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बुधवार, 16 फ़रवरी, 2005 को 03:54 GMT तक के समाचार
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लागू हो गई क्योटो संधि
अमरीका से संधि मानने का आग्रह
क्योटो संधि पर अमरीका के रूख़ का विरोध करने के लिए पर्यावरणवादी जमा हो रहे हैं
पृथ्वी के तापमान को कम करने के लिए सात साल पहले बनी क्योटो संधि बुधवार 16 फ़रवरी से लागू हो रही है.

क्योटो संधि पर 141 ऐसे देशों ने हस्ताक्षर किए हैं जो ग्रीन हाउस गैसों की क़रीब 55 प्रतिशत मात्रा के लिए ज़िम्मेदार हैं.

हालाँकि अमरीका और ऑस्ट्रेलिया ने इस संधि से ख़ुद को दूर रखा है और चीन और भारत भी इससे बाहर हैं.

इस संधि के तहत वायुमंडल को गर्म करनेवाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की व्यवस्था है.

तय ये हुआ है कि ये देश वर्ष 2012 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में 5.2 प्रतिशत की कमी करेंगे.

हर सदस्य देश अपने यहाँ के प्रदूषण के स्तर से ग्रीनहाउस गैसों की कटौती की अपनी सीमा निर्धारित करेंगे.

रूस ने इस संधि को गत वर्ष नवंबर में मंज़ूरी दी थी जिसे काफ़ी महत्वपूर्ण माना गया था.

जापान के प्रधानमंत्री यूनिशीरो कोईज़ूमी ने संधि का स्वागत किया है लेकिन साथ ही कहा है कि जिन देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं वे इस बारे में फिर से सोचें.

उन्होंने कहा, "आने वाले वक़्त में हम एक ऐसी व्यवस्था बनाएंगे जिसमें और ज़्यादा देश बढ़ते तापमान को रोकने के लिए एक साथ मिलकर काम करें "

समारोह

क्योटो संधि का नाम जापान के क्योटो शहर में 1997 में हुए समझौते के नाम पर पड़ा है और इस अवसर पर क्योटो में एक बड़े समारोह का आयोजन किया गया.

 कुछ देश क्योटो संधि का समर्थन केवल इसलिए नहीं करते क्योंकि वे अपनी अति उपभोक्तावादी जीवन संस्कृति को बदलना नहीं चाहते
वांगारी माथाइ

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और केन्या की उप पर्यावरण मंत्री वांगारी माथाइ भी वहाँ भाषण देंगी.

वांगारी माथाइ का कहना है,"कुछ देश क्योटो संधि का समर्थन केवल इसलिए नहीं करते क्योंकि वे अपनी अति उपभोक्तावादी जीवन संस्कृति को बदलना नहीं चाहते."

साथ ही पर्यावरणवादी पूरी दुनिया में विरोध की तैयारी कर रहे हैं जिसमें कई के निशाने पर अमरीका होगा जिसने कि इस संधि को मानने से इनकार कर दिया है.

मान्यता और विरोध

 इस संधि से बाहर रहनेवाले देशों का कहना है कि वे अपने हिसाब से उपाय करेंगे मगर मुझे संदेह है कि वे ऐसा कर सकेंगे
जापान के विदेश मंत्री

क्योटो संधि को रूस की स्वीकृति मिलने के बाद ही लागू किया जा सका है.

समझौते के अनुसार संधि लागू होने के लिए कम-से-कम 55 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करनेवाले देशों की स्वीकृति मिलनी आवश्यक थी और ये रूस की सहमति के बाद ही संभव हो पाया.

मगर अमरीका और ऑस्ट्रेलिया ने आर्थिक कारणों से क्योटो संधि को मान्यता नहीं दी है.

वहीं भारत और चीन जैसे विकासशील देश क्योटो संधि के कार्यक्षेत्र में नहीं आते हैं लेकिन जापान के विदेश मंत्री ने कहा है कि वे क्योटो संधि से बाहर रहनेवाले देशों से इसे मानने का आग्रह करते रहेंगे.

जापानी विदेश मंत्री नोबुताका माचिमुरा ने कहा,"इस संधि से बाहर रहनेवाले देशों का कहना है कि वे अपने हिसाब से उपाय करेंगे मगर मुझे संदेह है कि वे ऐसा कर सकेंगे".

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