कोरोना का इलाज: डेक्सामैथासोन और दूसरी कारगर दवाइयां जिनसे मरीज़ हो रहे हैं ठीक

कोरोना वायरस

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, जेम्स गैलहर
    • पदनाम, स्वास्थ्य एवं विज्ञान संवाददाता

कोविड-19 संक्रमण की चपेट में आने वाले लोगों की संख्या तीन करोड़ 26 लाख से ज़्यादा हो चुकी है जबकि अब तक इसके संक्रमण के चलते अब तक नौ लाख 90 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है.

इस संक्रमण के संभावित इलाज तलाशने की दिशा में कई कोशिशें हो रही हैं. इन कोशिशों के ज़रिए कोविड-19 के इलाज की कुछ कारगर कोशिशें भी सामने आयी हैं.

भारत में भी बाबा रामादेव की पंतजलि समूह ने भी कोरोना का इलाज करने वाली दवा बनाने का दावा किया, इसको लेकर काफ़ी विवाद भी हुआ.

भारत के आयुष मंत्रालय को पंतजलि समूह के दावे का खंडन करना पड़ा जिसके बाद पंतजलि ने कहा कि उनकी कोरोनिल दवा इम्यूनिटी बूस्टर का काम करती है.

इलाज ढूंढ़ने में क्या क्या हुआ है?

वैसे अब तक दुनिया भर में 150 से ज़्यादा अलग-अलग दवाइयों को लेकर रिसर्च हो चुकी है. इनमें से ज़्यादातर दवाइयां पहले से ही प्रचलन में हैं और इन्हें कोविड-19 संक्रमित मरीज़ों के इलाज में आजमाकर देखा गया है.

- ब्रिटेन दुनिया का सबसे बड़ा क्लिनिकल ट्रायल चला रहा है, जिसे रिकवरी ट्रायल कहा जा रहा है. इसमें 12 हज़ार से ज़्यादा मरीजों को अब तक शामिल किया जा चुका है. इस ट्रायल में ही पहली बार पता चला कि डेक्सामैथासोन कोरोना संक्रमितों की जान बचा सकती है. इसके अलावा भी कौन सी दवा कारगर है या कौन सी दवा कारगर नहीं है, इसका पता भी इस ट्रायल में चला है.

- विश्व स्वास्थ्य संगठन भी सबसे कारगर इलाज के आकलन के लिए एक सॉलिडैरिटी ट्रायल चला रहा है.

- इसके अलावा दुनिया भर की कई फर्मास्युटिकल्स कंपनियां भी अपनी अपनी दवाईयों का ट्रायल कर रही हैं.

किस तरह की दवा काम कर सकती है?

अब तक तीन तरह की दवाओं आजमाया जा रहा है:

  • एंटीबॉडी ड्रग्स जो सीधे कोरोना वायरस के शरीर के अंदर रहने की क्षमता को प्रभावित करता है.
  • ऐसी दवाएँ जो प्रतिरोधक प्रणाली को शिथिल करती है. मरीज़ उस वक़्त गंभीर रूप से बीमार पड़ जाता है जब उसकी प्रतिरोधक प्रणाली ज्यादा काम करती है इससे शरीर को दोतरफ़ा नुकसान पहुँचता है.
  • ठीक हुए मरीज़ों के ख़ून से एंटीबॉडी तैयार करना या फिर लैब में तैयार एंटीबॉडी का इस्तेमाल करना जो वायरस पर हमला कर सकता है.

यह भी संभव है कि कोरोना के अलग अलग स्टेज में अलग अलग दवाईयां कारगर साबित हों. जैसे कि एंटी वायरल ड्रग्स बीमारी की शुरुआत में कारगर देखे गए हैं जबकि इम्यून ड्रग्स का फ़ायदा बाद के स्टेज दिखा है. विभिन्न थेरेपी का संयोजन भी कारगर हो सकता है, इसका आकलन भी किया जा रहा है.

जान बचाने वाली अब तक की इकलौती दवा

सस्ती और हर जगह मिलने वाली दवा डेक्सामैथासोन कोरोना वायरस से संक्रमित गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों की जान बचाने में मदद कर सकती है. कोविड-19 संक्रमितों को बचाने में मदद करने वाली पहली दवा साबित हुई है डेक्सोमेथासोन.

ब्रिटेन के रिकवरी ट्रायल के विशेषज्ञों का कहना है कि कम मात्रा में इस दवा का उपयोग कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक बड़ी कामयाबी की तरह सामने आया है.

जिन मरीज़ों को गंभीर रूप से बीमार पड़ने की वजह से वेंटिलेटर का सहारा लेना पड़ रहा है, उनके मरने का जोखिम क़रीब एक तिहाई इस दवा की वजह से कम हो जाता है. जिन्हें ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ रही है, उनमें पांचवें हिस्से के बराबर मरने का जोखिम कम हो जाता है.

इस दवा का इस्तेमाल पहले से ही सूजन को कम करने में किया जाता रहा है और अब ऐसा लगता है कि यह कोरोना वायरस से लड़ने में शरीर के प्रतिरक्षा प्रणाली को मदद पहुँचाने वाली है. जब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अधिक सक्रियता के साथ प्रतिक्रिया करती है तब वैसे हालात को साइटोकिन स्टॉर्म कहा जाता है यह जानलेवा हो सकता है.

इसलिए अब तक इसका इस्तेमाल अधिक जोख़िम स्थिति वाले मरीज़ों के लिए ही किया जा रहा है. माइल्ड लक्षण वाले संक्रमितों पर इसका असर नहीं दिखा है.

दूसरी कारगर दवाईयां

इसके अलावा इबोला के इलाज के लिए खोजी गई दवा रेमडेसिवीर के क्लीनिकल ट्रायल के नतीजे उत्साहवर्धक रहे हैं. अमरीकी नेतृत्व में इस दवा का क्लिनिकल ट्रायल दुनिया भर में एक हज़ार लोगों के बीच किया जा रहा है. इस ट्रायल के दौरान इस दवा के चलते कोरना के लक्षण 15 दिन के बदले 11 दिन तक देखे गए.

रेमडेसिवीर उन चार दवाओं में शामिल है जिनको लेकर सॉलडरिटी ट्रायल चल रहा है. इस दवा को बनाने वाली कंपनी गिलिएड इसके ट्रायल का आयोजन भी करा रही है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के डॉक्टर ब्रुस आइलवर्ड का कहना है कि चीन के दौरे बाद उन्होंने पाया कि रेमडेसिवीर एकमात्र ऐसी दवा है जो असरदायी नज़र आती है.

इबोला की दवा के तौर पर इसकी खोज की गई थी लेकिन यह जानवरों पर किए गए अध्ययन में दूसरे कई जानलेवा वायरस वाले बीमारियों में कारगर साबित हुआ है. मसलन मर्स और दूसरे सांस संबंधी बीमारियों में.

शिकागो यूनिवर्सिटी के नेतृत्व में हो रहे परीक्षणों के लीक सूचनाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह असरदायी है. लेकिन अब तक इस बात के स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं जिससे यह ज़ाहिर होता हो कि यह कोरोना वायरस से होने वाली मौत से बचाता है.

अब तक यह माना जा रहा है कि एंटी वायरल दवाएं कोरोना संक्रमण के शुरुआती दौर में कारगर हैं जबकि इम्यून बढ़ाने वाली दवाएं संक्रमण के दूसरे दौर में.

ब्रिटिश सरकार ने अपने नेशनल हेल्थ सिस्टम में इन दोनों दवाओं की खेप को रखने का निर्देश जारी किया हुआ है.

वहीं अमरीका ने रेमडेसिवीर की आने वाली पूरी सप्लाई को ख़रीद लिया है. अमरीकी सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने गिलिएड कंपनी के जुलाई महीने की आपूर्ति का सौ प्रतिशत, अगस्त और सितंबर महीने में 90-90 प्रतिशत आपूर्ति को ख़रीद लिया है, इसके ज़रिए अमरीका ने पांच करोड़ डोज की आपूर्ति सुनिश्चित कर लिया है.

गिलिएड ने इस दवा की अज्ञात मात्रा साउथ कोरिया को दान में उपलब्ध कराया है.

क्या एचआईवी की दवाएँ कोरोना वायरस के इलाज में काम कर रही हैं?

इसे लेकर बहुत बातें की जा रही हैं लेकिन इसका जवाब नहीं है.

इस बात के प्रमाण नहीं मिले हैं जिससे यह कहा जाए कि एचआईवी की दवा लोपीनावीर और रिटोनावीर कोरोना वायरस के इलाज में असरदायी साबित हुए हैं.

लैब में किए परीक्षण में ज़रूर इस बात के प्रमाण मिले हैं कि यह काम कर सकता है लेकिन लोगों के ऊपर किए गए अध्ययन में निराशा हाथ लगी है.

कोविड-19 के गंभीर मरीज़ों में इन दवाओं की वजह से कोई सुधार होता नज़र नहीं आया है.

हालांकि ये दवाएँ बहुत गंभीर मरीज़ों (इनमें एक चौथाई की मौत हो गई थी) पर इस्तेमाल की गई थीं. इससे इस बात की संभावना भी बनती है कि इसे देर से देने की वजह से यह संक्रमण पर काम नहीं कर सका.

क्या मलेरिया की दवा कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ असरदार है?

इसको लेकर भी काफ़ी चर्चा रही है, लेकिन इसका जवाब भी नहीं है.

मलेरिया की दवा सॉलिडैरिटी ट्रायल और रिकवरी ट्रायल दोनों ही प्रयासों का हिस्सा है.

क्लोरोक्वीन और उससे बने हाइड्रॉक्सी-क्लोरोक्विन में वायरस प्रतिरोधी और इंसानों की प्रतिरोधक प्रणाली को शिथिल करने के गुण मौजूद है.

यह दवा उस वक़्त बड़े पैमाने पर चर्चा में आई जब राष्ट्रपति ट्रंप ने कोरोना वायरस के इलाज में इसकी संभावनाओं की बात कही लेकिन अब तक इसके असरदार होने को लेकर बहुत कम प्रमाण मिले हैं.

हाइड्रॉक्सी-क्लोरोक्वीन का इस्तेमाल अर्थराइटीस में भी किया जाता है क्योंकि यह रोग-प्रतिरोधक क्षमता को नियमित करने में मदद कर सकता है. लेकिन आक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के रिकवरी ट्रायल से यह मालूम हुआ है कि हाइड्रॉक्सी क्लोरोक्विन कोविड-19 के इलाज में कोई मदद नहीं पहुंचाता है. इसके बाद इसे ट्रायल से बाहर कर दिया गया.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

क्या ठीक हुए मरीज़ों के ख़ून से कोरोना वायरस ठीक हो सकता है?

जो मरीज़ कोरोना वायरस के संक्रमण से ठीक हो गए हैं उनके शरीर में इसका एंटीबॉडी होना चाहिए जो वायरस के खिलाफ असरदायी हो सकता है.

इस इलाज के तहत ठीक हुए मरीज़ के ख़ून से प्लाज्मा (जिस हिस्से में एंटीबॉडी है) निकाल कर बीमार पड़े मरीज़ में डालते हैं.

अमरीका ने 500 लोगों को इस तरीक़े से अब ठीक किया है. इसे कॉनवैलेसेंट प्लाज्मा कहते हैं. दूसरे देश भी इस तरीके का इस्तेमाल कर रहे हैं.

यह तरीका दूसरी बीमारियों में तो कारगर साबित हुआ है, लेकिन कोरोना वायरस में इस तरीके से कामायबी नहीं मिली है.

कब तक हमारे पास इलाज होगा?

यह जानना अभी थोड़ी जल्दबाजी होगी कि दुनिया के पास कब तक कोरोना की दवा होगी. हालांकि अगले कुछ महीनों में हमारे पास ट्रायल के परिणाम आने शुरू हो जाएंगे.

इसके टीके (जिससे संक्रमण से बचा जाए ना कि होने के बाद जिससे इलाज हो) की बात करना अभी और जल्दबाजी होगी क्योंकि डॉक्टर अभी पहले से मौजूद दवाओं का ही परीक्षण कर रहे हैं कि उनका इस्तेमाल कितना सुरक्षित और असरदायी है.

टीका बनाने का काम तो शून्य से शुरू करना है. कुछ बिल्कुल नई दवाइयों का भी लैब में परीक्षण किया जा रहा है लेकिन अभी वो इंसानों पर इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं हैं.

हमें इलाज की ज़रूरत क्यों है?

इलाज से हम लोगों की जान बचा सकते हैं. इलाज मिलने के बाद लॉकडाउन के प्रावधानों को असानी से हटाना संभव होगा.

कारगर इलाज से कोरोना वायरस एक मामूली दवाई बनकर रह जाएगी. इलाज मिलने से कम लोगों को इंटेसिव केयर यूनिट और वेंटिलेटर की ज़रूरत होगी.

इलाज मिलने से ये समझना मुश्किल नहीं है कि लोगों की मुश्किलें बहुत कम हो जाएंगी.

छोड़िए YouTube पोस्ट
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त

अभी डॉक्टर कैसे कर रहे हैं इलाज?

अगर आप कोरोना वायरस से संक्रमित है तो ज़्यादातर मामलों में यह कम गंभीर हालत वाली बात नहीं है. ये बेड रेस्ट, पैरासिटामोल और ख़ूब अधिक मात्रा में तरल पदार्थ लेकर ठीक हो जाता है.

लेकिन कुछ लोगों को इंटेंसिव केयर में रखने और ऑक्सिजन देने के लिए वेंटिलेशन की ज़रूरत पड़ती है.

कोरोना वायरस
कोरोना वायरस
हेल्पलाइन

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)