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बुधवार, 30 अप्रैल, 2008 को 14:23 GMT तक के समाचार
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अंतरिक्ष बाज़ार में भारत के बढ़ते कदम

पीएसएलवी
भारत के लिए अगली बड़ी चुनौती चंद्रायान 1 का प्रक्षेपण होगा
सॉफ़्टवेयर औऱ सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत दुनिया में अपनी पहचान बना चुका है.

भारत के बारे में जो बात कम लोग जानते हैं वो ये है कि भारत में 30 करोड़ लोग 40 रुपए प्रतिदिन से भी कम आय पर जीते हैं. इसके बावजूद भारत विश्वस्तरीय रॉकेट और उपग्रह तकनीक विकसित करने में आगे है.

सोमवार को भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) ने एक साथ दस उपग्रह छोड़कर विश्व कीर्तिमान बनाया.

इससे पहले ये विश्व कीर्तिमान रूस के नाम था जिसने एक साथ आठ उपग्रह छोड़े थे.

एक साथ 10 उपग्रह अंतरिक्ष को छोड़ने के लिए बेहद आधुनिक तकनीक की ज़रूरत होती है.

इसरो की तुलना अग़र दूसरी अंतरिक्ष एजेंसियों से की जाए तो इसरो किसी बच्चे की तरह है. इसरो की स्थापना मात्र 35 वर्ष पहले हुई थी.

दक्षिण भारत स्थित श्रीहरिकोटा उड़ान स्थल से इस अंतरिक्ष यान की ये छब्बीसवीं उड़ान थी.

तुलना

इसरो में 16,000 लोग काम करते हैं. वर्ष 1974 में भारत पर परमाणु परिक्षण की वजह से प्रतिबंध लगने के बावजूद इसरो ने बिना किसी बाहरी मदद के ये तकनीकें विकसित की.

पीएसएलवी
भारत उन गिने चुने देशों में है जिसके पास इतनी तादाद में उपग्रह हैं

इन्हीं तकनीकों की मदद से भारत ये विश्व कीर्तिमान बनाने में कामयाब रहा.

भारत के पास 11 दूर-संचार उपग्रह हैं जो पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं. एशिया प्रशांत क्षेत्र में किसी देश के पास इतने दूर-संचार उपग्रह नहीं हैं.

भारत उन गिने चुने देशों में है जिसके पास इतनी तादाद में उपग्रह हैं.

इसरो का कहना है कि उसका व्यापार सबसे ज़्यादा म़नाफ़े वाला है क्योंकि हर एक डॉलर के निवेश पर इसरो को दो डॉलर वापस मिलते है.

जहाँ इसरो का बजट एक अरब डॉलर से भी कम है, अमरीका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा का बजट 17 अरब डॉलर से भी ज़्यादा है.

भारतीय उपग्रहों की क्षमता दुनिया भर में मशहूर है. आज की तारीख़ में भारत के बनाए औऱ प्रक्षेपण किये गए सबसे ज़्यादा सात उपग्रह कक्षा में हैं.

इन उपग्रहों की क्षमता इतनी ज़्यादा है कि वे आसमान से धरती पर एक मीटर ऊंचाई वाली किसी भी वस्तु को देख सकते हैं.

यानि अंतरिक्ष से धरती पर किसी जगह मार्च करती सेना की टुकड़ी को देखा जा सकता है और उनकी संख्या भी बताई जा सकती है.

रिमोट सेंसिंग तस्वीरों का एक-तिहाई विश्व बाज़ार पहले ही भारत के पास है.

पीएसएलवी से भेजे गए कार्टोसैट सिरीज़ उपग्रह से इससे भी साफ़ तस्वीरें उपलब्ध हो पाएँगी.

विश्व बाज़ार

दुनिया का उपग्रह बाज़ार 140 बिलियन डॉलर से भी बड़ा है. इस बाज़ार पर किसी तरह का प्रभाव डालने के लिए भारत को अभी थोड़ा इंतेज़ार करना पड़ेगा. भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष भेजने के लिए भारत का जीएसएलवी अंतरिक्ष यान अभी पूरी तरह तैयार नहीं हुआ है.

पीएसएलवी
रिमोट सेंसिंग तस्वीरों का एक-तिहाई विश्व बाज़ार पहले ही भारत के पास है

अमरीका, रूस, चीन, जापान औऱ फ़्रांस जैसे देशों की सूची में शामिल होने के लिए भारत को अभी काफ़ी इंतज़ार करना पड़ेगा. ये देश पहले ही अंतरिक्ष बाज़ार में अपनी पैंठ बना चुके हैं.

सोमवार को भारत ने 10 उपग्रह पीएसएलवी अंतरिक्ष यान से भेजे थे.

इसका वज़न करीब 230 टन यानि करीब 50 हाथी के आसपास था और उसकी ऊंचाई 12 मंज़िला इमारत जितनी थी.

इस प्रक्षेपण से भारत को पाँच लाख डॉलर की आमदनी हुई. पंद्रह मिनट की उड़ान के बाद प्रक्षेपण यान ने मैपिंग उपग्रह कार्टोसैट 2A को कक्षा में स्थापित किया.

एक मिनट बाद इंडियन मिन 1 नाम का एक प्रयोगात्मक रिमोट सेंसिंग उपग्रह कक्षा में स्थापित हुआ.

इसके बाद आठ छोटे-छोटे उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया गया. इन सभी का वज़न तीन से 16 किलो के बीच में था. इन्हें हर 20 सेकेंड के अंतर में कक्षा में स्थापित किया गया.

इन प्रयोगात्मक उपग्रहों को कनाडा, नीदरलैंड, जापान, डेनमार्क औऱ जर्मनी के विश्वविद्यालयों के छात्रों ने बनाया है. इन सभी छोटे प्रयोगात्मक उपग्रहों का कुल वज़न 50 किलो था.

प्रतियोगिता

भारत के लिए अगली बड़ी चुनौती चंद्रायान 1 का प्रक्षेपण होगा. भारत की चाँद तक पहुँचने की ये पहली कोशिश होगी.

इस पर 100 मिलियन डॉलर्स का खर्च आएगा. चंद्रायान का म़कसद चंद्रमा के धरातल की तस्वीरें लेना और वहाँ पानी की खोज करना है.

मज़े की बात ये है कि चंद्रायान अमरीका, ब्रिटेन और स्वीडन के उपकरणों को बिना किसी भाड़े के चाँद पर ले जाएगा.

इससे पहले जापान औऱ चीन ने चाँद पर भेजे अंतरिक्ष यान पर सिर्फ़ अपने उपकरण भेजे थे.

भारत वर्ष 2012 में चाँद पर रोबोट भेजने के योजना बना रहा है.

अगले कुछ वर्षों में इसरो चाँद पर मानव को भी भेजने की सोच रहा है.

इसरो अध्यक्ष डॉ. माधवन नायर ने मुझे बताया कि बीस वर्ष बाद जब अंतरिक्ष में सफ़र करना ऐसा हो जाएगा जैसा आज हवाई जहाज़ में सफ़र करना है. उस वक्त हम दूसरे देशों के अंतरिक्ष यान के टिकट लेना पसंद नहीं करेंगे.

(पल्लव बागला 'साइंस' मैगज़ीन के संवाददाता हैं औऱ एनडीटीवी के विज्ञान संपादक हैं)

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