राष्ट्रमंडल खेलों के सभी 12 वर्गों में भारतीय पहलवानों ने जीते पदक, क्या हैं इसके मायने

राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के पहलवानों की कामयाबी आश्चर्यजनक नहीं है. हाँ, भारत का कोई पहलवान अगर पदक नहीं जीत पाता तो ये चिंता का विषय अवश्य होता. इन खेलों में, कुश्ती के मैदान में भारत शुरू से ही सर्वश्रेष्ठ देशों में से है.

कनाडा के बाद, भारत ने ही राष्ट्रमंडल खेलों में सबसे अधिक पदक कुश्ती में जीते हैं. कुश्ती की दुनिया में रूस, जापान, ईरान, अमरीका और कजाख़स्तान जैसे देश सुपरपावर माने जाते हैं, और ये सभी देश राष्ट्रमंडल का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए भारत को चुनौती देने वाले देशों में केवल नाइजीरिया और कनाडा ही थे.

भारत का दबदबा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पुरुषों के मुक़ाबलों में बजरंग पुनिया (65 किग्रा), रवि दहिया (57 किग्रा), नवीन (74 किग्रा) और दीपक पुनिया (86 किग्रा) को कुश्ती में एक भी मुश्किल चुनौती नहीं मिली, उन्होंने बड़े आराम से स्वर्ण पदक जीता.

वहीं, कांस्य पदक हासिल करने वाले मोहित ग्रेवाल (125 किग्रा) और दीपक नेहरा (97 किग्रा) कनाडा के भारतीय मूल के पहलवानों से अपने मुक़ाबले हारे. मोहित अमरवीर धेसी से अपना सेमीफ़ाइनल हारे और दीपक को क्वार्टरफ़ाइनल में निशानप्रीत सिंह रंधावा से शिकस्त मिली.

महिलाओं के मुक़ाबलों में भी अंशु मलिक (57 किग्रा), पूजा गहलोत (50 किग्रा), दिव्या काकरान (68 किग्रा) और पूजा सिहाग (76 किग्रा) को हराने वाले या तो कनाडा के पहलवान थे या नाइजीरिया के.

इन सभी पहलवानों में अंशु की हार ज़रूर निराशाजनक है क्योंकि जिस तरह का प्रदर्शन वो लगातार करती आ रही हैं, उनका स्वर्ण जीतना तय माना जा रहा था. विश्व प्रतियोगिता जैसे बड़े खेलों में भी उनका सिल्वर मेडल है.

वहीं विनेश फोगाट (53 किग्रा) और साक्षी मलिक (62 किग्रा) ने अपने प्रतिद्वंदियों को कोई ख़ास चुनौती मिली. विनेश से उनके प्रतिद्वंदी तो एक अंक भी नहीं ले पाए. साक्षी ज़रूर स्वर्ण पदक के मुक़ाबले में 0-4 से पिछड़ गयी थीं लेकिन उन्होंने दमदार तरीके से वापसी करते हुए कनाडा कि ऐना गोंज़ल्ज़ को चित कर दिया था.

इस प्रदर्शन का भारत के लिए कितना महत्व?

राष्ट्रमंडल खेलों से पहले, भारत के तीन बड़े खिलाड़ियों को लेकर खासी चिंता बनी हुई थी. बजरंग पुनिया टोक्यो ओलंपिक से पहले घुटने की चोट लगने के बाद काफी डिफेंसिव हो गए थे. उनकी आक्रामक शैली कहीं खो सी गयी थी.

उन्होंने पिछले चार सालों में जो प्रदर्शन किया था, पूरे विश्व में उनकी पहचान और धाक जम चुकी थी. लेकिन लगातार रक्षात्मक खेलने के कारण उनकी प्रतिष्ठा दांव पर लग गई थी. राष्ट्रमंडल खेलों से कुछ दिन पहले ही उन्होंने कुछ मेडिकल टेस्ट करवाए और उनके अच्छे परिणाम ने उन्हें खुल कर खेलने का हौसला दिया.

बर्मिंघम खेलों में अपनी आक्रामक शैली को वापस लाने का उनके पास सुनहरा मौका था क्योंकि जब भी खिलाड़ी अपने से कमज़ोर प्रतिद्वंदियों से जूझता है तो खेल के बेसिक्स पर बिना दबाव के ध्यान दे सकता है और यही हुआ भी, बजरंग ने अपने दांव बिना हिचक लगाए और उनमें सफलता भी पाई.

अब जबकि पेरिस ओलंपिक में केवल दो वर्ष का ही समय बाक़ी है और अगले साल ओलंपिक क्वालिफाइंग भी शुरू हो जाएगी, बजरंग का आत्मविश्वास हासिल करना आवश्यक था और राष्ट्रमंडल खेलों का प्रदर्शन उन्हें कॉन्फिडेंस अवश्य देगा.

विनेश फोगाट के आत्मविश्वास की वापसी

बजरंग से भी ज़्यादा बुरा दौर विनेश फोगाट ने झेला है. टोक्यो ओलंपिक में विनेश मेडल की प्रबल दावेदार थीं लेकिन पहले ही राउंड में उनकी हार ने उनके आसमान छूते आत्मविश्वास को धरती पर ला दिया था. उनके कथित अहंकारपूर्ण व्यवहार पर भी प्रश्न-चिन्ह लगे.

प्रशासन के साथ भी उनकी तनातनी हुई और इन सबका परिणाम ये हुआ कि जो पहलवान उनके सामने खड़े होने से भी कांपते थे, उनके सामने भी उनको जीत के लिए मशक्कत करनी पड़ रही थी. मानसिक तौर पर वह बहुत कमज़ोर हो चुकी थीं और भारत के हाथ से एक बेहतरीन एथलिट निकलता जा रहा था.

राष्ट्रमंडल खेलों ने विनेश को भी वो मौका दिया कि मैट पर जिस तरह का खेल वो खेलना चाहती हैं उसका आत्मविश्वास उन्हें मिले.

वर्ल्ड चैंपियनशिप कि ब्रॉंज मेडलिस्ट सामंथा स्टीवर्ट को उन्होंने केवल 36 सेकेंड में चित्त कर के जो शुरुआत कि तो पलट कर नहीं देखा. नाइजीरिया और श्रीलंका के पहलवान तो इनकी पकड़ में ऐसे फंसे कि हिल भी नहीं पाए.

ये एक जबरदस्त प्रदर्शन था जो भारत के लिए अच्छा समाचार है. भारतीय कुश्ती को ऊपर ले जाने में विनेश ने अहम भूमिका अदा की है और उनका फॉर्म में लौटना राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक से कहीं ज़्यादा अहमियत रखता है.

साक्षी मलिक का गोल्ड अच्छा संकेत

वहीं साक्षी मालिक अपने से कहीं जूनियर खिलाडियों, जैसे सोनम मलिक से लगातार हारने के बाद अपनी रिटायरमेंट के बारे में सोचना शुरू कर चुकी थी. लेकिन लखनऊ में हुए ट्रायल्स में उन्होंने सोनम और मनीषा को हराने के बाद जिस तरह से बर्मिंघम में प्रदर्शन किया वो काबिल-ए-तारीफ़ है.

वो एक अलग तरह कि पहलवान लग रही हैं. उनका फॉर्म में लौटना और मुश्किल प्रतिस्थिति में हार न मानना भारत कि महिला कुश्ती के लिए अच्छा संकेत है

ये तो रही बात भारत के बड़े पहलवानों की. पूजा गहलोत, पूजा सिहाग और नवीन का इन खेलों में प्रदर्शन उनकी गेम के लिए अच्छा रहेगा.

ये खिलाड़ी अभी भी विश्व स्तरीय पहलवान नहीं हैं लेकिन पदक की जीत आगे बढ़ने के लिए बहुत प्रेरणा दायक होते हैं. महिलाओं की 50 और 76 किलोग्राम में भारत ने बहुत समय से कोई ख़ास उपलब्धि हासिल नहीं की थी.

यही हाल पुरुषों के 74 किलोग्राम में भी था. जब से सुशील कुमार ने खेलना बंद किया है 74 किलोग्राम वज़न में ऐसा कोई पहलवान नहीं मिला जो उनकी जगह ले सके. हालांकि गौरव बालियान और जीतेन्द्र कीन्हा से उम्मीद है लेकिन वो अभी भी कुछ ख़ास नहीं कर पाए हैं. ऐसे में नवीन ने फिर से उम्मीद बंधाई है कि वो अच्छा कर पाएंगे.

(पीटीआई के खेल पत्रकार अमनप्रीत सिंह से बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)