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चंद्रयान के प्रक्षेपण की तैयारी पूरी | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जैसे-जैसे बुधवार की सुबह क़रीब आ रही है, अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े कई भारतीय वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों की दिलों की धड़कनें भी तेज़ होती जा रही हैं. और इसकी वजह यह है कि सदियों से भारत में चंदामामा की कहानी सुनते आए लोगों की मुलाका़त आजतक चंद्रमा से नहीं हो पाई थी पर अब मुलाक़ात न सही, सौगात तो जा रही है. चाँद पर भारत का पहला मानवरहित अभियान, चंद्रयान-1 बुधवार की सुबह भारतीय समयानुसार क़रीब साढ़े छह बजे प्रक्षेपण के लिए तैयार है. तमिलनाडु से सटा और आंध्रप्रदेश की सीमा में स्थित श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से इस चंद्रयान को भेजा जाना है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं और सोमवार से ही इसके प्रक्षेपण की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. चंद्रयान-1 को श्रीहरिकोटा से बुधवार की सुबह छह बजकर 20 मिनट पर प्रक्षेपित किया जाना है. सोमवार से तबतक का समय इस दौरान पीएस-2 और पीएस-4 जैसे प्रमुख ईंधन भरने और तैयारियों का अंतिम निरीक्षण करने में इस्तेमाल हो रहा है. मौसम का असर नहीं मंगलवार सुबह से चेन्नई और श्रीहरिकोटा में छिटपुट बौछारों और आसमान में बादल देखने को मिल रहे हैं. फुहारों के बीच भीगते बचते हमने इसरो प्रवक्ता बीआर गुरूप्रसाद से पूछा कि मौसम में इस तेवर का असर क्या प्रक्षेपण पर भी पड़ सकता है. इसपर उन्होंने बताया कि श्रीहरिकोटा में बारिश हुई है. मौसम नम है, और बारिश हो सकती है पर प्रक्षेपण की तैयारी की गति सामान्य बनी हुई है और अभी तक की स्थिति सबकुछ सकारात्मक ही बता रही है. यानी मौसम से प्रभावित हुए बिना ही पीएसएलवी के आजमाए हुए सफल और विश्वास योग्य लांचर पर सवार होकर चंद्रयान चंदामामा के घर जाने को तैयार है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक चंद्रयान के साथ 11 अन्य उपकरण एपीएसएलवी-सी11 से प्रक्षेपित किए जा रहे हैं जिनमें से पाँच भारत के हैं और छह अमरीका और यूरोपीय देशों के. चंद्रयान-1 का सफ़र
11 अपकरणों को अंतरिक्ष में ले जा रहे चंद्रयान की सफलता भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम के लिहाज से एक काफी बड़ी उपलब्धि होगी. इसरो से मिली जानकारी के मुताबिक सबसे पहली जिस कक्षा में यह यान पहुँचेगा उसकी पृथ्वी से न्यूनतम दूरी 250 किलोमीटर की है और अधिकतम 23,000 किलोमीटर की. पर चंद्रयान यह एक चक्कर काटकर नई कक्षा में प्रवेश कर जाएगा. इस 3,87,000 किलोमीटर वाली कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा करने में इस चंद्रयान को 11 दिन का वक्त लगेगा. चंद्रयान पृथ्वी के चारों ओर पाँच अलग अलग कक्षाओं में धूमेगा. यहीं अंतिम कक्षा में चंद्रयान की मुलाक़ात होगी चंद्रमा से. जिस वक्त यह चंद्रयान सबसे बाहरी कक्षा में पृथ्वी के चक्कर लगा रहा होगा, उसी वक्त पृथ्वी के गिर्द धूमता चंद्रमा भी ऐसी जगह पर पहुँच जाएगा जहाँ से चंद्रयान और उसके बीच की दूरी कुछ सौ किलोमीटर भर ही रह जाएगी. इसी वक्त एक नए अंतरिक्षयान मोटर को चालू करके चंद्रयान को चंद्रमा की कक्षा में लाया जाएगा. यहाँ पहले 5000 किलोमीटर की कक्षा से शुरू करके चंद्रयान तीसरी और अंतिम कक्षा में चंद्रमा से कुल 100 किलोमीटर दूर होगा. वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रयान-1 पृथ्वी के उपग्रह चंद्रमा की सतह से सौ किलोमीटर ऊपर स्थापित कर दिया जाएगा. इसी बिंदु से चंद्रयान अपना काम शुरू करेगा. पहले चंद्रमा की सतह पर ‘मून इंपेक्ट प्रोब’ को उतारा जाएगा औऱ फिर वहाँ से जानकारी जुटाने का काम शुरू होगा. इस काम में मदद करेंगे चंद्रयान के साथ गए कैमरे और स्पेक्ट्रोमीटर. इसरो का आकलन है कि इस अभियान को पूरा होने में दो वर्ष तक का समय लगेगा. महत्वाकांक्षी अभियान हालांकि चंद्रमा के सच को खोजने खंगालने का काम तो सितंबर, 1959 में ही शुरू हो गया था जब सोवियत लूना-2 अंतरिक्षयान ने पहली बार चंद्रमा की सतह को छुआ. इसके बाद 1969 में नील आर्मस्ट्रांग ने चंद्रमा की धरती पर पहला क़दम रखकर इतिहास रच दिया. पर भारत अभी तक ऐसी उपलब्धियों से दूर है. बुधवार को सफल प्रक्षेपण के बाद चंद्रयान अगर चंद्रमा की सतह को छूता है तो भारत के लिए भी यह बड़ी उपलब्धि बन जाएगी. पर एक सवाल फिर भी जेहन में उठता है कि पिछले कुछ दशकों से दुनिया के अन्य देशों ने चांद को जितना खंगाता है, उससे क्या अलग और नया भारत खोजने जा रहा है. जाहिर है, भारत के लिए इसका सटीक जवाब अभी कुछ वक्त लेगा पर इसरो ऐसे कई सवालों की ओर इशारा करता है जिनके जवाब दशकों चले अभियानों में भी अंतरिक्ष वैज्ञानिक नहीं खोज पाए हैं. यहाँ तक कि चंद्रमा की उत्पत्ति और विकास तक को लेकर विज्ञानिकों में एक राय नहीं है. फिर चंद्रमा के बारे में जितनी जानकारी अभी तक हासिल हुई है, उससे कहीं, कहीं ज़्यादा जानकारी अभी भी खोज का विषय है. फिर नाभिकीय ईधन के तौर पर इस्तेमाल हो सकने वाली हीलियम-3 गैस की मात्रा का आकलन और चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी जैसे सवालों का हल खोजने की कोशिशें तो हुई हैं पर नतीजा अभी भी भ्रम के ज़्यादा क़रीब है. ऐसे में भारत अपने इस अभियान को लेकर खासा उत्साहित है. अगर भारत का मानवरहित चंद्रयान चंद्रमा पर पहुँचता है तो इससे भारत के वैज्ञानिकों का अपने ही यान में चंद्रमा पर पहुँचने का सपना साकार हो सकेगा. चंद्रयान-1 को चंद्रमा पर भेजने के अभियान के लिए यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी (नासा) के बीच समझौता भी हुआ है. चंद्रयान-1 अपने साथ यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी के छह अनुसंधान उपकरण भी साथ ले जाएगा. |
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