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मनरेगा मज़दूर रह चुके रामबाबू से मिलिए, इन्होंने तोड़ा है राष्ट्रीय रिकॉर्ड
- Author, अनंत झणाणे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र ज़िले के एक दूर दराज़ गाँव में रहने वाले 23 साल के रामबाबू ने एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा है. रामबाबू मनरेगा मज़दूर रह चुके हैं.
राष्ट्रीय खेलों में 35 किलोमीटर की पुरुष 'रेस वॉक' में उन्होंने यह कमाल किया है. उन्होंने दो घंटे 36 मिनट और 34 सेकेंड में वॉक पूरी की और गोल्ड मेडल जीता.
उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को तीन मिनट से बेहतर किया. यानी नया रिकॉर्ड कायम किया.
रामबाबू की इस जीत के साथ उनके मनरेगा मज़दूरी करने का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है.
उनके पिता 55 साल के छोटेलाल एक भूमिहीन मज़दूर हैं जो मज़दूरी करके अपने परिवार का पेट पालते हैं.
2020 के कोविड लॉकडाउन का यह छोटा सा वायरल वीडियो रामबाबू ने सेल्फ़ी मोड में फ़िल्माया है.
उन्हें लॉकडाउन की कठिन परिस्थितियों में डेढ़ महीना गैंति फावड़ा उठा कर मज़दूरी करनी पड़ी. तब उन्होंने तालाब खोदने का काम किया था.
नेशनल गेम्स में रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन के बाद रामबाबू आगे के प्रशिक्षण के लिए पुणे चले गए हैं.
वो पिछले एक साल से अपने घर नहीं गए हैं.
रामबाबू: लॉकडाउन में ज़िंदा रहने के लिए करनी पड़ी मज़दूरी
35 किलोमीटर 'मेंस वॉक' में रिकॉर्ड तोड़ जीत से पहले रामबाबू पिछले चार महीने से बेंगलुरु में ट्रेनिंग ले रहे थे.
वैसे तो इसके लिए वे सितंबर 2018 से ट्रेनिंग ले रहे थे लेकिन 2020 में कोविड ने उन्हें गांव लौटने पर मजबूर कर दिया था.
उस कठिन दौर को याद करते हुए वे कहते हैं, "घर पर गए थे. वहां परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं है. लॉकडाउन में मनरेगा स्टार्ट हुआ. कोई काम था नहीं तो ज़िंदा रहने के लिए हमने अपने पापा के साथ डेढ़ महीने तक काम किया. फिर जब लॉकडाउन खुला तो मैं प्रैक्टिस करने के लिए भोपाल आ गया."
मनरेगा में मज़दूरी के अनुभव के बारे में रामबाबू कहते हैं, "जब लॉकडाउन में काम कर रहे थे तब भी पूरी उम्मीद थी कि देश के लिए खेल पाएंगे. उस टाइम हमारे हालात ही ऐसे थे कि ख़ुद को ही मोटिवेट करना पड़ा."
रामबाबू कहते हैं कि उनके पिता मज़दूरी करके बहन की पढ़ाई और उनकी ट्रेनिंग का ख़र्च उठाते हैं.
वे कहते हैं कि जब तक कैंप लगा रहता है, उनका काम कैंप से चल जाता है लेकिन कैंप ख़त्म होने के बाद उनको ख़र्च के लिए पिता से पैसे लेने पड़ते हैं.
रामबाबू के कोच बसंत कुमार ने बीबीसी को बताया कि वो पिछले दो साल से लगातार ट्रेनिंग कर रहे थे और नवंबर 2021 में नेशनल कैंप में गए थे. वहां से रामबाबू ने दो इंटरनेशनल गेम्स में हिस्सा लिया.
कोच बसंत कुमार ने बताया, "भारत के ज़्यादातर एथलीट ग़रीब परिवार से आते हैं. 70 से 80 प्रतिशत तक छात्र ग़रीब परिवारों से ही होते हैं. शुरू में तो उनको अपनी ट्रेनिंग से लेकर डाइट तक पूरी करने के लिए बहुत सारी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है. लेकिन जैसे-जैसे एथलीट डिस्ट्रिक्ट लेवल, स्टेट लेवल, और नेशनल लेवल तक परफ़ॉर्म करने लगते हैं उनके रहने खाने और ट्रेनिंग की दिक़्क़तें कम होती जाती हैं."
गुज़ारे के लिए रेस्टोरेंट में वेटर बने, कूरियर कंपनी में बोरे सिले
ऐसा भी वक़्त आया जब रामबाबू को भी अपना पेट पालने के लिए कई छोटे मोटे काम करने पड़े.
वे बताते हैं कि 2016-17 में 17 साल की उम्र में रनिंग की ट्रेनिंग के लिए वो बनारस आ गए.
तब घर से पैसे नहीं मिल पाते थे तो गुज़ारे के लिए उन्होंने एक रेस्त्रां में वेटर के तौर पर पार्ट टाइम काम किया.
वे कहते हैं, "वहां पर इतना ज़्यादा काम था कि खेलने के बाद रिकवरी नहीं हो पा रही थी. तो मैंने एक महीने काम करके छोड़ दिया."
बाद में उन्होंने बनारस की ही एक कुरियर पैकेजिंग कंपनी में तीन से चार महीने कुरियर में इस्तेमाल होने वाले बोरे को सिलने का काम किया और वहां काम करते हुए उनके घुटने में इंजरी हो गई थी.
चोट लगने के बाद उन्होंने कुरियर कंपनी में काम छोड़ दिया और चंदौली में नार्दन कोलफील्ड लिमिटेड के कैंप में रनिंग प्रैक्टिस करना शुरू किया लेकिन चोट की वजह से उन्हें रनिंग छोड़नी पड़ी और तब उन्होंने 'वॉक रेस' की प्रैक्टिस शुरू की.
भोपाल में की ट्रेनिंग
रामबाबू बताते हैं कि यूपी में उन्होंने बनारस के सिगरा स्टेडियम में प्रैक्टिस की और उसके बाद सैफ़ई इटावा स्पोर्ट्स कॉलेज में एक साल ट्रेनिंग की.
लॉकडाउन के वक़्त ट्रेनिंग के लिए रामबाबू भोपाल पहुंचे लेकिन वहां भी मुश्किलें कम नहीं थीं.
वे बताते हैं, "सरकार की कम एंड प्ले स्कीम के तहत अगर खिलाड़ी स्पोर्ट्स अथॉरिटी की तरफ़ से नहीं है और हॉस्टल में नहीं रहता है, तब भी वो अंदर जाकर प्रैक्टिस कर सकता हैं."
भोपाल में वे इसी के तहत प्रैक्टिस करते थे. लेकिन कोविड लॉकडाउन में बाहर वालों के लिए यह सुविधा बंद कर दी गई तो वो भोपाल में स्पोर्ट्स कॉलेज के पास एक सड़क पर प्रैक्टिस करते थे.
इस रिकॉर्ड तोड़ जीत के बाद क्या उत्तर प्रदेश से कोई मदद की पेशकश हुई?
इस पर रामबाबू कहते हैं, "यूपी सरकार से संपर्क तो हुआ लेकिन कोई मदद की जाएगी ऐसा कोई आश्वासन नहीं मिला है."
क्या हैं सरकार से उम्मीदें?
रामबाबू कहते हैं कि वो उत्तर प्रदेश खेल विभाग से उम्मीद रखते हैं कि वो उन्हें एक अच्छी नौकरी दे या फिर हमारे मेडल का कोई इनाम दे.
वे बताते हैं कि अभी तक वो राष्ट्रीय स्तर के चार मेडल जीत चुके हैं लेकिन अभी उन्हें किसी भी तरह का कोई इनाम नहीं मिला है.
नेशनल रिकॉर्ड तोड़ने के बाद रामबाबू आगे के मुक़ाबलों की तैयारी कर रहे हैं. 30 जनवरी 2023 से ओलंपिक के क्वालिफ़िकेशन स्टार्ट हो रहे हैं.
23 अक्टूबर 2023 से एशियन गेम्स हैं तो उनका अगला लक्ष्य ओलंपिक क्वालीफ़ाई करना और एशियन गेम्स में मेडल लाना है.
कैसी है रामबाबू के परिवार और गांव की हालत?
रामबाबू के परिवार की स्थिति की जानकारी के लिए स्थानीय पत्रकार संतोष सोनी सोनभद्र ज़िले के मुख्यालय से लगभग 100 किलोमीटर दूर रामबाबू के गाँव बहुअरा भैरव गाँधी पहुंचे.
गाँव में रामबाबू के पिता, माता और छोटी बहन एक कच्चे मकान में रहते हैं.
रामबाबू की मां मीना देवी कहती हैं, "रिकार्ड बनउले बा तो अब सबके फ़ोन आवत बा. डीएम का, मीडिया वाले सब आवत बा. तो हमको ख़ुशी होत बा. गांव वाले भी ख़ुश बा."
रामबाबू के पिता को बेटे की जीत पर ख़ुशी और गर्व तो है लेकिन इस बात की शिकायत भी है कि सरकार उनकी बात नहीं सुनती है.
छोटे लाल कहते हैं, "बहुत बढ़िया हुआ कि हमारे देश का और हमारे गांव का नाम रोशन किया."
वो कहते हैं, "हमारी सरकार जो हैं सुन नहीं रही है. ना तो हमको पीने का पानी मिल रहा है ना ही कोई सरकारी सुविधा मिल रही है. एक किलोमीटर दूर से पीने का पानी लाते हैं क्योंकि हमारे पास सुविधा नहीं है."
छोटे लाल कहते हैं, "परिवार को पीने का पानी की सुविधा मिल जाए और अगर आवास मिल जाए तो अच्छा होगा."
'मिल्खा जैसा बनने का सपना'
रामबाबू को परिवार वालों से मिले हुए एक साल हो गया है. उनकी छोटी बहन सुमन पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीएससी की पढ़ाई कर रही थीं.
लेकिन इस बार एनआईटी में बीटेक के लिए उनका सिलेक्शन हुआ है.
वे काउंसलिंग का इंतज़ार कर रही हैं.
सुमन बताती हैं, "रामबाबू बचपन में मिल्खा का सपना देखते थे कि मैं उनकी तरह बनूंगा. और आज सच में उनका सपना साकार हो रहा है. हमें उम्मीद है कि वे ओलंपिक में खेलने जाएंगे."
सुमन भी सरकार से रामबाबू के लिए मदद की उम्मीद रखती हैं और कहती हैं, "अगर गवर्नमेंट से कोई मदद मिल जाए तो अच्छा होगा. मम्मी-पापा कितने दिन मज़दूरी करके पढ़ाएंगे. ये हमारी सरकार का फ़र्ज़ बनता है कि हमारे देश में, हमारे राज्य में, हमारे ज़िले में कोई बच्चा कुछ करना चाहता है और उसके घर की कंडीशन सही नहीं है तो मदद करें."
'गांव में होगा स्वागत'
ग्राम प्रधान प्रतिनिधि बहुअरा विजेंद्र सिंह कहते हैं कि रामबाबू की उपलब्धि ने गाँव का नाम रौशन किया है और गांव के लोग उत्साहित हैं.
वे कहते हैं कि रामबाबू के घर लौटने पर उनका अच्छे तरीक़े से स्वागत और सम्मान किया जाएगा.
विजेंद्र सिंह कहते हैं, "आवास तो मिला हुआ है. राशन कार्ड है ही. आगे हम बात करके और जो भी सुविधाएं होंगी वो देने का पूरा प्रयास करेंगे."
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