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जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का एक सम्मेलन अर्जैंटीना में शुरु हुआ है. इस सम्मेलन में 189 देशों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं. इसका मकसद ग्रीन-हाउस गैसों के उत्सर्जन में क्योटो संधि से भी आगे जाकर कटौती करने के बारे में सहमति बनाना है. कई देशों ने तर्क दिए हैं कि सात साल के बाद क्योटो संधि के ख़त्म हो जाने के बाद और ज़्यादा कड़े कदम उठाए जाएँ. रूस की मंज़ूरी ये सम्मेलन रूसी संसद के निचले सदन दूमा में जलवायु परिवर्तन संबंधी क्योटो संधि को मंज़ूरी दिए जाने के एक महीने बाद हो रहा है. संधि से अमरीका के हटने के बाद रूस ही ऐसा देश था जिसकी सहमति से ये संधि लागू हो सकती थी. संधि को लागू करने के लिए ज़रूरी थी उन देशों की स्वीकृति जो विश्व स्तर पर ग्रीन-हाउस गैसों के 55 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेवार हैं. अब ये संधि, जिसकी दुनिया के 126 देश पहले ही पुष्टि कर चुके हैं, अगले साल फ़रवरी से लागू की जा सकेगी. अर्जैंटीना की समस्याएँ सम्मेलन के शुरुआत में ग्लोबल वॉर्मिंग यानि पृथ्वी का तापमान बढ़ने पर अर्जैंटीना की समिति के चेयरमैन ने देश पर हो रहे असर की विस्तृत जानकारी दी. पर्यावरण मंत्री जीजी गार्शिया ने 189 देशों के प्रतिनिधियों को बताया कि उनका देश भीषण तूफ़ान, कई इलाकों में भीषण बारिश और डैंगी बुखार जैसी बीमारियों में वृद्धि जैसी मुश्किलों को झेल रहा है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ग़रीब देशों को जलवायु परिवर्तन का सामना करने और इस पूरी प्रक्रिया को धीमा करने में मदद देने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. पर्यावरण में बदलाव होने से रोकने के पक्षधर ब्योनस एयरीस में 'नूह की कश्ती' का एक विशाल मॉडल बनाकर जलवायु परिवर्तन और पृथ्वी का तापमान बढ़ने की ओर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं. |
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