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क्योटो संधि के लक्ष्यों से यूरोप पीछे | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक नई रिपोर्ट के अनुसार यूरोप के अधिकतर देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण के लिए क्योटो संधि में तय किए गए मानदंड को पूरा नहीं कर सकेंगे. ब्रिटेन की एक संस्था इंस्टीच्यूट फ़ॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर इस दिशा में तत्काल क़दम नहीं उठाया गया तो यूरोपीय संघ के 15 में से 10 देश लक्ष्य से पीछे रहे जाएँगे. रिपोर्ट के अनुसार केवल ब्रिटेन ही एक ऐसा यूरोपीय देश है जिसने कार्बन डाइऑक्साइड और प्रदूषण फैलानेवाली दूसरी गैसों को नियंत्रित करने के बारे में किए गए वादे का सम्मान कर रहा है. रिपोर्ट जारी करनेवाली संस्था के सहायक निदेशक टोनी ग्रेलिंग का कहना है कि समय धीरे-धीरे कम होता जा रहा है और जल्दी कुछ नहीं किया गया तो मामला हाथ से निकल सकता है. उन्होंने कहा,"नए वर्ष में यूरोपीय देशों को बिजलीघरों और भारी उद्योगों से निकलनेवाली गैसों को सीमित करने के बारे में सख़्त उपाय करने चाहिए". स्थिति क्योटो समझौते में यूरोपीय संघ ने 1999 में पर्यावरण में मौजूद ग्रीन हाउस गैसों के स्तर में आठ प्रतिशत कटौती करने की बात कही थी. इस लक्ष्य को वर्ष 2008 से 2012 के बीच पूरा किया जाना था और ये ज़िम्मेदारी पूरे यूरोपीय संघ को मिलकर उठानी थी. मगर ब्रिटेन और जर्मनी जैसे अमीर देशों ने अन्य देशों से अधिक कटौती की बात कही थी ताकि ग्रीस और पुर्तगाल जैसे कम औद्योगिक देशों पर अधिक भार ना पड़े. लेकिन अब जो रिपोर्ट सामने आई है उससे ये लग रहा है कि ब्रिटेन के अलावा केवल स्वीडन ही वह देश है जो लक्ष्य की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं. यूरोपीय संघ क्योटो संधि का सबसे बड़े हिमायती रहा है और अगर वह इस समझौते पर खरा नहीं उतरता तो उसके लिए ये एक शर्मनाक बात होगी. वैसे आलोचकों के अनुसार क्योटो संधि के प्रति निष्ठा में कमी का एक बड़ा कारण ये है कि अमरीका समझौते पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया है. उसका कहना है कि इससे उसका आर्थिक विकास रुकेगा. इसके अलावा चीन और भारत जैसे विकासशील देशों को क्योटो समझौते पर हस्ताक्षर करने से छूट दे दी गई थी. |
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