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बुधवार, 10 जनवरी, 2007 को 02:19 GMT तक के समाचार
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चार उपग्रहों का एक साथ प्रक्षेपण
पीएसएलवी
पीएसएलवी की सफलता से भारत प्रक्षेपण तकनीक में काफी आगे निकल जाएगा
भारत के ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी-सी7) से पहली बार चार उपग्रहों को एक साथ प्रक्षेपित किया गया है. इनमें दो उपग्रह अर्जेंटीना और इंडोनेशिया के हैं.

सुबह लगभग साढ़े नौ बजे आँध्रप्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से 44.5 मीटर लंबे और 295 टन वजनी पीएसएलवी ने उड़ान भरी.

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान यानी इसरो के मुताबिक चार चरणों में चारों उपग्रहों को उनके कक्ष में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया गया.

पिछले साल दस जुलाई को भू-स्थैतिक प्रक्षेपण यान यानी जीएसएलवी का प्रक्षेपण विफल रहने के कारण पीएसएलवी की उड़ान पर सबकी निगाहें टिकी हुई थी.

 यह भारत के लिए गौरवशाली दिन है. चारों उपग्रहों को उनके कक्ष में स्थापित कर दिया गया है. हमारी टीम ने बेहतरीन काम किया है
इसरो अध्यक्ष माधवन नायर

पीएसएलवी के प्रक्षेपण के बाद इसरो के अध्यक्ष माधवन नायर ने कहा, "यह भारत के लिए गौरवशाली दिन है. चारों उपग्रहों को उनके कक्ष में स्थापित कर दिया गया है. हमारी टीम ने बेहतरीन काम किया है."

चार उपग्रहों में दो भारत के हैं और दो अन्य देशों के हैं. भारत ने स्वदेशी तकनीक से बने 680 किलो वजनी सुदूर संवेदी यानी रिमोट सेंसिंग उपग्रह कार्टोसैट-2 और 550 किलो वज़नी स्पेस कैप्सूल रिकवरी इक्विपमेंट यानी एसआरई को पीएसएलवी से प्रक्षेपित किया है.

इनके अलावा इंडोनेशियाई उपग्रह लपान-टुबसैट और अर्जेंटीना के पेहुएनसैट को भी अंतरिक्ष में स्थापित किया गया है.

पीएसएलवी की यह उड़ान कई मायनों में अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत के लिए अहम है. ख़ास कर एसआरई का प्रक्षेपण अपने आप में भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए पहला अनुभव है. इसे दो हफ़्तों के बाद सुरक्षित वापस उतार लेने की योजना है.

पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते ही भारी तापमान से बचाने के लिए इसरो ने पीएसएलवी पर स्वदेशी तकनीक से बने सिरामिक टाइल्स लगाए हैं.

प्रक्षेपण की पूर्ण सफलता का पता अगले 30 दिनों में लग पाएगा जब एसआरई की वापसी होगी.

अग़र योजना सफल रही तो रूस, अमरीका और चीन के बाद इस तरह के प्रक्षेपण यान विकसित करने वाला भारत दुनिया का चौथा देश बन जाएगा.

विशेषताएँ

कार्टोसैट-2 भारत के सुदूर संवेदी उपग्रहों की श्रेणी में 12 वीं कड़ी है. इससे मिलने वाली जानकारियों का उपयोग शहरी और ग्रामीण बुनियादी ढाँचे के विकास और प्रबंधन, भूमि सूचना प्रणाली और भौगोलिक सूचना प्रणाली में होगा.

वहीं एसआरई के ज़रिए उपग्रहों को वापस धरती पर उतारने और एक उपग्रह प्रक्षेपण यान का कई बार इस्तेमाल करने की तकनीक विकसित करने में मदद मिलेगी.

ग़ौरतलब है कि पिछले साल 10 जुलाई को संचार उपग्रह इनसैट-4 सी को ले जे रहे प्रक्षेपण यान जीएसएलवी में उड़ान के 17 वें सेकेंड में ही विस्फोट हो गया था.

इससे पहले इसरो से संचालित 11 प्रक्षेपण सफल रहे थे. स्वदेशी तकनीक से जीएसएलवी विकसित करने वाला भारत दुनिया का छठा देश है और इसके वाणिज्यिक इस्तेमाल को बढ़ाने की योजना है.

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