BBC ISWOTY- ईशा सिंह: निशानेबाज़ी में भारत की सबसे कम उम्र की चैंपियन

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भारत की सबसे कम उम्र की पिस्टल शूटर ईशा सिंह को खेल-कूद के प्रति लगाव परिवार से विरासत में हासिल हुआ है. उनके पिता सचिन सिंह मोटरस्पोर्ट्स में नेशनल रैली चैंपियन रहे हैं.
हालांकि उन्हें मोटर ड्राइविंग से ज़्यादा पिस्टल आकर्षित करती थी. ईशा सिंह अभी 16 साल की हैं लेकिन उन्होंने महज़ नौ साल की उम्र से निशानेबाज़ी की ट्रेनिंग लेनी शुरू कर दी थी.
वो कहती हैं कि पिस्टल की गोली की आवाज़ उनके कानों में किसी संगीत की तरह लगती है और इस खेल में जिस हिम्मत की ज़रूरत होती है, उससे उन्हें प्यार था.
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उन्होंने 2014 में पहली बार बंदूक थामी थी और साल 2018 में उन्होंने नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप का खिताब जीत लिया. वो उस वक्त भी एक किशोरी ही थीं. सिर्फ़ 13 साल की उम्र में उन्होंने मनु भाकर और हिना सिद्धू जैसे अंतरराष्ट्रीय मेडल विजेताओं को मात दे दी थी. उन्होंने इसके साथ ही यूथ, जूनियर और सीनियर कैटेगरी में तीन गोल्ड मेडल जीते.
उन्होंने अपनी क्षमता साबित करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धाओं में शिरकत की और जूनियर वर्ल्ड कप में सिल्वर और एशियाई शूटिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल किया.
किसी खेल को लेकर आकर्षण ही सिर्फ़ आपकी कामयाबी की गारंटी नहीं हो सकती है. आपको कामयाब होने के लिए कई तरह की बाधाओं से होकर गुज़रना पड़ता है.
ईशा सिंह को ऐसी ही बाधाओं से गुज़रना पड़ा है. तेलंगाना में जहाँ वो रहती थीं वहाँ कहीं नज़दीक में ट्रेनिंग के लिए कोई शूटिंग रेंज नहीं था.
जब प्रतियोगिता होने वाली होती थी तब उन्हें ट्रेनिंग के लिए घर से एक घंटे की दूरी तय करके गाचीबॉली स्टेडियम तक जाना होता था. उन्हें मैनुअल रेंज पर प्रैक्टिस करनी पड़ती थी.
उनके लिए पढ़ाई, ट्रेनिंग और ट्रैवल इन तीनों के बीच समय का संतुलन बनाने को लेकर जूझना पड़ता था.
किसी नौ साल की बच्ची के लिए बच्चों की तरह मस्ती वाली एक्टिविटी की तरफ आकर्षित होना बहुत स्वभाविक था. उनके लिए अपने आप को इन सबसे ध्यान हटाकर खेल पर फोकस करना इतना आसान नहीं था.
हालांकि उन्होंने अपने लिए एक लक्ष्य तय कर रखा था और वो इस खेल से प्यार करती हैं इसलिए उन्हें इन चुनौतियों से निपटने में मदद मिली.

चुनौतियाँ
ईशा सिंह अपने करियर में आज जहाँ पहुँची हैं, इसमें सिर्फ अकेले उनकी कुर्बानियाँ ही नहीं हैं. उनके पिता को अपनी मोटर ड्राइविंग का करियर छोड़ना पड़ा ताकि वो अपनी बेटी पर ध्यान दे सकें.
ईशा सिंह के माता-पिता दोनों ने ही उनका करियर बनाने के लिए बहुत समर्पण दिखाया.
एक युवा खिलाड़ी को लगातार हौसला देते रहने की ज़रूरत पड़ती है और ईशा सिंह को कभी भी इसकी कमी नहीं हुई. उनके पिता हमेशा उनके साथ खड़े रहे.
ये कुर्बानियाँ बेकार नहीं गईं. चार सालों के अंदर ही ईशा सिंह नेशनल चैंपियन बनकर उभरीं.
इस कामयाबी ने उनके करियर की नींव रख दी. इससे उनमें यह आत्मविश्वास आया कि वो थोड़ी और कोशिश करें तो अंतरराष्ट्रीय मेडल भी जीत सकती हैं.
गौरव का एहसास
उनका यह आत्मविश्वास गलत नहीं साबित हुआ. उन्होंने नेशनल चैंपियनशिप में कामयाबी हासिल करके अगले साल ही अपने पहले ही जूनियर वर्ल्ड कप में सिल्वर मेडल जीत लिया. साल 2019 में जर्मनी के सुहल में यह आयोजन हुआ था.
हालांकि उसी साल रियो डि जेनेरियो में हुए सीनियर वर्ल्ड कप में उन्हें कोई मेडल हासिल नहीं हो सका.
उस वक्त उन्होंने कहा था कि इस उम्र में इतने बड़े स्तर पर प्रतियोगिता में हिस्सा लेने से उनके आत्मविश्वास को मज़बूती मिलती है.
बाद में उन्होंने उसी साल दोहा में एशियाई शूटिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल किया.
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उनका अगला लक्ष्य 2024 के पेरिस ओलंपिक में मेडल जीतना है. कोविड-19 की वजह से उनके कई महीने बर्बाद हुए हैं फिर भी वो कहती हैं कि वो यूथ ओलंपिक, कॉमनवेल्थ गेम्स और 2022 में होने वाले एशियाई खेलों में अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन करने का इरादा रखती हैं.
शूटिंग रेंज पर ईशा सिंह के शानदार प्रदर्शन को भारत सरकार ने भी 2020 में प्रधानमंत्री बाल पुरस्कार से सम्मानित करके सराहा है.
ईशा सिंह कहती हैं कि उनके लिए यह गौरव का एहसास कराने वाला है लेकिन सरकार को खेल-कूद में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए. इसके लिए उनकी सुध लेने और उन्हें सम्मानित करने की ज़रूरत है.
(यह लेख बीबीसी को ईमेल के ज़रिए ईशा सिंह के भेजे जवाबों पर आधारित है.)
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