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'चंद्रमा में सतह के नीचे पानी था' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि पहले चंद्रमा के भीतरी हिस्से में पानी था. इस खोज से चंद्रमा के अस्तित्व में आने के सिद्धांतों को भी चुनौती मिल रही है. इससे पहले माना जाता रहा है कि पृथ्वी से किसी और ग्रह जितनी बड़ी वस्तु के टकराने से चंद्रमा का निर्माण हुआ होगा. और वैज्ञानिक यह भी मानते रहे हैं कि इस टकराहट से जो ऊर्जा उत्पन्न हुई होगी, उसने चंद्रमा के पानी को वाष्पित कर दिया होगा. लेकिन 'नेचर' पत्रिका में प्रकाशित नए अध्ययन में कहा गया है कि तीन अरब साल पहले चंद्रमा के भीतर मौजूद पानी ज्वालामुखियों के ज़रिए चंद्रमा के सतह पर आया था. इस अध्ययन में कहा गया है कि चंद्रमा में पानी तब से था जब वह अस्तित्व में आया था. यह नई खोज चंद्रमा में ज्वालामुखी फटने से बने काँच के टुकड़ों के अध्ययन से संभव हुई है. काँच के टुकड़े ये छोटे-छोटे टुकड़े साठ के दशक के अंत में और सत्तर के दशक के शुरुआती सालों में अमरीका के अपोलो मिशन ने इकट्ठे किए थे. इन रंग-बिरंगे काँच के टुकड़ों का वैज्ञानिक दशकों से अध्ययन कर रहे थे और यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि इनकी बनावट में किन रासायनिक पदार्थों का योगदान है. वे विशेष तौर पर यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि इसमें पानी का कोई तत्व है या नहीं. बरसों तक कोई निर्णय नहीं हो पाया और यह सिद्धांत चलता रहा कि चंद्रमा में पानी नहीं था. अब ब्राउन यूनिवर्सिटी, द कार्नेगी इंस्टिट्यूशन फ़ॉर साइंस और केस वेस्टर्न रिज़र्व यूनिवर्सिटी की टीम ने एक नई तकनीक से इन काँच के टुकड़ों और खनिज के टुकड़ों का बारीकी से अध्ययन किया और पाया कि उसमें पानी के महीन अंश मौजूद हैं. वॉशिंगटन डीसी में कार्नेगी इंस्टिट्यूशन के एरिक हॉरी ने कहा, "हमने एक ऐसा तरीक़ा विकसित किया जिससे दस लाख में पानी का पाँचवा हिस्सा भी तो उसका पता लगाया जा सके." वे कहते हैं, "हमें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि चंद्रमा से आए टुकड़ों में हर दस लाख में से 46 हिस्से पानी के मौजूद थे." इस टीम ने एक के बाद एक परीक्षणों से पाया कि इन टुकड़ों में हाइड्रोजन की मात्रा हर समय मौजूद थी और इस पर वायुमंडल की हाइड़्रोजन का असर नहीं हुआ था. ब्राउन यूनिवर्सिटी के अलबर्तो साल का कहना है, "इससे यह साबित हुआ कि पानी चंद्रमा के भीतर से ही आया." वैज्ञानिक मानते हैं कि पानी ज्वालामुखी फटने से सतह पर आया लेकिन इसका 95 फ़ीसदी हिस्सा ज्वालामुखी के ताप से वाष्पित हो गया. एरिक हॉरी का कहना है, "पहले यह माना जाता रहा है कि चंद्रमा पूरी तरह से सूखा है लेकिन इस नई खोज से हमने एक बड़ी छलांग लगाई है." चूंकि चंद्रमा का गुरुत्वबल इतना कमज़ोर है कि वह वायुमंडल को थामे नहीं रख सकता इसलिए माना जा रहा है कि पानी के वाष्पित कण अंतरिक्ष में चले गए होंगे. वैज्ञानिक मानते हैं कि कुछ कण चंद्रमा के ठंडे ध्रुवों की ओर चले गए होंगे. वैज्ञानिक मान रहे हैं कि इस नए शोध से इस बात पर भी रोशनी डाली जा सकेगी कि पृथ्वी में पानी का अस्तित्व कब से है. |
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