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कार्बन क्रेडिट बाज़ार में कई ख़ामियाँ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी की एक पड़ताल में दुनिया भर में हो रहे अरबों डॉलर के कार्बन क्रेडिट व्यापार में गंभीर ख़ामियों का पता चला है. कार्बन क्रेडिट के इस बाज़ार का संचालन संयुक्त राष्ट्र की एक योजना के तहत होता है जिसे क्लीन डवलपमेंट मैकेनिज़्म या सीडीएम कहा जाता है. इस पड़ताल से पता चलता है कि भारत में कई ऐसी कंपनियाँ हैं जो कार्बन क्रेडिट की सुविधा का लाभ उठा रही हैं जबकि उनका काम इसके बिना भी चल सकता था. क्लीन डेवलपमेंट मेकेनिज़्म या सीडीएम का आधार ये विचार है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कहीं भी कटौती की जाए, ये पूरी धरती पर ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों को कम करने में मददगार होगा. इसी विचार के अनुरूप विकसित देशों की कंपनियाँ विकासशील देशों की उन परियोजनाओं में कार्बन क्रेडिट ख़रीदती हैं जो कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने वाली परियोजनाएँ मानी जाती हैं. विकसित देशों की कंपनियाँ इस क्रेडिट को अपने लिए तय गए उत्सर्जन लक्ष्य को पूरा करने में इस्तेमाल करती हैं. सीडीएम के नाम पर हर साल अरबों डॉलर का लेनदेन होता है. एक अनुमान के अनुसार हर साल कार्बन क्रेडिट के व्यापार में क़रीब 10 अरब डॉलर ख़र्च होता है. विश्वसनीयता पर सवाल सवाल ये है कि क्या इस व्यवस्था के ज़रिए सचमुच में धरती को गर्म करने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में अतिरिक्त कमी आती है? इसी सवाल का जवाब जानने के लिए बीबीसी ने सीडीएम व्यवस्था में शामिल भारत की तीन कंपनियों की पड़ताल की. इनमें से दो परियोजनाओं से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि कार्बन क्रेडिट की व्यवस्था नहीं होने पर भी उनके यहाँ हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की कोशिशें होतीं. ये सीडीएम व्यवस्था के एक प्रमुख नियम का ख़ुल्मख़ुल्ला उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि कार्बन क्रेडिट की रकम सिर्फ़ उसी कंपनी को मिलनी चाहिए जो कि इसके बिना ग्रीन हाउस गैसों में कमी लाने की कोशिश नहीं कर पाते. दरअसल इनमें से एक कंपनी बासमती चावल की सबसे बड़ी निर्यातक कंपनी है, जहाँ डीज़ल जेनेरटर की जगह, बायोमास आधारित बिजली जेनेरेटर लगाए जा रहे हैं. इसके कारण कंपनी को सालाना तीन लाख डॉलर के बराबर कार्बन क्रेडिट पात्रता हासिल होती है. दूसरा उदाहरण एक रसायन कंपनी का है, जिसे हर साल पाँच करोड़ डॉलर का कार्बन क्रेडिट एक अत्यंत ज़हरीली गैस को समाप्त करने के लिए दिया जा रहा है. ये गैस रेफ़्रिजरेटर में प्रयुक्त गैसों के उत्पादन के दौरान बनती है. बीबीसी की पड़ताल में शामिल तीसरी कंपनी एक पनबिजली परियोजना से जुड़ी है. इस मामले में भी ये साबित करना मुश्किल है कि कार्बन क्रेडिट के बिना भी ये परियोजना पूरी हो पाती या नहीं. भारत में कार्बन क्रेडिट व्यवस्था से जुड़ी इन तीन परियोजनाओं की पड़ताल में सामने आए तथ्य पूरी सीडीएम व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए पर्याप्त हैं. |
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