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मानव गतिविधियों से भारी नुक़सान
कूड़े-कचरे से पर्यावरण को भारी नुक़सान
ग़रीब देशों का आर्थिक और सामाजिक विकास प्रभावित हो रहा है
पिचानवे देशों के वैज्ञानिकों ने वर्षों के अध्ययन के बाद एक रिपोर्ट तैयार की है जिसमें कहा गया है कि दुनिया में बढ़ रहीं मानवीय गतिविधियों से ख़ासतौर से ग़रीब देशों के आर्थिक और सामाजिक विकास पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में जंगल विलुप्त हो रहे हैं और जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ रहे तापमान और प्रदूषण से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है जिससे विकास प्रभावित हो रहा है.

इस अध्ययन को संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफ़ी अन्नान ने चार साल पहले शुरू किया था जिसे मिलेनियम ईको सिस्टम एसेसमेंट नाम दिया गया था.

यह रिपोर्ट तैयार करने में 95 देशों के तेरह सौ से ज़्यादा शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया. यह अभी तक का पहला ऐसा इतना बड़ा मौक़ा है जिसमें इतनी बड़ी संख्या में पर्यावरण वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया हो.

इस दल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मानवीय गतिविधियों ने प्रकृति की दुनिया को ऐसा नुक़सान पहुँचाया है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती.

लंदन की रॉयल सोसायटी में मिलेनियम ईको सिस्टम एसेसमेंट के निदेशक डॉक्टर वॉल्टर रीड कहते हैं, "निश्चित रूप से, यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर हमें चौकन्ना होने की ज़रूरत है."

"रिपोर्ट का लब्बोलबाव ये है कि जिन प्राकृतिक संसाधनों पर हम निर्भर हैं उनमें साठ प्रतिशत का क्षरण हो चुका है और यह एक चिंताजनक बात है. उससे भी ज़्यादा चिंता की बात ये है कि जिन कारणों की वजह से यह क्षरण हो रहा है वे लगातार बढ़ ही रहे हैं."

पानी की कमी

रिपोर्ट के अनुसार खेतीबाड़ी के लिए ज़मीन का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है जिससे पानी की आपूर्ति कम हो रही है और इन परिवर्तनों से इस सहस्राब्दि के विकास लक्ष्यों को हासिल करने में मुश्किल होगी.

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ऊँची-ऊँची इमारतों की क़ीमत पर...

इन लक्ष्यों में एक यह भी है कि वर्ष 2015 तक दुनिया में सभी को खाना-पानी मिल सके. रिपोर्ट में यह भी दिखाने की कोशिश की गई है कि मानवीय गतिविधियों की क्या क़ीमत आर्थिक विकास को चुकानी पड़ रही है.

रिपोर्ट कहती है कि खेतीबाड़ी से ग्रीन हाउस प्रभाव वाली गैसें का रिसाव बढ़ रहा है, जल प्रदूषण भी बढ़ रहा है और भू क्षरण हो रहा है.

रिपोर्ट के अनुसार कहती है कि पृथ्वी हर साल खरबों रुपए के बराबर संपदा मानव को देती है जिनमें ताज़ा पानी, शुद्ध हवा, अनाज और मछलियाँ वग़ैरा शामिल हैं लेकिन मानवीय गतिविधियों की वजह से इस संपदा का क़रीब दो तिहाई हिस्सा बर्बाद हो गया है जिसमें तराई वाली भूमि, वन, घास वाली ज़मीन और समुद्री संपदा शामिल हैं.

रिपोर्ट के लेखकों का कहना है कि मानव जो कुछ कर रहा है उसे आर्थिक पागलपन की संज्ञा दी जा सकती है और उन्होंने चेतावनी दी है कि इसका सबसे ज़्यादा बुरा असर ग़रीब देशों पर पड़ेगा.

संवाददाताओं का कहना है कि इस रिपोर्ट से समस्याओं का कोई समाधान तो सामने नहीं आने वाला है लेकिन समस्याओं की गंभीरता का अहसास ज़रूर होता है.

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