|
क्या हिम-युग लौट सकता है? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जलवायु परिवर्तन पर चल रही बहस में पृथ्वी का तापमान बढ़ने की चर्चा के बीच शायद ये सोचना मुश्किल है कि पृथ्वी फिर बर्फ़ की चादर में लिपट सकती है, यानि हिम-युग लौट सकता है. समुद्र तल से निकाले गए सूक्ष्म जीवाश्मों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी को लाखों साल तक प्रभावित करने वाले, बर्फ के बढ़ने और घटने के चक्र के बारे में काफ़ी कुछ जानना बाक़ी है पृथ्वी पर बर्फ के बढ़ने वाले समय को वैज्ञानिक 'ग्लेशियल्स' और गर्म मौसम की अवधि को 'इंटरग्लेशियल्स' कहते हैं. ऐसा समझा जाता रहा है कि 'इंटरग्लेशियल्स' का समय लगभग 11 हज़ार वर्ष तक रहता है और इस समय चल रहे 'इंटरग्लेशियल्स' के 11 हज़ार 500 वर्ष पूरे हो चुके हैं. इसका मतलब ये कभी भी ख़त्म हो सकता है. ये भी पता चला है कि पृथ्वी पर होने वाली घटनाएँ भी 'इंटरग्लेशियल्स' की अवधि को प्रभावित करती हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि वैसे तो ये समयावधि पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के प्राकृतिक चक्र के अनुसार ही निर्धारित होती है. गैसों का प्रभाव अब तक के आंकड़ों के मुताबिक वातावरण में छोड़ी जाने वाली कार्बन-डाइ-आक्साइड गैस की मात्रा इस समय अभूतपूर्व है. कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह वातावरण में छोड़े जाने वाली कार्बन-डाइ-आक्साइड गैस के कारण पृथ्वी पर बहुत से परिवर्तन हो रहे है और शायद ये ही हिम-युग की ओर ले जाएँ. ब्रिटेन के लीड्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर क्रोनिस त्ज़ेदाकिस का मानना है, "ऐसा संभव है कि वातावरण में छोड़ी जा रही ग्रीन-हाउस गैसों की वजह से भारी परिवर्तनों की शुरुआत हो." प्रोफेसर त्ज़ेदाकिस और उनके साथियों ने पुर्तगाल के समुद्र तट पर तागुस नदी के मुहाने के पास से जुटाए गए पेड़ो के पराग और जलीय जीवों के जीवाश्मों का अध्ययन किया, जिन्हें 'फोरामिनीफेरा' कहा जाता है. 'फोरामिनीफेरा' की रासायनिक संरचना में उतार चढ़ाव से लाखों वर्ष पूर्व, जब वो जीवित अवस्था में थे, तब उनके आस-पास की बर्फ का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. उधर समुद्र में नदियों के पानी द्वारा छोड़े गए पराग कणों से जंगलों के फैलाव का पता चलता है. जबकि जंगलों के फैलाव का सीधा संबंध वातावरण के गर्म या ठंड़े होने से जुड़ा होता है. एक ही जगह से जुटाए गए आंकड़ों से वैज्ञानिकों के सामने ज़मीन और समुद्र दोनों जगहों पर होने वाले परिवर्तनों की स्पष्ट तस्वीर सामने आ जाती है. शोध शोधकर्ताओं ने 1990 में एक लाख 32 हज़ार साल पहले शुरु हुए 'इंटरग्लेशियल्स' का अध्ययन किया था. इसलिए प्रोफेसर त्ज़ेदाकिस ने दो लाख चालीस हज़ार और तीन लाख चालीस हज़ार वर्ष पहले शुरु हुए 'इंटरग्लेशियल्स' का अध्ययन करना ठीक समझा. उन्हें उम्मीद थी कि 1990 के अध्ययनों जैसे परिणाम ही उनके अध्ययन में सामने आएंगें. तब सामने आया था कि 16 हज़ार साल तक उष्णावधि रही और बर्फ के कम होने व जंगलों के फैलने और फिर बर्फ के बढ़ने व जंगलों के कम होने के बीच 5000 साल का अंतराल रहा. लेकिन नए परिणामों में घटनाओं का चक्र बिल्कुल अलग था. प्रोफेसर त्ज़ेदाकिस का कहना था, "हमें देख कर हैरानी हुई कि स्थिति में बिल्कुल दोहराव नहीं आया." वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी के वातावरण में काम कर रहीं विभिन्न प्रक्रियाएँ, पृथ्वी के प्राकृतिक चक्र में अवरोध पैदा कर सकती हैं. इसी तरह की घटनाओं के चलते उनका मानना है कि इनके प्रभाव से एक और हिम-युग की धरती पर शुरुआत हो सकती है, बावजूद इसके कि धरती का तापमान इस समय बढ़ रहा है. अब वैज्ञानिकों की योजना अपनी जाँच के दायरे को बढ़ा कर एक और 'इंटरग्लेशियल्स' का अध्ययन करने की है जिसकी शुरुआत चार लाख साल पहले हुई थी. यह अध्ययन भविष्य में वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को अधिक सही तरीके से बता पाएगा क्योंकि इस समय धरती की कक्षा की स्थिति ठीक वैसी ही है जैसी चार लाख साल पहले थी. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||