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मलेरिया को लेकर वैज्ञानिकों की चेतावनी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर में मलेरिया के मामले विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों की तुलना में बहुत अधिक होते हैं. जैसा कि वे कह रहे हैं आंकड़ा डेढ़ गुना के क़रीब है और हर वर्ष कोई 50 करोड़ लोग मलेरिया से ग्रस्त हो जाते हैं. दुनिया भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों की एक टीम ने अपनी यह जानकारी नेचर पत्रिका में प्रकाशित की है. उनके अनुसार विश्व स्वास्थ्य संगठन(डब्लूएचओ) ने आंकड़े जुटाने के लिए अस्पताल से मिलने वाले आंकड़ों का इस्तेमाल किया है जबकि मलेरिया के बहुत से मरीज़ इलाज के लिए अस्पताल ही नहीं जाते. इन वैज्ञानिकों ने दक्षिण और दक्षिण पूर्वी एशिया में मलेरिया की स्थिति को लेकर विशेष रुप से चिंता जताई है. कीनिया, थाईलैंड और ब्रिटेन के विशेषज्ञों ने कहा है कि मलेरिया के सबसे घातक परजीवी प्लास्मोडियम फ़ाल्सिपेरम के प्रभाव को इस क्षेत्र में कम करके आंका गया है. इस टीम ने मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों का एक नक्शा भी बनाया है. वे कहते हैं कि इससे डब्लूएचओ को सहायता मिलेगी कि वह वर्ष 2010 तक मलेरिया से होने वाली मौतों को आधा कर सके. प्रोफ़ेसर बॉब स्नो नैरोबी के कीनियन मेडिकल रिसर्च सेंटर में कार्यरत हैं और इस रिपोर्ट के सहलेखक हैं. वे कहते हैं, "आंकड़ों का सही होना बहुत महत्वपूर्ण है." उनका कहना है कि यदि बीमारी के फ़ैलाव का पता न हो तो इससे निपटने के लिए आवश्यक पैसा जुटाने में भी कठिनाई हो सकती है ख़ासकर तब जब दवाएँ महंगी हों. उल्लेखनीय है कि डब्लूएचओ के आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष दुनिया में मलेरिया के 30 करोड़ मामले होते हैं जिसमें से 90 प्रतिशत अफ़्रीका में होते हैं. संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी का कहना है कि हर साल मलेरिया से 10 लाख लोगों की मौत हो जाती है. |
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