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अमरीका नहीं मानेगा क्योटो संधि को | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका ने ग्लोबल वार्मिंग यानी दुनिया के बढ़ते तापमान पर नियंत्रण के लिए बनी अंतरराष्ट्रीय क्योटो संधि को मंज़ूरी देने की किसी भी संभावना से इनकार किया है. अमरीका ने अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में ग्लोबल वार्मिंग पर संयुक्त राष्ट्र के एक सम्मेलन में ये स्पष्ट किया. अमरीका के मुख्य वार्ताकार हार्लन वाटसन ने सम्मेलन में कहा कि ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण के लिए जो प्रबंध किए गए हैं वे ग़लत विज्ञान पर आधारित हैं. वार्ताकार ने कहा कि अमरीका क्योटो संधि की जगह राष्ट्रपति बुश की अपनी अलग योजना को को आगे लाना चाहता है जिसके तहत ऊर्जा की क्षमता को बढ़ाने का प्रस्ताव है. क्योटो संधि अगले दो महीनों में क़ानूनी तौर पर लागू होनेवाली है. यह संधि 1997 में जापान के शहर क्योटो में तैयार हुई थी. इस संधि में औद्योगिक देशों को अपने यहाँ से निकलनेवाले ग्रीनहाउस गैसों को अगले 10 वर्षों में 1990 के स्तर से 5.2 प्रतिशत नीचे ले जाने को कहा गया था. अमरीका की स्थिति अमरीका ने बिल क्लिंटन के राष्ट्रपति काल में क्योटो संधि पर दस्तख़ किए थे मगर जॉर्ज बुश ने इसे मंज़ूरी देने से मना कर दिया. अमरीका के इस रूख़ से यूरोप के देश और पर्यावरणवादी ख़ुश नहीं हैं. उनका कहना है कि अमरीका दुनिया में सबसे अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करता है और इस नाते उसे ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण के लिए और भी बहुत कुछ करना चाहिए. क्योटो संधि के तहत 55 औद्योगिक देश वर्ष 2012 तक कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों के वायुमंडल में निकासी को अच्छा-ख़ासा कम करेंगे. वहीं राष्ट्रपति बुश जिस योजना की बात कर रहे हैं उसके तहत 2012 तक अमरीका में उद्योग जगत में कार्बन के प्रभाव को 18 प्रतिशत कम करने की बात की गई है. |
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