स्पिनर मोंटी पनेसर और ग्रैम स्वान ने भारतीय बल्लेबाजों को किनारे लगाया, उसने न केवल कुछ दिग्गज बल्लेबाजों के हौसले पस्त किए, साथ ही गेंदबाजों पर दबाव भी बढ़ा दिया है.
स्पिन का लाभ
खुद भारतीय कप्तान धोनी एक लंबे समय से स्पिन को मदद देने वाली घरेलू पिचों की हिमायत करते रहे हैं. ऐसा ही कुछ उन्होंने मुंबई टेस्ट के पहले भी कहा था.
हुआ इससे बिलकुल विपरीत और टीम इंडिया के स्पिनरों की बिल्कुल नहीं चल सकी. जबकि इंग्लैंड के मोंटी पनेसर और सावन ने पिच का भरपूर फायदा उठाते हुए भारतीय बल्लेबाज़ों की नाक में दम कर दिया.
पूर्व भारतीय खिलाड़ी और अहमदाबाद पिच के क्यूरेटर धीरज पारसना को लगता है कि स्पिनरों की निराशा ज्यादा अहम है.
प्रसन्ना ने बीबीसी को बताया, "अश्विन, ओझा और हरभजन सभी ने एक तरफ से निराश किया है. भारतीय स्पिनरों को गेंद में जो फ्लाइट देनी चाहिए, वो दी नहीं जा रही है. उधर बल्लेबजों का खराब फ़ॉर्म भी गेंदबाजों पर दबाव बढ़ा ही देता है. जबकि पूरा श्रेय दिया जाना चाहिए पनेसर को जिन्होंने भारत में आकर भारत की ही नाक में दम कर रखा है."
पार्ट-टाइम गेंदबाज़ कहाँ?
स्पिन गेंदबाज़ी की बात हो तो जानकारों का मत है कि प्रज्ञान ओझा को छोड़कर लगभग सभी ने निराश किया है.
पूर्व भारतीय कप्तान अजित वाडेकर उस भारतीय टीम के कोच थे जिसने लगभग एक दशक पहले इंग्लैंड को घरेलू श्रृंखला में ज़बर्दस्त मात दी थी. वाडेकर की कप्तानी में भारत के कुछ महान स्पिनरों ने दुनिया में अपनी फिरकी का जादू भी बिखेरा.
लेकिन मुंबई में बिखर गई टीम इंडिया पर बात करते वक़्त वाडेकर को लगा कि कप्तान धोनी अपने गेंदबाजों का सही इस्तेमाल नहीं कर सके.

वाडेकर ने कहा, "अगर भज्जी, अश्विन और ओझा नहीं चल रहे थे तो फिर युवराज, सहवाग और विराट जैसे पार्ट-टाइम गेंदबाजों को ज़्यादा मौके क्यों नहीं दिए गए. अपनी पिचों पर आपकी गेंद स्पिन न हो तो फिर तो ये गंभीर चिंता का विषय है."
आगे क्या?
सवाल बहुत से हैं लेकिन जवाबों की लगता है कमी सी हो चुकी है. बल्लेबाजों ने टीम इंडिया को निराश किया ये तो जग ज़ाहिर है. ऐसा पहले भी हुआ है, हालांकि घरेलू मैदानों में कम और विदेशी पिचों पर ज्यादा.
पर भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है अपनी घरेलू पिचों पर खुद के स्पिनरों का फ्लॉप-शो. वैसे भी भारतीय गेंदबाज़ी बरसों से अपनी स्पिन की कला की बदौलत ज़्यादा शोहरत में रही है.
जब पिछले वर्ष टीम इंग्लैंड में बुरी तरह पिटी थी तब खेल समीक्षकों ने कहा था कि घरेलू मैदान पर भारतीय स्पिन के आगे इंग्लैंड की बल्लेबाजी ढेर हो जाएगी और उस हार का बदला पूरा हो सकेगा.
मुंबई टेस्ट के बाद से तो लगता है बयार उलटी चलनी शुरू हो चुकी है. बाकी दो टेस्ट मैचों में अगर मोंटी और स्वान ऐसे ही कहर बरपाते रहे तो शायद कप्तान धोनी को स्पिन के बजाय तेज़ पिचों की हिमायत करनी पड़ेगी.












