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शनिवार, 18 दिसंबर, 2004 को 21:34 GMT तक के समाचार
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क्या है क्योटो संधि?
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दुनिया के भविष्य की चिंता में सामने आई क्योटो संधि
पर्यावरण के संबंध में 1992 में एक समझौते के तहत कुछ मानदंड निर्धारित किए गए थे जिनके आधार पर 1997 में क्योटो संधि हुई.

फिर इस संधि के प्रावधानों में कुछ फेरबदल करने के बाद इसे 2002 में जर्मनी में जलवायु पर हुई वार्ता के दौरान अंतिम रूप दिया गया.

इस संधि के तहत औद्योगिक देश ग्रीन हाउस समूह की गैसों से होने वाले प्रदूषण को ख़त्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

इसके अनुसार इन देशों को इन गैसों, विशेष तौर पर कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को अगले दस साल में पाँच प्रतिशत के स्तर से नीचे लाना है.

इन गैसों को जलवायु के परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है.

इस संधि के तहत क्या लक्ष्य रखे गए हैं?

क्योटो संधि के अनुसार उन सब देशों को इस संधि की पुष्टि करनी है जो धरती के वायुमंडल में

55 प्रतिशत कार्बनडाइऑक्साइड छोड़ते हैं. और उन्हें यह मात्रा सन 2008 से 2012 के बीच घटाकर पाँच प्रतिशत तक लानी है.

इस संधि पर हस्ताक्षर करने वाला हर देश अपने निजी लक्ष्य हासिल करने पर भी राज़ी हुआ है. यूरोपीय संघ के देश इन गैसों की मौजूदा मात्रा में आठ प्रतिशत और जापान पाँच प्रतिशत कमी लाने पर राज़ी हुआ है.

रूस शुरू में क्योटो संधि पर हस्ताक्षर करने में झिझक रहा था लेकिन अंतत: राष्ट्रपति पुतिन ने रूस को क्योटो संधि से जोड़ दिया.

रूस आख़िर इस संधि को मानने के लिए क्यों राज़ी हुआ है?

इस मामले में आर्थिक कम राजनीतिक फ़ायदा ज़्यादा नज़र आता है.

ऐसी बातें चलती रही हैं कि अगर रूस क्योटो संधि को मान लेता है तो विश्व स्वास्थ्य संगठन में उसके शामिल होने को यूरोपीय संघ का प्रबल समर्थन मिल सकता है.

लेकिन अब भी रूस में ऐसी चिंताएँ हैं कि क्योटो संधि मानने से रूस के आर्थिक हितों पर व्यापक असर पड़ सकता है.

क्या क्योटो संधि ठीक ठाक तरीक़े से लागू हो रही है?

रूस के इस पर हस्ताक्षर करने से पहले बहुत से देशों ने आशंका व्यक्त की थी कि यह संधि अब अपने आख़िरी दिनों में है.

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लेकिन रूस के इसमें शामिल हो जाने से इसमें नई जान सी आ गई है.

इस संधि के अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत मान्य होने के लिए यह ज़रूरी है कि इसे वे देश में मंज़ूरी दें जो 1990 के स्तर पर ग्रीन हाउस समूह की 55 प्रतिशत गैसों के रिसाव के लिए ज़िम्मेदार हों.

इस संधि को मार्च 2001 में उस समय भारी धक्का लगा था जब अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने घोषणा की कि वे कभी इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे.

जबकि अमरीका दुनिया भर में ग्रीन हाउस समूह की गैसों के एक चौथाई हिस्से के लिए ज़िम्मेदार है.

अमरीका ने अपना हाथ क्यों खींच लिया?

अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा था कि क्योटो संधि को मानना अमरीका की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत नुक़सानदेह है.

अमरीकी प्रशासन ने इस संधि को त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा था कि इसमें विकासशील देशों पर ग्रीन हाउस समूह की गैसों के निस्तारण में कमी के लिए कोई व्यवस्था नहीं है.

हालाँकि बुश ने यह ज़रूर कहा था कि वह इन गैसों की मात्रा को स्वैच्छिक कार्रवाई और नई तकनीक के ज़रिए कम करने के हिमायती हैं.

कब तक अमल होना है?

अगर 2008 में इस संधि को अमल में लाना है तो इस पर हस्ताक्षर करने वाले देशों और 39 औद्योगिक देशों को भी प्रदूषण करने वाली गैसों का स्तर कम करना होगा.

अमरीका 1990 तक इन गैसों से दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषण फैला रहा था और इन गैसों को पर्यावरण में छोड़ने में उसका लगभग 36 प्रतिशत हिस्सा था.

संशोधित क्योटो संधि के लिए यूरोपीय संघ को श्रेय दिया जाता है.

इसके तहत रूस जैसे देशों को कुछ रियायत दी गई क्योंकि उसके जंगल आदि कार्बन डाइऑक्साइड के असर को कुछ हद तक कम कर देते हैं.

लेकिन कई रियायतों के बाद भी अमरीका जैसे विकसित देश इसे स्वीकार करने को तैयार नही हैं.

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