कोरोना वायरस से लड़ने में कितने ज़रूरी हैं वेंटिलेटर्स

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- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले बढ़ते जा रहे हैं. यहां अब तक 1200 से ज़्यादा लोगों में सक्रमण की पुष्टि हुई है और 32 की मौत हो चुकी है.
दिल्ली में निज़ामुद्दीन की मरकज़ बिल्डिंग में तबलीग़ी जमात के सैकड़ों लोग मिलने के बाद से मामला और गंभीर हो गया है.
यहां पर 1500 से 1700 लोग मौजूद थे जिनमें से कई लोगों में कोरोना वायरस जैसे लक्षण पाए गए हैं.
इस घटना से कोरोना वायरस का संक्रमण और बढ़ने का ख़तरा पैदा हो गया है.
सरकार लगातार संक्रमण के तीसरे चरण यानी कम्यूनिटी ट्रांसमिशन को रोकने की कोशिश कर रही है. इसके लिए भारत में 21 दिनों का लॉकडाउन भी किया गया है.
वेंटिलेटर की व्यवस्था
इसके साथ ही मेडिकल उपकरणों की कमी को भी पूरा किया जा रहा है. कोरोना वायरस के गंभीर मामलों को देखते हुए वेंटिलेटर की व्यवस्था भी की गई है.
स्वास्थ्य मंत्रालय ने भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड को 30,000 वेंटिलेटर तैयार करने का ऑर्डर दिया गया है.
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नोएडा की AgVa हेल्थकेयर को एक महीने में 10 हज़ार वेंटिलेटर्स बनाने का ऑर्डर दिया गया है. इनकी आपूर्ति अप्रैल के दूसरे हफ़्ते से होनी शुरू हो जाएगी.
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इसके अलावा ऑटोमोबाइल निर्माताओं को भी वेंटिलेटर्स बनाने के लिए कहा गया है.
वहीं, स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक देश के विभिन्न अस्पतालों में मौजूद वेंटिलेटर्स में से 14,000 से ज़्यादा कोविड-19 मरीज़ों के लिए लगाए गए हैं.
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जिन मरीज़ों की हालत गंभीर होती है वेंटिलेटर उनकी जान बचाने में मदद करता है. वेंटिलेटर की ज़रूरत कब पड़ती है और आने वाले समय में भारत इसकी आपूर्ति के लिए कितना तैयार है?

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कैसे काम करता है वेंटिलेटर
वेंटिलेटर एक ऐसी मशीन है जो किसी मरीज़ की सांस लेने में मदद करती है. ये फेफड़ों में ऑक्सीजन डालती है और कार्बन डाईऑक्साइड निकालती है.
वेंटिलेटर को लाइफ सेविंग मशीन भी कहा जाता है क्योंकि ये उस वक़्त इस्तेमाल की जाती है जब मरीज़ के फेफड़े काम करना बहुत कम कर देते हैं. सर्जरी से पहले भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.
वेंटिलेटर मशीन में एक ट्यूब जुड़ी होती है जिसे मरीज़ के मुंह, नाक या गले में छोटे से कट के ज़रिए शरीर में डाला जाता है.
कोविड19 के इलाज में तकरीबन 5 फ़ीसदी मरीज़ों को ही क्रिटिकल केयर की ज़रूरत पड़ती है. ऐसे लोगों को उपचार के लिए आईसीयू में भर्ती किया जाता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक कोविड19 के 80 प्रतिशत मरीज़ बिना अस्पताल में इलाज़ के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, छह मरीज़ों में से एक गंभीर रूप से बीमार हो जाते हैं और उन्हें सांस लेने में दिक्कत आती है.

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कोरोना वायरस में वेंटिलेटर की ज़रूरत
कोरोना वायरस से संक्रमण के गंभीर मामलों में वायरस फेफड़ों को नुक़सान पहुंचाने लगता है. इंसान के फेफड़े शरीर में वो जगह हैं जहां से ऑक्सीजन शरीर में पहुंचना शुरू होती है और कार्बन डाई ऑक्साइड शरीर से बाहर निकलती है.
अगर ये वायरस आपके मुंह से होते हुए सांस की नली में प्रवेश करता है और फिर आपके फेफड़ों तक पहुंचता है तो आपके फेफड़ों में छोटे-छोटे एयरसैक बना देता है.
कोरोना के बनाए छोटे-छोटे एयरसैक में पानी जमने लगता है. इस कारण सांस लेने में तकलीफ़ होती है और आप लंबी सांस नहीं ले पाते.
इस स्टेज में मरीज़ को वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ती है. ऐसे में वेंटिलेटर फेफड़ों में ऑक्सीजन पहुंचाता है. वेंटिलेटर में ह्यूमिडीफायर भी होता है जो हवा में गर्माहट और नमी शामिल करता है और उससे शरीर का तापमान सामान्य बना रहता है.
फेफड़ों का काम करती है...
इंडियन सोसाइटी ऑफ़ क्रिटिकल केयर मेडिसिन (आईएससीसीएम) के अध्यक्ष डॉक्टर ध्रुव चौधरी बताते हैं, "कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज़ों की तीन कैटेगरी मान सकते हैं. पहली कैटेगरी जिसमें मरीज़ को हल्के-फुल्के लक्षण जैसे ज़ुकाम होता है. इसमें उसे घर पर ही क्वारंटीन में रहने को बोला जाता है."
"अस्पताल में एडमिट करने की ज़रूरत नहीं होती. दूसरी कैटेगरी में तेज़ बुखार और सांस लेने में दिक्कत होने लगती है. तब मरीज़ को अस्पताल में एडमिट किया जाता है और उसे ऑक्सीजन दी जाती है. तीसरे कैटेगरी के मरीज़ों में फेफड़ों को नुक़सान हो जाता है. इससे शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाने की फेफड़ों की क्षमता बहुत कम हो जाती है."
"ये मल्टी ऑरगन फेलियर की स्थिति होती है. इसलिए मरीज़ को वेंटिलेटर पर डाला जाता है. तब मशीन एक तरह से फेफड़ों का काम करती है."
कितनी मजबूत है तैयारी
इंडियन सोसाइटी ऑफ़ क्रिटिकल केयर मेडिसिन के महासचिव डॉक्टर श्रीनिवास समावेदम बताते हैं कि भारत में सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में इस वक्त 80 हज़ार से एक लाख तक वेंटिलेटर हैं.
डॉक्टर श्रीनिवास का कहना है, "अगर इटली, सऊदी अरब की रफ़्तार से यहां भी बीमारी आगे बढ़ी तो मौजूदा वेंटिलेटर्स की संख्या कम पड़ सकती है. लेकिन, भारत में ऐसा नहीं लग रहा है. अभी जो आंकड़ा है उसके हिसाब से यहां पर्याप्त वेंटिलेटर्स हैं. जब ये आंकड़ा 10 हज़ार या 20 हज़ार पहुंचेगा तब थोड़ा चिंता की बात होगी."
"लेकिन, जिस तरह सरकार ने लॉकडाउन किया है और लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं तो इस आंकड़े तक पहुंचने में दो-तीन हफ़्ते का वक़्त लगेगा और इस बीच सरकार को ज़रूरी उपकरणों की आपूर्ति का समय मिल जाएगा. वैसे ज़रूरी भी नहीं भारत में आंकड़ा इतना ज़्यादा हो जाए. हालांकि, इस बीच पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट, मास्क, वेंटिलेटर की आपूर्ति की कोशिश करनी चाहिए."
अमूमन लोगों के बीच वेंटिलेटर को लेकर डर होता है. ये धारणा होती है कि वेंटिलेटर से लौट कर आना बेहद मुश्किल है.
कोरोना वायरस के मामले में वेंटिलेटर पर पहुंचने के बाद क्या संभावना होती है.
डॉक्टर श्रीनिवास कहते हैं कि वेंटिलेंटर पर आने के बाद भी मरीज़ ठीक होते हैं.
कोरोना वायरस के अलावा दूसरी बीमारियों में तो 70 से 85 प्रतिशत मरीज ठीक होकर निकलते हैं. कोरोना वायरस में ये प्रतिशत थोड़ा कम होता है.
वेंटिलेटर से ज़्यादा ज़रूरी सुरक्षात्म उपकरण
डॉक्टर ध्रुव चौधरी के मुताबिक सरकार की तैयारी इस बात पर निर्भर करेगी कि कितने लोगों को संक्रमण होता है और कितना गंभीर होता है. लेकिन, वेंटिलेंटर को लेकर हमें प्रैक्टिल नज़रिया अपनाना चाहिए. कोरोना वायरस से निपटने के लिए हमारे पास जो इंतज़ाम हैं उसका वेंटिलेंटर एक हिस्सा भर है, वो सबकुछ नहीं है.
डॉक्टर चौधरी का कहना है, "कोरोना वायरस के 100 में से 80 मरीज़ों को घर में ही इलाज़ की ज़रूरत होती है. अनुमान के मुताबिक बचे हुए 20 में से 4 से 5 लोगों को ही वेंटिलेटर की ज़रूरत होती है."
"इसके बजाए हमें पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विमेंट, मास्क और मरीज़ की देखभाल में लगे स्वास्थ्य कर्मचारियों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है. वेंटिलेटर तो कुछ मरीज़ों के लिए चाहिए होता है लेकिन सुरक्षा संबंधी उपकरण और नर्स व डॉक्टर तो हर मरीज़ के लिए चाहिए. हमें इलाज़ में दिन-रात जुटे डॉक्टर, नर्स और सफाईकर्मियों की सुरक्षा को भी सुनिश्चित करना होगा."

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