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बुधवार, 11 जनवरी, 2006 को 07:59 GMT तक के समाचार
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'पर्यावरण की रक्षा में निजी क्षेत्र प्रभावी'
सिडनी में जुटे प्रतिनिधि
सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले छह देश कोयले के बड़े उत्पादक और निर्यातक हैं
जलवायु परिवर्तन पर सिडनी में जारी बैठक में अमरीका ने कहा है कि निजी क्षेत्र सरकारों से अधिक सहायता कर सकते हैं.

बैठक के उदघाटन सत्र में अमरीका के ऊर्जा मंत्री सैमुएल बोडमैन ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने के लिए निजी क्षेत्रों की ओर से किए गए प्रयास किसी भी देश पर क्योटो संधि के प्रावधानों को लागू करने से अधिक प्रभावी हो सकते हैं.

उन्होंने कहा कि सरकार का काम ये है कि वह निजी कंपनियों को ऐसी तकनीकों को हासिल करने के क्षेत्र में सहायता करे जिनसे कि पर्यावरण को नुक़सान ना होता हो.

आलोचकों का मत है कि ये बैठक क्योटो संधि जैसे समझौतों पर हस्ताक्षर करने से बचने का रास्ता तलाश करने की कोशिश है जिनमें कि लक्ष्यों को तय किया जाता है.

बैठक में अमरीका के अलावा एशिया-प्रशांत गुट के पाँच देश - भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया हिस्सा ले रहे हैं.

बैठक का उद्देश्य ऐसी तकनीकों को प्रोत्साहन देना है जिससे कार्बन उत्सर्जन कम हो और आर्थिक विकास भी न रुके.

एशिया-प्रशांत देशों की साझेदारी नाम के इस संगठन के बारे में जुलाई में घोषणा की गई थी लेकिन इन छह देशों के मंत्री पहली बार मिल रहे हैं.

ये एक स्वैच्छिक संगठन है जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई बाध्यताएँ नहीं है जैसे की क्योटो संधि में है.

क्योटो संधि

ऑस्ट्रेलिया और अमरीका दोनों ही क्योटो संधि से अपने आप को अलग कर चुके हैं. इन देशों का कहना है कि 1997 में हुई क्योटो संधि के समझौतों से उनकी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा.

भारत, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे विकासशील देश भी उत्सर्जन कम करने के लिए बाध्यताओं के ख़िलाफ़ हैं जबकि जापान क्योटो संधि के प्रति वचनबद्ध है लेकिन वो एशिया-प्रशांत गुट से भी जुड़ा हुआ है.

पर्यावरणवादियों का कहना है कि सिडनी में हो रही इस बैठक से कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होगा.

एक स्वंय सेवी संगठन और क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क ऑस्ट्रेलिया ने कहा है कि इस तरह के समझौते पहले भी हुए हैं लेकिन इनसे कुछ ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा.

सिडनी में वैज्ञानिक बेन मैक्नील का कहना है कि सिडनी में हो रही बातचीत में विकसित और विकासशील देशों के बीच तकनीक के लेन देन की बात तो शामिल है. लेकिन अगर मौसम बदलाव पर कुछ करना है तो इन देशों को घरेलू स्तर पर क़दम उठाने होंगे.

सम्मलेन में ऊर्जा विभाग से सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि भी शामिल हो रहे हैं.

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