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जलवायु परिवर्तन के 'गंभीर परिणाम' होंगे | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण केवल अफ्रीका में ही 18 करोड़ 40 लाख लोग इस सदी के अंत तक मर सकते हैं. क्रिस्चियन एड चैरिटी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अफ्रीका में बाढ़,सूखा, अकाल और संघर्ष बढ़ रहे हैं जो लोगों के मौत का कारण बन सकती है. रिपोर्ट के अनुसार अमीर देशों को ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्त्रोत मसलन सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को न केवल बढ़ावा देना चाहिए बल्कि ग़रीब देशों को मदद भी करनी चाहिए. चैरिटी का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को नकारा नहीं जा सकता और ये बदलाव अनिवार्य है. इस रिपोर्ट के लेखन जॉन मैक्घी कहते हैं सिर्फ 50 अरब डॉलर के खर्च से अफ्रीका के कई देशों में पूरी तरह सौर ऊर्जा से काम लिया जा सकता है. क्योटो प्रोटोकॉल हांलाकि इस तरह के सुझावों की कई लोग आलोचना भी कर रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि विकासशील देशों को अपनी उन्नति के लिए काम करना चाहिए चाहे इसके लिए जिस किसी तरह के ऊर्जा का इस्तेमाल करना पड़े. वैज्ञानिक की राय भी पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान के प्रभाव को लेकर बंटी हुई है.. हाल के आकड़ों के अनुसार 2100 तक पृथ्वी का तापमान तीन डिग्री बढ़ जाएगा. क्रिस्चियन एड का कहना है कि अफ़्रीका के देशों में पहले से ही अकाल और सूखे की समस्या है. वहां मलेरिया जैसी बीमारियां अभी भी हैं और ये भारी पैमाने पर लोगों की मौत का कारण बन सकती है. हवा में कार्बन डाई ऑक्साइड की बढ़ती मात्रा को पृथ्वी के बढ़ते तापमान का एक कारण माना जाता है. क्योटो प्रोटोकॉल में इसकी मात्रा में कटौती की बात है लेकिन इसे अमरीका समेत कई विकासशील देशों ने स्वीकार नहीं किया है. क्रिस्चियन एड का कहना है कि विकसित देशों को कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन 2050 तक दो तिहाई कम करना चाहिए. |
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