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पर्यावरण के अध्ययन के लिए ऑरा उपग्रह | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी अंतरिक्ष संस्था नासा ने पृथ्वी के पर्यावरण का हाल जानने के लिए अभी तक बना सबसे परिष्कृत उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा है. 'ऑरा' नामक यह उपग्रह पाँच साल तक अंतरिक्ष में रहकर पृथ्वी के वातावरण का अध्ययन करेगा. ये उपग्रह मौसम में होनेवाले परिवर्तन के अलावा ओज़ोन परत जैसी चीज़ों का अध्ययन करेगा. नासा ने इससे पहले 'टेरा' और 'ऐकुआ' नाम के दो सेटेलाइट लाँच कर चुकी है जो धरती और समुद्र का अध्ययन कर रहे हैं. ऑरा का प्रक्षेपण गुरूवार को कैलिफोर्निया की वेनडेनबर्ग एयर फोर्स बेस से हुआ. इसके पहले तकनीकी कारणों से चार बार इस उपग्रह का प्रक्षेपण टालना पड़ा था. औरा
नासा के मुताब़िक तीन टन वज़न वाल ऑरा उपग्रह वातावरण का अध्ययन करने के लिए बनाया गया अब तक का सबसे बेहतरीन उपग्रह है. यह वातावरण की स्ट्रेटोस्फ़ेयर और ट्रोपोस्फ़ेयर परतों को पार कर उस गैस की तह का अध्ययन करेगा जिसमें इंसान रहते हैं. इसके अलावा वह यह भी देखेगा कि ओज़ोन परत की मरम्मत करने के लिए लागू की गई अंतरराष्ट्रीय वातावरण संधि मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल काम कर रही है या नहीं. यह उपग्रह ख़ासतौर पर वातवरण और उसमें मौजूद गैसों, दूषित पदार्थों और रासायनिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करेगा. मौसम का बदलाव
ये उपग्रह वैज्ञानिकों को ये जानने में मदद करेगा कि पृथ्वी के मौसम में बदलाव का वातावरण पर क्या असर पड़ता है. गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर में औरा के प्रोजेक्ट मैनेजर, रिक पिकरिंग कहते हैं, "इससे ये जानने में मदद मिलेगी कि ओज़ोन की परत दुरूस्त हो रही है या नहीं. वातावरण में मौजूद गैसों में बदलाव का मौसम पर असर और हवा की शुद्धता की बेहतर भविष्याणी करने में ये ख़ासतौर पर सहायक होगी." पिछले साल ही वैज्ञानिकों ने पहला ऐसा सबूत दिया था कि दशकों से सीएफसी जैसे तत्वों से नष्ट हो रही ओज़ोन की परत अब ठीक हो रही है. लेकिन उसे पूरी तरह सही होने में 50 साल तक लग सकते हैं. फिर ग्लोबल वार्मिंग की वजह से इससे ज़्यादा समय भी लग सकता है. एरोसोल बीबीसी के विज्ञान संवाददाता का कहना है कि ऑरा से वैज्ञानिकों को इस बात का ठीक-ठीक पता चल सकता है कि वातावरण में एरोसोल नामक छोटे कणों की क्या भूमिका होती है. मौसम के बदलाव में एरोसोल की भूमिका भी अहम मानी जाती है. माना जाता है कि ये एरोसोल विकिरण को फैलाकर या सोखकर मौसम को गर्म या ठंडा करते हैं. इनके प्रभाव से बादलों पर भी असर पड़ता है. |
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