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शुक्रवार, 18 फ़रवरी, 2005 को 03:43 GMT तक के समाचार
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धुएँ ने ही बढ़ाया पृथ्वी का तापमान
औद्योगिक इकाइयों से निकलता धुआँ
वैज्ञानिकों का कहना है कि ईंधन के जलाने से ही तापमान बढ़ रहा है
अमरीका में वैज्ञानिकों के एक दल ने कहा है कि ग्लोबल वार्मिंग यानी पृथ्वी का लगातार बढ़ता तापमान एक सच्चाई है और इसके लिए मानव ही ज़िम्मेदार हैं.

वैज्ञानिकों ने अपने आंकड़ों के आधार पर कहा है कि पिछले चालीस सालों में महासागरों का जो तापमान बढ़ा है इसे औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाली कार्बनडाय ऑक्साइड गैस से जोड़ा जा सकता है.

वैज्ञानिक कह रहे हैं कि ग्लोबल वार्मिंग का असर अगले एक दशक में पानी की आपूर्ति पर गंभीर रुप से दिखाई पड़ेगा.

इससे पहले ये बहस चलती रही है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह सौर गतिविधियाँ हैं, ज्वालामुखीय गतिविधियाँ या फिर मनुष्यों द्वारा प्राकृतिक स्रोतों से निकाली जा रहे ईंधन सामग्रियों का उपयोग.

पानी का संकट

वांशिगटन डीसी में अमरीकन एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ़ साइंस के एक सम्मेलन में ये आंकड़े जारी किए गए हैं.

महासागर
महासागरों का तापमान बढ़ने से वैज्ञानिक ज़्यादा चिंतित हैं

कैलिफ़ोर्निया के मौसम विज्ञानी टिम बार्नेट कहते हैं, "ग्लोबल वार्मिंग पर ये अब तक के सबसे अकाट्य आंकड़े हैं.इसके आधार पर हम अपनी पिछली ग़लतियों को देख सकते हैं और भविष्य में इसको सुधारने की कोशिश कर सकते हैं."

वे बताते हैं कि इस शोध के लिए कई तरह के विकल्पों के साथ काम किया गया लेकिन आख़िरकार पता चला कि ग्रीनहाउस गैसें ही इसके लिए ज़िम्मेदार हैं.

वैज्ञानिक मानते हैं कि इसका सीधा असर पानी की क्षेत्रीय आपूर्ति पर पड़ेगा और नतीजतन अगले बीस वर्षों में पानी की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है.

बुश की यात्रा

ग्लोबल वार्मिंग पर यह रिपोर्ट ऐसे समय पर आई है जब अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश यूरोप की यात्रा पर जाने वाले हैं.

क्योटो के समर्थन में लगा एक पोस्टर
अमरीका पर क्योटो संधि पर हस्ताक्षर करने का दबाव भी है

अगले हफ़्ते होने वाली उनकी यात्रा में यह मुद्दा उठ सकता है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे पर यूरोपीय नेताओं के साथ जॉर्ज बुश की असहमति रही है.

दो दिन पहले जो क्योटो संधि लागू हुई उसमें ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने की बात है लेकिन अमरीका ने इस संधि पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया है.

अमरीका का कहना है कि इस संधि पर हस्ताक्षर करने से उनके देश में लाखों नौकरियाँ चली जाएँगी और अरबों डालर का नुक़सान होगा.

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