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गुरुवार, 13 दिसंबर, 2007 को 13:35 GMT तक के समाचार
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दीर्घजीवी हो सकते हैं शनि ग्रह के छल्ले
शनि के छल्ले
संभव है कि यह ग्रह हमेशा ही ऐसा दिखता हो
वैज्ञानिकों का मानना है कि शनि ग्रह की पहचान वाले उसके बाहरी छल्ले अब तक उपलब्ध जानकारी से कहीं ज़्यादा पुराने हो सकते हैं.

कासिनी अंतरिक्ष यान के अन्वेषण से मिले नए आँकड़े बताते हैं कि ग्रह के चारों ओर घूम रहे कणों की यह हल्की पट्टियाँ अरबों साल पुरानी हो सकती हैं और भविष्य में भी लंबे समय तक चल सकती हैं.

कसिनी नाम का अंतरिक्ष यान शनि की कक्षा में 12 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ़तार से चल रहा है और वहाँ से ग्रह के बारे में जानकारी भेज रहा है.

इस जानकारी का मतलब है कि यह ग्रह शायद हमेशा ही ऐसा दिखता रहा है.

पिछले आँकड़ों ने वैज्ञानिकों को यह विश्वास दिलाया था कि यह छल्ले मात्र 1000 लाख साल पहले ही बने होंगे जब चंद्रमा या कोई और ग्रह शनि की कक्षा में आया होगा.

इस प्रॉजेक्ट से जुड़े प्रोफ़ेसर लैरी एस्पोज़िटो ने अमेरिकन जीओफ़िज़िकल यूनियन की बैठक को बताया कि कासिनी ने ये नज़रिया पूरी तरह से बदल दिया है.

 नए परिणाम बताते हैं कि यह छल्ले तब तक चल सकते हैं जब तक सौर व्यवस्था चले. यह अरबों साल तक रहेंगे
प्रोफ़ेसर लैरी एस्पोज़िटो

उन्होंने कहा, "शनि पर वोएजर परीक्षण (1970) के बाद सोचा गया था कि शनि के छल्ले ज़्यादा पुराने नहीं हों और शायद केवल इतने पुराने हों जितने डायनोसॉर हैं."

उनके अनुसार, "नए परिणाम बताते हैं कि यह छल्ले तब तक चल सकते हैं जब तक सौर व्यवस्था चले. यह अरबों साल तक रहेंगे."

मिनी चंद्रमा

कासिनी अंतरिक्ष यान अपने 'अल्ट्रावाइलेट इमेजिंग स्पेक्ट्रोग्राफ़' से इन छल्लों के बारे में अध्ययन कर रहा है. इसके अनुसार जब इन छल्लों से रोशनी गुज़ारी गई तो जो कण दिखाई दिए उनमें रेत के कण से लेकर बड़े शिलाखंड के आकार तक के कण दिखे.

इसका अर्थ यह निकाला गया कि पहले के अनुमानों के मुकाबले इसके पानी और बर्फ़ के कण बहुत ज्यादा सघन हैं, माना गया है कि इसमें वोएजर परीक्षण में अनुमानित द्रव्यमान से तीन गुना ज़्यादा द्रव्यमान हो सकता है.

शनि के छल्ले
संकेत हैं कि यह छल्ले एकसाथ नहीं बने क्योंकि इनमें अलग-अलग उम्र के छल्ले हैं

कासिनी ने जिन बातों पर ध्यान दिया उनके अनुसार यह छल्ले एकसाथ नहीं बने हो सकते हैं क्योंकि इनमें अलग-अलग समय में बने छल्ले हैं जिनमें कुछ काफ़ी नए भी हैं.

इसे समझाते हुए प्रोफ़ेसर एस्पोज़िटो और उनके सहकर्मी यह विचार रखते हैं कि इसकी सामग्री इकट्ठी होकर छोटी-छोटी किरणें जैसी बना लेती हैं.
दूसरे शब्दों में, यह पुनर्चक्रण प्रक्रिया है जो लगातार चलती रहती है.

लेकिन दरअसल यह छल्ले कब बने, इस सवाल के जवाब में कोई ठोस जवाब नहीं मिल पाया है.

वैज्ञानिक अभी भी इस बारे में सोच रहे हैं कि यह छल्ले किसी टक्कर का परिणाम हो सकते हैं – लेकिन शायद यह लंबे समय पहले हुआ होगा.

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