कॉमनवेल्थ गेम्स 2022: ऑस्ट्रेलिया ने पुरुष हॉकी में भारत के गोल्ड मेडल के सपने को ऐसे किया चकनाचूर

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
भारतीय टीम का कॉमनवेल्थ गेम्स की पुरुष हॉकी में सोने का तमगा जीतने का सपना फिर चूर-चूर हो गया. उन्हें ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ 0-7 से हार का सामना करना पड़ा. इस तरह भारत को रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा.
दुनिया की नंबर एक ऑस्ट्रेलिया टीम के खेल को देखकर 2010 में राजधानी के नेशनल स्टेडियम में खेले गए फाइनल की याद ताजा हो गई. उस समय भी भारत ने सेमीफ़ाइनल तक शानदार प्रदर्शन किया था. पर ऑस्ट्रलिया ने भारत पर आठ गोल जमाकर एकदम से धो दिया था.
इस मुकाबले में भी काफी कुछ वैसा ही नज़ारा देखने को मिला. भारतीय डिफेंस लगातार बचाव में व्यस्त रहा और मिडफ़ील्डर उनका सहयोग करने में लगे रहे, जिसकी वजह से भारतीय हमलों की तादाद बहुत कम हो गई.
ऑस्ट्रेलिया ने इस मैच में भी 8-0 से जीत पाने की संभावना एक समय बना ली थी. खेल समाप्ति से छह मिनट पहले टॉम विकहम ने दाहिने फ्लैंक से बने हमले में गोल के सामने से गोलकीपर श्रीजेश को छकाकर गेंद को गोल में डाल दिया.
लेकिन भारत ने गोल जमाते समय विकहम के बैक स्टिक का इस्तेमाल करने को लेकर रेफरल लिया. रेफरल में ऑस्ट्रेलिया का गोल नकार दिया गया. इससे ऑस्ट्रेलिया 2010 की तरह 8-0 से नहीं जीत सकी.

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ऑस्ट्रेलिया का दबदबा रहा बरकरार
ऑस्ट्रेलिया ने इन खेलों में 1998 में हॉकी को शामिल किए जाने के बाद से ही अपना दबदबा बनाए रखा है और किसी भी टीम को अपनी बादशाहत को चुनौती देने का मौका ही नहीं दिया है. सही मायनों में यह अकेला अंतरराष्ट्रीय हॉकी टूर्नामेंट है, जिसमें उसे कभी चुनौती नहीं मिल सकी है. इस तरह वह सभी सातों मौकों पर चैंपियन बनने में सफल रही है.
यह भी अजब संयोग है कि उन्होंने पुरुष हॉकी के फ़ाइनल में सात गोल जमाकर सातवां खिताब जीता है. यही नहीं, उन्होंने इन सात ख़िताब जीतने के दौरान कोई मैच हारा भी नहीं है.
ऑस्ट्रलिया के लिए इस मुकाबले में जैकब एंडरसन और नाथन एम्फ्रास ने दो-दो, टॉम विकहम, ब्लैक गोवर्स और फ्लायन अगिलवी ने एक-एक गोल जमाए. वह तो श्रीजेश ने कुछ नहीं तो आधा दर्जन गोलों को बचाया, अन्यथा भारतीय हार का अंतर दो अंकों में हो सकता था.
भारत का गोल जमाना तो दूर की बात, ऑस्ट्रलियाई डिफेंस ने उन्हें एक भी पेनल्टी कॉर्नर तक नहीं लेने दिया. भारतीय फारवर्ड मनदीप सिंह हों या ललित उपाध्याय या आकाशदीप सिंह अपने को एकदम से असहाय पा रहे थे.
वह जब भी गेंद लेकर ऑस्ट्रेलियाई सर्किल में पहुंच गए तो उनके डिफेंस ने गोल पर निशाना साधने के लिए जगह ही नहीं दी.

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भारत डिफेंस तोड़ने में रहा असफल
ऑस्ट्रेलिया के डिफेंडर जैक हार्वी, मैट डासन और एडर्वड ओकेंनडेन की जितनी भी तारीफ़ की जाए, वह कम है. उन्होंने भारतीय फारवर्डों के गेंद लेकर सर्किल में पहुंचने पर उन्हें आसानी से संभालकर अपने गोलकीपर को परेशान होने का मौका ही नहीं दिया.
ऐसा लगा कि ऑस्ट्रेलिया के खेल पर पूरी तरह से हावी हो जाने की वजह से भारतीय खिलाड़ी दवाब में आ गए. और अपनी धड़कनों पर काबू नहीं रख पाने की वजह से यह समझ ही नहीं पाए कि ऑस्ट्रेलियाई दबदबे का कैसे तोड़ निकाला जाए.
भारतीय टीम इन खेलों में तीसरी बार फ़ाइनल खेल रही थी. पर उन्हें इस बात का अफ़सोस रहेगा कि वह तीनों ही मौकों पर एक भी गोल जमाने में सफल नहीं हो सकी है. इस मैच में खेलने से भारतीय टीम को इस बात का अहसास ज़रूर हो गया होगा कि यदि वह विश्व विजेता बनना चाहती है, तो उसे ऑस्ट्रेलिया जैसी टीमों को फतह करना सीखना होगा.
ऑस्ट्रेलिया टीम तेज़ गति से खेलने वाली टीम है और उन्होंने शुरुआत से ही हमलावर रुख अपनाकर भारतीय डिफेंस को दवाब में ला दिया. वह पहले ही मिनट में गोल जमाने के करीब पहुंची. पर आख़िर में ओकेंडेन से फाउल होने पर यह गोल नहीं दिया गया. पर भारत को इससे भी राहत नहीं मिल सकी और उन्होंने ताबड़तोड़ हमले करके भारतीय डिफेंस को एकदम से छितरा दिया और वह बहुत ही आराम से भारतीय सर्किल में प्रवेश करके गोल जमाते रहे.

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ऑस्ट्रलिया ने पहले हाफ़ में ही बड़ी जीत की राह बना ली
ऑस्ट्रेलिया ने पहले हाफ़ में ही पांच गोल जमाकर मैच को एकतरफा बनाने का संकेत दे दिया. ऑस्ट्रेलिया ने कुछ शुरुआती मिनटों में डिफेंस करने के बाद सबसे पहले भारतीय मिडफील्ड में दरारें बनाकर अपने हमलों का सिलसिला शुरू किया, जो कभी रुकता नहीं दिखा. भारतीय खिलाड़ियों पर पहले क्वार्टर में ही दो गोल पड़ जाने पर दवाब साफ़ दिखना लगा. वह डिफेंस में गलतियां करने लगे और इसका ऑस्ट्रेलिया ने भरपूर फ़ायदा मिला.
ऑस्ट्रेलिया ने पहले दो पेनल्टी कॉर्नर बर्बाद करने के बाद तीसरे पर गोल जमाकर 1-0 की बढ़त बनाई. इस मौके पर ब्लैक गोवर्स ने गोल जमाया. भारतीय टीम अभी इस झटके से उभर नहीं पाई थी, तब ही खेल के 14वें मिनट में दूसरा गोल जमा दिया. यह गोल एम्फ्रास ने जवाबी हमले पर जमाया. इस मौके पर भारतीय गोलकीपर पीआर श्रीजेश असहाय से खड़े रह गए. ऑस्ट्रलिया का खेल पर इस तरह का दबदबा था कि वह जब भी चाह रहे थे, गोल जमाने में सफल हो गए.
ऑस्ट्रलिया ने अपने फारवर्डों टॉम विकहम, नाथन एम्फ्रास और ब्लैक गोवर्स में से दो को हमेशा आगे छोड़ा और भारतीय हमले बनने के समय लंबे एरियल पास से लगातार जवाबी हमले बनाए. इसका परिणाम यह होता था कि भारतीय मिडफील्डर समय से वापसी ही नहीं कर पाते थे. इससे ऑस्ट्रेलिया को सर्किल में पहुंचकर भारतीय डिफेंस की परीक्षा लेने में कभी भी दिक्कत होती नहीं दिखी. उन्होंने सही मायनों में अपनी गति और टफ टैकलिंग के बूते पर यह एकतरफा जीत हासिल की.
यह सही है कि विश्व विजेता ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ भारत का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है. भारत को टोक्यो ओलंपिक में दोनों टीमों के बीच खेले गए आख़िरी मैच में भारत को 1-7 से हार का सामना करना पड़ा था. आमतौर पर मुकाबले पुराने रिकॉर्डों के बजाय मैच में दिखाए जज्बे से जीते जाते हैं. लेकिन भारतीय टीम सेमीफ़ाइनल तक दिखाए जज़्बे को इस मैच में दिखाने में एकदम से असफल रही.
भारत 2014 में ग्लास्गो गेम्स के फ़ाइनल में जब ऑस्ट्रेलिया से 0-4 से हारा था, उस समय भारतीय कोच ग्राहम रीड ऑस्ट्रलिया टीम के साथ थे. उनके आने से लगा था कि वह ऑस्ट्रेलिया को थामने की राह निकाल पाएंगे पर स्थिति जस की तस ही रही.
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