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बुधवार, 12 मार्च, 2008 को 10:14 GMT तक के समाचार
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जलवायु परिवर्तन की मार पूरी दुनिया पर

जलवायु परिवर्तन
वातावरण में बढ़ते कार्बन उत्सर्जन को रोकना बेहद ज़रूरी है
वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल के वर्षों में जिस तेज़ी से दुनिया में जलवायु परिवर्तन हो रहा है उतनी तेज़ी से पिछले 10 हज़ार वर्षों में कभी नहीं हुआ.

वर्तमान में कार्बन उत्सर्जन की दर को देखते हुए वैज्ञानिकों ने अंदेशा जताया है कि वर्ष 2050 तक दुनिया का औसत तापमान दो डिग्री बढ़ जाएगा.

इस जलवायु परिवर्तन के कारण पानी की कमी होने से क़रीब तीन अरब लोग प्रभावित हो रहे हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन का यदि यही हाल रहा तो गर्मियों में उत्तरध्रुवीय सागर में हिम नहीं दिखेंगे.

वैज्ञानिकों का विचार है कि यदि वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को कम करने के लिए समय रहते कारगर क़दम नहीं उठाए गए तो समुद्र तल का स्तर बढ़ेगा, भयंकर आंधियों और तूफ़ान के साथ-साथ असहनीय गर्मी लोगों को झेलनी पड़ेगी.

पिघलते हिम

वैज्ञानिकों का कहना है कि इन आपदाओं में से कई सच्चाई बन कर हमारे सामने हैं.

दक्षिणी एशिया में पहले भीषण बाढ़ से लोगों का सामना बीस सालों में एक बार होता था लेकिन हाल के दशकों में पाँच सालों में लोगों को भीषण बाढ़ की तबाही झेलनी पड़ती है.

और ऐसा होने की वजहें हैं - समुद्र तल का लगातार उठता स्तर और हिमालय पर्वतों पर मौजूद पिघलते हुए हिम.

इसी तरह अफ़्रीका का सब सहारा क्षेत्र भी जलवायु परिवर्तन की मार बुरी तरह झेल रहा हैं. इस क्षेत्र में पानी की लगातार हो रही कमी की वजह से लोग लगातार अकाल जैसे हालात का सामना कर रहे हैं.

पहले से ही ग़रीब लोगों का जीना इससे और भी दूभर गया है.

जलवायु परिवर्तन की मार से यूरोप के देश भी बचे नहीं हैं. अब तक के मापे गए दस सबसे ज़्यादा गर्म वर्षों में से सारे के सारे वर्ष पिछले चौदह वर्षों के दौर में ही दर्ज किए गए हैं.

जलवायु परिवर्तन पर बनी अमरिकी नेता अल गोर की डॉक्यूमेंटरी 'एन इनकनवीनिएंट ट्रुथ' की चर्चा भले ही ख़ूब हुई हो लेकिन अमरीका में जलवायु परिवर्तन के कारणों की रोकथाम के लिए कोई कारगर क़दम नहीं उठाए गए.

उल्लेखनीय है कि हाल के वर्षों में अमरीका में भी लोगों को भीषण तूफ़ानों का सामना करना पड़ा है.

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