नीतू घनघस: वर्ल्ड चैंपियन बॉक्सर के संघर्ष की कहानी

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
विमेंस वर्ल्ड बॉक्सिंग चैंपियनशिप की 48 किलोग्राम की कैटेगरी में भारत की नीतू घनघस ने गोल्ड मेडल जीत लिया है.
उन्होंने मंगोलिया की बॉक्सर लुतसईख़ान को 5-0 से हराया.
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वो इस महीने की शुरुआत में घोषित हुए बीबीसी के इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर पुरस्कार में इमर्जिंग प्लेयर का भी ख़िताब जीत चुकी हैं.
भारतीय महिला बॉक्सर नीतू घनघस ने बीते साल कॉमनवेल्थ गेम्स में मिनिमम वैट कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीता था.
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जिन्हें माना जा रहा है भविष्य की चैंपियन
भिवानी के धनाना गांव की मुक्केबाज़ नीतू घनघस ने दिखाया है कि आपके यदि इरादे बुलंद हों तो किसी भी परिणाम को हासिल किया जा सकता है. पक्के इरादे वाली इस मुक्केबाज़ को बर्मिंघम कॉमनवेल्थ खेलों की महिला मुक्केबाज़ी के 48 किलोमग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने का मज़बूत दावेदार माना जा रहा था. उन्होंने बर्मिंघम के साथ-साथ नई दिल्ली में भी गोल्ड मेडल जीतने का कारनामा कर दिखाया.
नीतू के मुक्केबाज़ी में ग्रेजुएशन की कहानी भी काफी दिलचस्प है. वह बीते साल पहली बार विश्व मुक्केबाज़ी चैंपियनशिप में भाग लेने गईं और उनका पहले ही राउंड में देश की महान मुक्केबाज़ एमसी मैरिकॉम की पुरानी रोमानियाई प्रतिद्वंद्वी स्टेलुटा से मुकाबला था.
नीतू ने अपने आक्रामक अंदाज़ से उन्हें धोकर रख दिया. हालांकि नीतू अपने इस अभियान को पदक तक पहुंचाने में सफल नहीं हो सकीं. उन्हें क्वार्टर फाइनल में एशियाई चैंपियन बाल्कीबियोवा के हाथों 2-3 अंकों से हार का सामना करना पड़ा.

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पक्के इरादे ने बनाया मुक्केबाज़
उत्तर भारत के तमाम ग्रामीण इलाकों में आज भी यह सोच है कि लड़कियों की जगह घर में है और इस सोच से नीतू का गांव धनाना भी अछूता नहीं था. पर 2008 में बीजिंग ओलंपिक में भिवानी के ही विजेंदर के मुक्केबाज़ी में कांस्य पदक जीतने से नीतू इस खेल के प्रति इतनी आकर्षित हुईं कि उन्होंने मुक्केबाज़ बनने का फैसला कर लिया.
पिता जयभगवान जानते थे कि बेटी के इस सपने को साकार करना इतना आसान नहीं है, क्योंकि बेटी को इस खेल में डालते ही गांव वालों के उलाहने सुनने पड़ेंगे. पर पिता ने इन सब बातों की परवाह किए बगैर बेटी के सपने को साकार करने की ठान ली.
पर यह भी सच है कि सफलता सब ठीक कर देती है. हमारे यहां कहा भी जाता है कि चमत्कार को नमस्कार. नीतू जब स्ट्रैंडजा में गोल्डन पंच लगा रही थीं, तब उलाहने देने वाला गांव आपस में मिठाइयां बांटकर उसकी जीत का जश्न मना रहे थे.
नीतू की मां मुकेश देवी भी मन से तो बेटी को मुक्केबाज़ बनाने की पक्षधर नहीं थीं. इसकी वजह उन्हें लगती थी कि बेटी के चेहरे पर मुक्का पड़ने से वह बिगड़ गया तो कौन उससे शादी करेगा. लेकिन मां ने इस डर को मन में ही रखा और नीतू के सपने को साकार करने में हरसंभव मदद दी.

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पिता के त्याग की अहम भूमिका
जयभगवान चंडीगढ़ में हरियाणा विधानसभा में कार्यरत थे. वह जानते थे कि बेटी को मुक्केबाज़ बनाना आसान नहीं है. इसके लिए उसे पूरा समय देना जरूरी है. इसे ध्यान में रखकर वह चार साल तक बिना वेतन के छुट्टी पर रहे. छुट्टी लेने की वजह यह थी कि उनके गांव से भिवानी मुक्केबाज़ी क्लब लेकर जाना होता था. इसके लिए प्रतिदिन बस से 20 किलोमीटर का सफर तय करना होता था.
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नीतू ने शुरुआती दौर में बताया था कि उन्होंने जब पहली बार गांव से भिवानी की बस यात्रा की थी, वह उन्हें अच्छे से याद है. हमारे पिताजी मुझे और मेरी साथी मुक्केबाज़ साक्षी को बस से लेकर गए और भिवानी में मुक्केबाज़ी क्लब में हमारे पहले दो घटे के ट्रेनिंग सत्र के दौरान बाहर बैठे रहे थे. ट्रेनिंग खत्म होने पर हम गांव लौटकर आए थे.
नीतू के जूनियर स्तर पर राष्ट्रीय सफलताएं पाने के बाद पिता जयभगवान ने फिर से नौकरी ज्वाइन कर ली. पर इससे पहले उन्होंने बेटी को मुक्केबाज़ बनाने की प्रतिबद्धता को निभाने और घर चलाने के लिए रिश्तेदारों और दोस्तों से पैसा उधार लिया.

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मुश्किल में पड़ा करियर
नीतू की कड़ी मेहनत का परिणाम 2016 के बाद दिखना शुरू हो गया था. उन्होंने 2017 और फिर 2018 में विश्व यूथ चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर सुर्खियां बटोरना शुरू कर दिया. इसी दौरान उन्होंने 2018 में एशियाई यूथ चैंपियनशिप का स्वर्ण पदक भी जीत लिया. यह वह समय था, जब उनके कोच ग्रेजुएशन के बारे में सोचने लगे थे. लेकिन तब ही उनका कंधा चोटिल हो जाने से करियर अधर में पड़ गया.
कंधे को सही शेप में लाने के लिए लंबा इलाज चला और इसकी वजह से वह 2021 में ही वापसी कर सकीं. किसी भी युवा मुक्केबाज़ के दो साल तक रिंग से दूर रहने की मजबूरी मनोबल तोड़ने के लिए काफी होती है. लेकिन नीतू के पक्के इरादे को यह मुश्किल भी नहीं तोड़ सकी.
उन्होंने कंधा सही होने के बाद वापसी के लिए जमकर मेहनत की और अपने करियर को और चमकदार बना दिया. उन्होंने स्ट्रैंडजा मेमोरियल चैंपियनशिप में 48 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर अपना जलवा बिखेर दिया.

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नीतू को किस्मत का भी मिला साथ
हम सभी जानते हैं कि भारतीय महिला मुक्केबाज़ी की बात की जाए तो एमसी मैरिकॉम का कोई जवाब नहीं है. देश की शायदा ही कोई महिला मुक्केबाज़ होगी, जिसकी वह आदर्श ना हों. नीतू भी इससे अछूती नहीं हैं, मैरिकॉम जानती हैं कि उम्र बढ़ने से करियर ढलान पर है. इसलिए वह कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक के साथ शायद करियर को विराम देना चाहतीं थीं. इसलिए उन्होंने विश्व चैंपियनशिप और एशियाई खेलों में भाग नहीं लेने का फैसला किया.
इसका पहला फायदा नीतू को विश्व चैंपियनशिप में भाग लेने का मिला. वह अपनी पहली विश्व चैंपियनशिप में भले ही पदक नहीं जीत सकीं पर वह अपनी छाप छोड़ने में सफल रहीं.
इसमें भाग लेकर लौटने पर उन्हें चयन ट्रायल में मैरिकॉम का ही सामना करना पड़ा. बहुत संभव है कि नीतू ने मैरिकॉम के ख़िलाफ़ जीत पाने के बारे में नहीं सोचा हो. पर पहले ही राउंड में मैरिकॉम घुटने में चोट खा बैठीं. पहले राउंड के आखिर में बाहर चली गईं. वह इलाज कराकर मुकाबले के लिए लौटीं पर लगातार दर्द होने के कारण वह मुकाबले से हट गईं और नीतू को कॉमनवेल्थ गेम्स का टिकट मिल गया.

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