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जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य पर चिंता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत में जच्चा-बच्चा यानी माँ और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर ज़्यादा ध्यान नही दिए जाने पर चिंता जताई है. संगटन की रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में प्रसव के दौरान जटिलताओं के कारण हर मिनट में एक महिला की मौत होती है. विश्व स्वास्थ्य रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व में हर वर्ष पाँच लाख से भी अधिक महिलाओं की गर्भावस्था के दौरान या बच्चों को जन्म देते समय मौत हो जाती हैं. साथ ही हर साल पाँच वर्ष से कम उम्र के एक करोड़ 10 लाख बच्चों की मृत्यु उनको चिकित्सा सुविधाएँ नहीं मिलने की वजह से हो जाती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें से आधे से अधिक बच्चों की मौत भारत, पाकिस्तान, चीन, कांगो, इथोपिया और नाइजीरिया में होती है. धीमी प्रगति विश्व स्वास्थ्य संगठन की क्षेत्रीय उपनिदेशक पूनम खेत्रपाल सिंह ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि भारत 51 ऐसे देशों की सूची में शामिल है जहाँ माँ-बच्चे के स्वास्थ्य के क्षेत्र में धीमी प्रगति हुई है. उनका कहना था कि भारत में यह एक बड़ी समस्या है. यहाँ तक कि पंजाब जैसे संपन्न राज्यों में भी महिलाओं के स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता. रिपोर्ट में कहा गया है कि 10 राज्यों - असम, बिहार, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और राजस्थान में एक लाख में से 400 से अधिक महिलाओं की प्रसव के दौरान मौत हो जाती है. जबकि असम, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में एक लाख में से 700 से अधिक नवजात शिशुओं की मौत हो जाती है. रिपोर्ट कहती है कि नवजात शिशुओं पर ख़तरा सर्वाधिक है क्योंकि माँ और बच्चों के स्वास्थ्य के लिए जो योजनाएँ बनती हैं उनमें नवजात शिशुओं को भुला दिया जाता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि महत्वपूर्ण ये है कि कुछ सस्ते उपायों से ऐसी मौतों की संख्या अच्छी-ख़ासी कम की जा सकती है. |
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