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चीन बना सबसे बड़ा प्रदूषक देश | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका को भी पीछे छोड़ कर चीन दुनिया का सबसे बड़ा प्रदूषक देश बन गया है. ऐसा अगले महीने प्रकाशित होने वाली एक रिपोर्ट में कहा गया है. शोध से संकेत मिले हैं कि चीन में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को वास्तविकता से बहुत कम आंका गया था और चीन ने संभवत 2006-2007 में अमरीका को भी पीछे छोड़ दिया था. कैलीफ़ोर्निया विश्वविद्यालय की टीम अपने इस काम की रिपोर्ट एन्वायर्नमेंट इकॉनॉमिक्स एंड मैनेजमेंट की पत्रिका में प्रकाशित करवाएगी. उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर इन गैसों के उत्सर्जन में कमी नहीं लाई गई तो क्योटो प्रोटोकॉल के तहत अमीर देशों की इन गैसों की कटौती बेकार हो जाएगी. टीम का मानना है कि यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि चीन कब कार्बन डाइऑक्साइड का सबसे बड़ा उत्सर्जक बन गया क्योंकि यह निष्कर्ष 2004 के आंकड़ों के आधार पर निकाला गया है. इससे पहले यह माना जाता था कि अमरीका ही नंबर एक प्रदूषक देश है. प्रांतीय आंकड़े अगले महीने आने वाली कैलीफ़ोर्निया विश्वविद्यालय की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जब तक चीन अपनी ऊर्जा नीतियों में बदलाव नहीं करता ग्रीनहाउस गैसें कई गुना बढ़ती रहेंगी और ये बढ़ोत्तरी अमीर देशों में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में की जा रही कटौती से कहीं ज़्यादा है. शोधकर्ताओं का कहना है कि उनकी गणना चीनी जलवायु संरक्षण एजेंसी के प्रांतीय स्तर के आंकड़ों पर आधारित है.
उनका मानना है कि वर्तमान कंप्यूटर मॉडल चीन में हो रहे उत्सर्जन में भविष्य में होने वाली वृद्धि को वास्तविकता से कम आंक रहा है. इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर ऑफ़हैमर ने कहा, "हालाँकि हम इस मामले पर ब्रिटेन स्थित चीनी दूतावास से औपचारिक टिप्पणी का इंतज़ार कर रहे हैं लेकिन सभी जगह खुलकर प्रदर्शित किये जाने के बावजूद किसी ने नतीज़ों पर कोई गंभीर शिकायत नहीं की है." पर्यावरण बदलाव के बारे में चिंतित सभी देश इस पर एकमत हैं कि चीन में उत्सर्जन एक समस्या हैं. लेकिन चीन और बहुत से दूसरे विकासशील देश जो गरीबी के ख़ात्मे के लिए जूझ रहे हैं, इस पर अड़े हैं कि उत्सर्जन कम करने का कोई भी समझौता विकास दर के हिसाब से हो. चौंकाने वाले आंकड़े अगर यह मान लिया जाता है कि चीन में भविष्य में होने वाला उत्सर्जन अब तक आंकी गई मात्रा से कहीं ज़्यादा हो सकता है, तो भविष्य में होने वाले किसी भी वैश्विक समझौते में इस बात का ध्यान रखना होगा. यानी, यह अध्ययन चीन की प्रतिष्ठा के लिए अच्छा साबित नहीं हो रहा है वहीं यह सौदेबाज़ी की स्थिति में चीन के लिए बहुत अच्छा भी हो सकता है. चीन और संयुक्त राष्ट्र इस पर अड़े हैं कि ऐसे अमीर देश जहाँ प्रति व्यक्ति ज़्यादा प्रदूषण हैं, पहले अपने उत्सर्जन में कमी करें और स्वच्छ तकनीक में निवेश करने के लिए गरीब देशों की मदद करें. अमरीका में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन चीन से पाँच से छह गुना ज़्यादा है वह भी तब जबकि चीन सबसे बड़ी निर्माण अर्थव्यवस्था बन गया है. अमरीका का उत्सर्जन अब भी धीमे ही सही पर लगातार बढ़ रहा है. डॉ ऑफ़हैमर ने बीबीसी समाचार से कहा कि उनके काम ने यह अंदाज़ लगाया है कि चीन सरकार का ताज़ा आक्रामक ऊर्जा दक्षता कार्यक्रम बेकार हो जाएगा क्योंकि इससे पहले वाला कार्यक्रम भी बुरी तरह फ़ेल हो चुका है. उन्होंने कहा, "उत्सर्जन वृद्धि के हमारे आंकड़े सचमुच में चौंकाने वाले हैं. लेकिन इसके लिए चीन को ज़िम्मेदार ठहराने का कोई औचित्य नहीं है. वे लोगों को गरीबी से बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं और उन्हें मदद की ज़रूरत है." उनके अनुसार, "इसका उपाय सिर्फ़ यही है कि उन्हें पश्चिम से तकनीकी और धन उपलब्ध कराया जाए." |
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