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12 हज़ार प्रजातियों पर ख़तरा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रकृति में प्रजातियों के संरक्षण के लिए काम करनेवाले एक संगठन ने दुनिया में जानवरों और पौधों की ऐसी 12 हज़ार प्रजातियों की सूची जारी की है जिनके लुप्त हो जाने का ख़तरा है. इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर द कंज़र्वेशन ऑफ़ नेचर(आइयूसीएन) नामक यह संस्था हर साल ऐसी सूची जारी करती है. स्विट्ज़रलैंड स्थित संस्था ने इस वर्ष की सूची में 2000 और प्रजातियों को इसमें शामिल कर लिया है. इसमें ये बताया गया है कि कुछ द्वीपों पर सारा पर्यावरण ही ख़तरे में है. विशेष रूप से उन द्वीपों के पौधों और जंतुओं पर ख़तरा ज़्यादा है जो बिल्कुल निर्जन हैं. वहीं बंदरों की कुछ प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर आ गई हैं. सूची इस वर्ष की सूची में कहा गया है कि हवाई, सेशेल्स, त्रिस्तां द कुन्हा और फ़ाकलैंड द्वीपों पर ऐसा हो रहा है. हवाई द्वीप पर पौधों की 125 प्रजातियाँ ख़तरे में हैं.
एशेंसन नाम के द्वीप पर पौधों की चार प्रजातियाँ पाई जाती थीं जो लुप्त हो चुकी हैं. इन छोटे द्वीपों के अलावा भी कई ऐसे जानवर हैं जिनपर ख़तरा पिछले साल के मुक़ाबले इस साल बढ़ गया है. बंदर इनमें प्रमुख हैं. दक्षिण अमरीका में बंदरों की दो प्रजातियों को 'ख़तरे' से 'बहुत ज़्यादा' ख़तरे वाली श्रेणी में डाल दिया गया है. वहीं मेक्सिको के 'ब्लैक हाउलर' बंदर को 'कम चिंताजनक' श्रेणी से 'ख़तरनाक' श्रेणी में डाल दिया गया है. एशिया में मेकोंग बेसिन में मिलनेवाली दस फ़ीट तक की लंबाई वाली कैटफिश की स्थिति भी 'बहुत ज़्यादा ख़तरनाक' है. ख़तरे का कारण आइयूसीएन का कहना है कि सन् 1500 से लेकर अब तक पौधों और जानवरों की 762 प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं. संस्था के महानिदेशक अचिम स्टीनर कहते हैं,"अभी तो हमने सभी ज्ञात प्रजातियों में से केवल ऊपरी परत की पड़ताल की है मगर हमें विश्वास है कि 12,259 प्रजातियों की ये सूची इस बात का संकेत है कि दुनिया के विविध वातावरण में क्या हो रहा है". वे आगे बताते हैं,"ख़तरे का मुख्य कारण मानव की गतिविधियाँ हैं मगर मानव उन्हें बचाने में भी सहायता कर सकता है". संस्था का कहना है कि कुछ वन्य पौधे-प्राणी बाहरी प्रजातियों के हमले के कारण ग़ायब हो रहे हैं. इंडोनेशिया, भारत, ब्राज़ील, चीन और परू उन देशों में आते हैं जहाँ ऐसे पक्षियों और जानवरों की संख्या सबसे ज़्यादा है जिनके लुप्त होने का ख़तरा है. इसी तरह इक्वेडोर, मलेशिया, इंडोनेशिया, ब्राज़ील और श्रीलंका में पौधों की प्रजातियों की संख्या तेज़ी से कम होती जा रही है. |
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