एशिया कपः दुबई में धोनी, रोहित का क्या है दांव पर?

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पिछले साल दिसंबर के महीने में जब मोहाली में रोहित शर्मा ने नाबाद दोहरा शतक जड़ते हुए अपनी टीम को मैच जिताया तो वो तीन कारणों से यादगार बन गया.
पहला, वो तीन वनडे मैचों की सिरीज़ का दूसरा मुक़ाबला था और भारत के लिए जीतना ज़रूरी था क्योंकि वो पहला मैच गंवा चुका था. दूसरा, यह पहली बार था जब रोहित शर्मा के हाथों में टीम की बागडोर थी. यानी बतौर कप्तान उनकी साख दांव पर लगी थी. तीसरा, सहवाग के बाद वो ऐसे दूसरे बल्लेबाज़ बने थे जिसने अपनी ही कप्तानी में वनडे में दोहरा शतक जड़ा हो.
रोहित ने न केवल वो मैच बल्कि अगले मुक़ाबले को भी जीता और इस तरह अपनी कप्तानी में भारत को पहली सिरीज़ में जीत दिला दी. इसके बाद उन्होंने भारत को टी20 सिरीज़ में भी बड़े अंतर से सभी तीन मैचों में जीत दिलाई.
हालांकि श्रीलंका के ख़िलाफ़ उस सिरीज़ में भी रोहित अपने बल्ले से एक जैसा प्रदर्शन नहीं कर सके. पहले वनडे में दो और तीसरे में वो महज सात ही रन बना सके थे. वहीं टी20 मुक़ाबले में भी उनका स्कोर 17, 118 और 27 रहा.
पहली बार कप्तानी करने उतरे रोहित को हालांकि आगे वनडे मैचों में टीम की बागडोर थामने का मौका नहीं मिला लेकिन अगले तीन महीनों में छह और टी20 मैचों की उन्होंने कप्तानी की. इनमें से पांच में भारत की जीत हुई.
दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ एक टी20 मुक़ाबले को छोड़ दें तो रोहित ने बाक़ी सभी मैचों में एशियाई टीम के ख़िलाफ़ ही कप्तानी की है.

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चुनौती मिलने लग गई है रोहित को
अब विराट कोहली को आराम दिए जाने की वजह से एशिया कप में एक बार फिर रोहित के हाथों में कप्तानी है. यानी मुक़ाबला फिर एशियाई टीमों से ही है.
भारतीय टीम इंग्लैंड के दौरे से वनडे और टेस्ट सिरीज़ गंवा कर लौटी है. जबकि टी20 सिरीज़ में 2-1 से मिली जीत में रोहित शर्मा की भूमिका बेहद अहम रही थी.
इसके अंतिम और निर्णायक मैच में जब भारत के सामने इंग्लैंड ने 199 रनों का लक्ष्य रखा तब वो रोहित ही थे जिन्होंने 56 गेंदों में नाबाद शतक लगा कर टीम की नैय्या पार लगाई थी. यानी इंग्लैंड में मिली एकमात्र सिरीज़ जीत में रोहित शर्मा ने अपनी दमदार भूमिका निभाई थी.
एशिया कप में एक बार फिर उनसे ऐसे ही दमदार प्रदर्शन की उम्मीद है, न केवल बल्लेबाज़ी में बल्कि इस बार तो उनकी कप्तानी पर भी नज़र रहेगी.

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रोहित पर दवाब
बतौर कप्तान रोहित पर न केवल 7वीं बार एशिया कप घर लाने का बल्कि मौजूदा चैंपियन होने की वजह से ख़िताब बचाने का दबाव रहेगा. तो एक बल्लेबाज़ के रूप में उनकी साख दांव पर लगी होगी क्योंकि इंग्लैंड में खेली गई टेस्ट सिरीज़ में जब आखिरी दो मैचों के लिए टीम चुनने की बारी आई तो चयनकर्ताओं ने उन्हें नज़रअंदाज कर दिया था.
उन पर हनुमा विहारी (24 साल) और पृथ्वी शॉ (18 वर्ष) को तरज़ीह दी गई. कारण स्पष्ट है, ये दोनों खिलाड़ी घरेलू क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे जबकि रोहित शर्मा इस साल के शुरू में दक्षिण अफ्रीका में खेली गई टेस्ट सिरीज़ के पहले दो मैच में मिले मौके को गंवाते हुए चार पारियों में केवल 78 रन ही बना सके थे.
भारत दोनों टेस्ट हार गया था. लेकिन इसके बाद उन्हें जोहानिसबर्ग टेस्ट से बाहर कर दिया गया और टीम मैच जीत गई थी.
हनुमा विहारी ने इंग्लैंड में एकमात्र टेस्ट में मिले मौके को भुनाते हुए अर्धशतक जमाया है. इतना ही नहीं, वो रोहित (31 साल) की तुलना में युवा (24 साल के) हैं और घरेलू क्रिकेट में (दुनियाभर के वर्तमान क्रिकेटरों में सर्वाधिक) 59.79 के औसत से 5142 रन बना चुके हैं.
वहीं, रोहित का प्रथम श्रेणी क्रिकेट में औसत 54.71 है तो वनडे में 44.99 का. वनडे में खेली गई पिछली 10 पारियों में उन्होंने दो शतक ज़रूर जमाए हैं लेकिन बाकी 8 पारियों में उनका सर्वाधिक स्कोर 20 रहा है. यानी उनकी बल्लेबाज़ी में उतार चढ़ाव पहले की तरह ही मौजूद है.

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रोहित को दरकिनार करना इतना आसान भी नहीं
वैसे अगर बतौर कप्तान रोहित की बल्लेबाज़ी की बात करें तो उन्होंने तीन वन-डे में 108.50 की औसत से 217 रन बनाए हैं.
रोहित एकमात्र ऐसे क्रिकेटर हैं, जिन्होंने टी-20 में तीन शतक और वन-डे में तीन दोहरे शतक लगाए हैं. रोहित, टी20 में तीन शतकों का रिकॉर्ड न्यूज़ीलैंड के कॉलिन मुनरो के साथ साझा करते हैं.
यदि रोहित बतौर कप्तान और बल्लेबाज़ इस टूर्नामेंट में नाकाम रहते हैं तो भी चयनकर्ता उन्हें ख़ारिज नहीं कर पाएंगे. लेकिन ये संभव है उनके नाम के साथ कुछ युवा नामों पर भी विचार किए जाए.
महेंद्र सिंह धोनी

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कुछ दिनों से प्रदर्शन में गिरावट दिखने लगी है
रोहित के साथ ही जिस दूसरे बड़े खिलाड़ी की साख दांव पर लगी है, वो हैं धाकड़ बल्लेबाज़ और पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी.
धोनी ने अब तक जो कुछ भी भारत के लिए हासिल किया है यह सर्वविदित है. इसमें कोई शक भी नहीं कि वो एक महान क्रिकेटर हैं लेकिन हाल के दिनों में उनकी बल्लेबाज़ी में जो गिरावट आई है उससे और जो वो पहले की तरह 'फ़िनिशर' नहीं दिख रहे उससे टीम के प्रदर्शन पर असर पड़ा है.
उनके जैसे क्रिकेटिंग माइंड की ज़रूरत तो है लेकिन बल्लेबाज़ी के दौरान स्ट्राइक रोटेट नहीं कर पाने की वजह से उनकी साख पर भी असर पड़ा है. उनकी आलोचना की गई.
आईपीएल 2018 में ज़रूर पुराने धोनी की झलक मिली थी लेकिन इंग्लैंड के ख़िलाफ़ सिरीज़ में उनकी धीमी बल्लेबाज़ी उनके प्रशंसकों को भी रास नहीं आई. ख़ास कर अंतिम दो वनडे मैचों में, जब उनके बल्ले से बड़ी पारी की ज़रूरत थी तो उन्होंने मायूस किया और पहला वनडे जीतने के बाद भी टीम सिरीज़ हार गई.

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ऋषभ पंत बने चुनौती
इन सब के बावजूद टीम को धोनी की कितनी ज़रूरत है?
भारत के सबसे सफ़ल कप्तान गाहे बगाहे अपने विराट कोहली के संकटमोचक बनते रहे हैं. खास कर डीआरएस के मामले में अगर उन्होंने हामी भर दी तो विराट दोबारा नहीं सोचते.
लेकिन उनके (धोनी के) जन्मदिन के बाद से बयार उनके अनुकूल बहती नहीं दिख रही है.
इसकी शुरुआत हुई इंग्लैंड के ख़िलाफ़ टेस्ट सिरीज़ के साथ.
जब पहले दो टेस्ट मैच में दिनेश कार्तिक सुपर फ्लॉप रहे (चार पारियों में महज 21 रन) तो अंतिम तीन टेस्ट के लिए रिषभ पंत को मौका दिया गया और उन्होंने मिले अवसर का लाभ उठाते हुए बेशकीमती 114 रनों की पारी खेल दी. तीन टेस्ट में उन्होंने विकेट के पीछे 15 कैच भी लपके.

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यही धोनी के लिए ख़तरे की घंटी है.
निश्चित ही केवल एक सिरीज़ या टूर्नामेंट के प्रदर्शन से किसी खिलाड़ी को नहीं आंका जा सकता. लेकिन वो कहते हैं न कि जब आगाज ऐसा है तो...
धोनी 37 के हैं, कार्तिक 33 से अधिक के और ऋषभ पंत अगले महीने 21 के होने जा रहे हैं. यानी धोनी से 16 साल छोटे हैं. साथ ही उनका प्रदर्शन उन्हें लंबी रेस का घोड़ा बता रहा है. ऐसे में धोनी के प्रदर्शन पर सबकी निगाहें जमी होंगी.
तो कभी वनडे के पर्याय बन चुके महेंद्र सिंह धोनी के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का सफ़र अभी कितना बचा है यह बहुत कुछ एशिया कप में उनके प्रदर्शन पर निर्भर करेगा.
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