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धनी और ग़रीब देशों में फिर खींचतान | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जलवायु परिवर्तन पर बैंकॉक में चल रहा सम्मेलन एक बार फिर धनी और विकासशील देशों के बीच खींचतान में बदलता दिख रहा है. एक ओर चीन ने कहा है कि औद्योगिक देशों को स्वीकार कर लेना चाहिए कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए वे ही ज़िम्मेदार रहे हैं. लेकिन दूसरी ओर यूरोपीय संघ ने कहा है कि विकासशील देशों को चाहिए कि वे धनी देशों को दोषी ठहराना छोड़कर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम करने के लिए प्रयास करना शुरु करें. उल्लेखनीय है कि बैंकॉक में जलवायु परिवर्तन पर कई देशों की सरकारों के संगठन की बैठक हो रही है. इस बैठक में 120 देशों के कोई 400 वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं. जयवायु परिवर्तन पर यह इस साल तीसरी बैठक है और इसमें एक प्रस्ताव के प्रारूप पर चर्चा चल रही है. संभावना है कि शुक्रवार तक रिपोर्ट को अंतिम रूप दे दिया जाएगा. नसीहत यूरोपीय संघ ने कहा है कि विकासशील देशों को पृथ्वी के बढ़ते तापमान के लिए विकसित देशों को दोष देना बंद कर देना चाहिए. संघ का सुझाव है कि विकासशील देशों को इसके बादले ग्लोबल वार्मिंग के ख़तरनाक प्रभाव को कम करने के लिए क़दम उठाने चाहिए. यूरोपीय संघ के नीतिगत मामलों के अधिकारी टॉम वैन आयरलैंड ने कहा, "जब हम भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे देशों से कोई वादा करने को कहते हैं तो यह स्पष्ट रहना चाहिए कि हम उनसे वह सब करने को नहीं कह रहे हैं जो धनी देश कर रहे हैं." उनका कहना था कि धनी देशों के लिए तो लक्ष्य निर्धारित किए जा रहे हैं. समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार यूरोपीय देशों से आए एक प्रतिनिधि ने कहा, "ब्राज़ील, भारत और चीन हर बैठक में चाहते हैं कि ग्रीन हाउस गैसों के लिए इतिहास में जाकर धनी देशों को दोषी ठहरा दिया जाए और कार्बन गैसों के अपने उत्सर्जन के अपने आपको बचा लें." विकासशीलों की चिंता उधर विकासशील देशों की चिंता है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा असर उस पर पड़ेगा.
चीन ने तो साफ़ कहा है कि अमीर देशों को चाहिए कि वे स्वीकार कर लें कि उन्होंने जो ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन किया है उसके चलते ही जलवायु परिवर्तन हुआ है. इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) में रखे गए अपने प्रस्ताव में चीन ने कहा है कि धनी देशों ने ग्लोबल वार्मिंग में जो योगदान दिया है उसका उल्लेख रिपोर्ट में होना चाहिए. चीन ने कहा है, "1950 से पहले अमीर देश 95 प्रतिशत ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार थे, जबकि 1950 से 2000 के बीच वे 77 प्रतिशत गैसों का उत्सर्जन कर रहे थे." विकासशील देशों ने कहा है कि कई देश बिना किसी कारण के ग्लोबल वार्मिंग का शिकार हो रहे हैं. लीबिया के प्रतिनिधि युनूस अल-फ़ेनाडी ने कहा, "अफ़्रीका कार्बनडाय ऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं कर रहा है लेकिन वह जलवायु परिवर्तन का शिकार है." पुराना विवाद हालांकि विकासशील और विकसित देशों का यह विवाद पुराना है और जलवायु परिवर्तन की हर बैठक में उठता रहा है. अमरीका और ऑस्ट्रेलिया ने संयुक्त राष्ट्र के क्योतो प्रोटोकॉल पर सिर्फ़ इसीलिए हस्ताक्षर नहीं किए हैं क्योंकि वे इस बात का विरोध कर रहे हैं कि इसमें भारत और चीन के लिए कार्बन गैस उत्सर्जन का कोई लक्ष्य निर्धारित नहीं किया गया है. और यह भी एक तथ्य है कि इस समय कार्बन गैसों के उत्सर्जन में चीन का नंबर अमरीका के बाद दूसरा है. अभी जब बैंकॉक की बैठक में ग्लोबन वार्मिंग कम करने के लिए तकनीक और खर्च पर चर्चा चल रही है तो यह विवाद एक बार फिर सतह पर आ गया है. |
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