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ग़रीब देशों का गैसों के उत्सर्जन में कमी पर ज़ोर
संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी मानते हैं कि अनेक ग़रीब देशों ने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि अभी प्रभावी नहीं हो पायी है. ये बात संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण परिवर्तन पर आयोजित सम्मेलन की कार्यकारी सचिव जोक वेलेर- हंटर ने कहीं. क्योतो संधि पर हस्ताक्षर करनेवाले देशों का सम्मेलन एक से 12 दिसंबर तक इटली के मिलान शहर में हो रहा है जहाँ पर पर्यावरण परिवर्तन के संबंध में अब तक उठाए गए क़दमों की समीक्षा की जाएगी. क्योतो संधि उस समय प्रभावी हो जाएगी जब इस पर हस्ताक्षर करने वाले 55 इसकी पुष्टि कर देंगे. संयुक्त राष्ट्र अधिकारी ने बीबीसी को बताया,"अब तक 119 देशों ने इस संधि की पुष्टि कर दी है और मेरा मानना है कि वे इस पर अमल करने के लिए क़दम उठाएँगे." क्योतो संधि सन 2001 में मोरक्को में बातचीत के लंबे दौर के बाद मौसम परिवर्तन और धरती के बढ़ते तापमान पर क्योतो संधि को लागू करने पर सहमति हो गई थी.
क्योतो संधि में 40 औद्योगिक देशों पर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए कहा गया है. ग्रीन हाउस गैसों में ख़ासतौर से कार्बन डाइऑक्साइड को वैज्ञानिक धरती के बढ़ते तापमान के लिए मुख्य रूप से ज़िम्मेदार मानते हैं. इस संधि में कहा गया है कि हर देश सन् 2012 तक उत्सर्जन का स्तर 1990 के स्तर से 5.2% तक घटाएगा. लेकिन दुनिया में ग्रीन हाउस गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक अमेरिका इस संधि को मानने से इनकार करता आया है. |
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