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माँ का अपनी बेटी को अनमोल उपहार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं उस बच्चे को अपनी संतान कहूँगी या अपना नाती". यह दुविधा है कनाडा की एक माँ की जिन्होंने अपनी सात साल की बेटी को भविष्य में माँ का दर्जा दिलाने के लिए अपने अंडाणु को फ़्रीज़ कराने का इरादा किया है. यह सात साल की बच्ची फ़्लेवी बोइविन एक बीमारी की वजह से बड़ी हो कर शिशु को जन्म नहीं दे पाएगी. उसकी माँ को और कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने अपनी बेटी को अपने अंडाणु दान देना तय किया. उनका कहना है कि बड़ी हो कर फ़्लेवी को तय करना होगा कि वह उनका इस्तेमाल करे या न करे. इस क़दम के बारे में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं. कुछ लोगों का मानना है कि यह एक चिंता का विषय है तो मोंट्रियल के मैकगिल रिप्रोडक्टिव सेंटर के डॉक्टर इसे माँ के प्यार की एक मिसाल बता रहे हैं. समय रहते ही... फ़्लेवी की माँ मेलानी की उम्र 35 वर्ष है और वह एक वकील हैं. उन्होंने जब अंडाणु दान देने का इरादा किया तो वह मैकगिल सेंटर की टीम से मिलीं जो कैंसर के मरीज़ों के अंडाणु फ़्रीज़ करने का काम करते हैं. मेलानी का कहना है कि उन्होंने अपने फ़ैसले के बारे में फ़्लेवी के पिता से भी बात की. वह कहती हैं, "हम कुछ नैतिक सवालों को लेकर चिंतित थे. क्या मैं उस बच्चे को अपनी संतान मानूँगी या नाती? हमें इस पर होने वाले ख़र्च, मेरी शारीरिक स्थिति और परिवार पर पड़ने वाले भावनात्मक प्रभाव को लेकर भी चिंता थी". एक साल के सोच-विचार के बाद उन्होंने पक्का इरादा कर लिया. मेलानी कहती हैं, "मैंने सोचा मुझे हर हाल में अपनी बेटी की मदद करनी है. और यह समय रहते ही हो सकता है क्योंकि अभी मेरी उम्र में यह संभव है". गुर्दादान जैसा ही... "फिर मैंने यह भी सोचा कि अगर मुझे अपने शरीर का कोई और अंग दान में देना होता, जैसे गुर्दा, तो मैं बिना हिचक ऐसा करती. तो फिर यह क्यों नहीं"? मेलानी कहती हैं कि बच्चे की असली माँ फ़्लेवी ही होगी क्योंकि वही उसे पाल-पोस कर बड़ा करेगी. उनका कहना है, "मैं फ़्लेवी पर किसी तरह का दबाव नहीं डालूँगी. बस उसके सामने एक विकल्प रहेगा". प्रोफ़ेसर टैन का कहना है कि यह मामला एक स्वंतत्र नैतिकता समिति के सामने रखा गया और फिर यही तय हुआ कि यह माँ की ममता की एक मिसाल है. नैतिकता का मापदंड भी तो बदलते रहते हैं. क्या पता बीस साल के बाद क्या हो? हालाँकि रिप्रोडक्टिव एथिक्स की जोज़फ़ीन क्विंटावैल इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है, "इस मामले में बच्चे पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ सकता है. ऐसा बच्चा अपनी माँ का भाई या बहिन भी होगा और उसे अपनी पहचान को लेकर समस्याओं से जूझना पड़ सकता है". जोज़फ़ीन कहती हैं, "हम महिलाओं में प्रजनन शक्ति पर इतना ज़ोर क्यों देते हैं? उनकी बेटी बिना बच्चे को जन्म दिए भी एक भरीपूरी, खुशहाल ज़िंदगी गुज़ार सकती है". |
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