जेरेमी लेलरिनूंगा: गोल्ड मेडल जीतने वाले खिलाड़ी को पसंद है मां के हाथ का बना चिकन और आलू दम

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- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महज 19 साल की उम्र में बर्मिंघम में 67 किलोग्राम में गोल्ड मेडल जीतने वाले जेरेमी लेलरिनूंगा की कामयाबी कोई चौंकाने वाली कामयाबी नहीं है.
बीते चार साल में वेटलिफ्टिंग की दुनिया में वे एक चैंपियन खिलाड़ी बनकर उभरे हैं.
क़रीब चार साल पहले वेटलिफ्टिंग की दुनिया ने पहली बार इस चैंपियन का नाम सुना था.
अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में खेले गए यूथ ओलंपिक गेम्स में 8 अक्टूबर, 2018 को 62 किलोग्राम वर्ग में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता था.
यूथ ओलंपिक गेम्स में किसी भी भारतीय खिलाड़ी के नाम यह पहला गोल्ड मेडल था.
उनकी कामयाबी का ऐसा असर भारतीय दल पर हुआ कि मानू भाखर और सौरव चौधरी ने अगले दो दिनों में दो गोल्ड मेडल जीत कर भारत को शानदार कामयाबी दिलायी थी.
हालांकि अर्जेंटीना से हज़ारों किलोमीटर दूर जेरेमी के माता पिता और उनके चार भाई, तब इंटरनेट में गड़बड़ी और यूट्यूब स्ट्रीमिंग में दिक्कत के चलते उन्हें इतिहास बनाते नहीं दिख पाए थे.

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जेरेमी का इतिहास
लेकिन रविवार को पूरे परिवार ने आइजोल स्थित अपने घर में बैठकर बर्मिंघम में जेरेमी को इतिहास रचते देखा.
जेरेमी ने क्लीन एंड जर्क में 160 किलोग्राम और स्नैच में 140 किलोग्राम यानी कुल 300 किलोग्राम का भरा उठाकर गोल्ड मेडल हासिल किया, यह कॉमनवेल्थ खेलों में नया रिकॉर्ड है.
हालांकि अंतिम राउंड में 165 किलोग्राम का भार उठाते वक्त लग रहा था कि वे सहज नहीं हैं, मानो इंजरी हो गई हो और वे इस प्रयास में नाकाम भी रहे लेकिन तब तक उन्होंने गोल्ड मेडल जीतने लायक दमखम दिखा दिया था.
इंटरनेशनल यूथ ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीतने के तुरंत बाद जेरेमी का अपना भार वर्ग बदल गया था, इसका असर उनके खेल पर भी पड़ा. 2019 के वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में वे 21वें स्थान पर रहे.
लेकिन इसके बाद उन्होंने ज़ोरदार वापसी की. दो साल बाद ताशकंद में कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में जेरेमी ने भारत के लिए 67 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल हासिल किया.

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राष्ट्रीय स्तर के बॉक्सर
इस लिहाज से वे बर्मिंघम कॉमनवेल्थ खेलों में भी मेडल के दावेदार थे. दरअसल खेल के प्रति पैशन का भाव जेरेमी में अपने पिता लालनेहितुनांग से आया जो कि खुद भी राष्ट्रीय स्तर के बॉक्सर रहे हैं और जूनियन नेशनल में चैंपियन थे.
जेरेमी अपने पिता के साथ ही बॉक्सिंग की ट्रेनिंग में शामिल होने के लिए जाते थे. नौ साल की उम्र तक जेरेमी खुद को बॉक्सिंग करते हुए देखते थे.
उनके पिता लालनेहितुनांग ने बताया कि जब जेरेमी आठ साल के थे तब उन्होंने पहली बार अपने घर के पास मौजूद एसवाय अकेडमी में एक कोच को वेटलिफ्टिंग कराते देखा. जेरेमी के तब के स्कूली दोस्त वेटलिफ्टिंग किया करते थे.
पिता ने भी बेटे को नहीं रोका और जेरेमी वेटलिफ्टिंग करने कोच के पास पहुंच गए. यह दरअसल राज्य सरकार की ओर से 'कैच देम यंग' प्रोग्राम था. लेकिन उनकी स्थिति ऐसी थी कि वेटलिफ्टिंग के लिए बांस का इस्तेमाल किया जाता था.
संयोग कुछ ऐसा था कि उसी साल यानी 2011 में वेटलिफ्टिंग के कोच मालस्वामा खाईंगते ने अपने लड़कों को बताया कि आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट वाले खिलाड़ियों के ट्रायल के लिए आ रहे हैं.

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इंटरनेशनल मेडल
बॉक्सिंग से अपने दोस्तों के बीच मस्ती करने पहुंचे जेरेमी को सबसे अनुशासित खिलाड़ी के तौर पर सेलेक्ट कर लिया गया और तब उन्हें पचास रुपये का इनाम भी दिया गया था.
इसके बाद जनवरी, 2012 में जेरेमी पुणे के आर्मी ब्यॉज ट्रेनिंग कैंप में पहुंच गए. इस बारे में उनके पड़ोसी के. जुआला बताते हैं कि तभी से जेरेमी को लेकर हम सबकी उम्मीदें काफी बढ़ गई थीं.
जेरेमी ने भी इन उम्मीदों को धवस्त नहीं होने दिया. उन्होंने 2016 के वर्ल्ड यूथ चैंपियनशिप में 56 किलोग्राम वर्ग में सिल्वर मेडल जीता.
साल 2017 के वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में फिर से सिल्वर मेडल उनके नाम रहा और 2018 के एशियाई खेलों में वे कांस्य पदक जीतने में कामयाब रहे. इस हिसाब से देखें तो हर साल कोई ना कोई इंटरनेशनल मेडल वे जीतते रहे.
उनके पिता अपने बेटे की कामयाबी पर मिजो भाषा में बताते हैं, "हम लोग अपने दोस्तों और नाते रिश्तेदारों के साथ साथ पूरे देश के आभारी हैं जिन्होंने हमारे बेटे का साथ दिया है. ईश्वर की हमारे परिवार पर अनुकंपा है और मुझे उम्मीद है कि जेरेमी आने वाले दिनों में और भी बेहतर करेगा."

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आर्थिक मुश्किलों का सामना
हालांकि उनके पिता के लिए बेटे को इस मुकाम तक पहुंचाना आसान नहीं था.
अपनी ट्रेनिंग के साथ जेरेमी की ट्रेनिंग की व्यवस्था करने में उन्हें आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, उन्होंने कई जगहों से मदद ली थी और अब वे उन सब के शुक्रगुजार हैं.
जेरेमी की कामयाबी में पिता का योगदान भी कम नहीं है.
नेशनल स्तर के बॉक्सर होने के बाद भी घर चलाने के लिए मिजोरम सरकार के लोकनिर्माण विभाग के सामान्य कर्मचारी हैं और अपनी सीमित आमदनी के बावजूद भी उन्होंने बेटे को आगे बढ़ाने में अपनी ओर से कोई कमी नहीं रखी.
अपने घर एक कमरे को उन्होंने बेटे के मेडलों से सजा रखा है और उसे गर्व के साथ हर आने वाले को दिखाते हैं.

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पेरिस ओलंपिक
जेरेमी की मां लालमुअनपुई ने बेटे की जीत पर खुशी से कहा कि इससे बढ़कर क्या ही खुशी होगी कि बेटे ने कमाल कर दिया है और इससे ज्यादा क्या कहूं.
जेरेमी ने कॉमनवेल्थ खेलों में गोल्ड मेडल तो जीत लिया है लेकिन अभी भी उनका मुख्य लक्ष्य उनसे दूर है.
टोक्यो ओलंपिक खेलों के क्वालिफाईंग राउंड में घुटने की चोट की वजह से वे हिस्सा नहीं ले पाए थे. अगर वे हिस्सा लेते तो टोक्यो ओलंपिक में पदक के दावेदार होते.
उनके पिता कहते हैं कि जेरेमी का लक्ष्य हर हाल में 2024 के पेरिस ओलंपिक में गोल्ड मेडल हासिल करना है. ज़ाहिर है जेरेमी की नज़रें कॉमनवेल्थ खेलों के बाद वहीं टिक जाएंगी.
जेरेमी की मां के मुताबिक उनका चैंपियन बेटे को आम लड़कों की तरह ही घूमने फिरने का शौक है लेकिन मां के हाथों बना चिकन ही उनका सबसे फेवरिट खाना है. चिकन के अलावा आलू की सब्जी और दाल भी जेरेमी को ख़ूब पसंद है.

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